महंगाई नियंत्रण के लिए जमाखोरों और मुनाफाखोरों पर सख्त निगरानी जरूरी
आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने से आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है सीधा असर
देश में महंगाई को नियंत्रित रखना सरकार के सामने हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। विशेष रूप से खाद्य पदार्थों की कीमतों में अचानक होने वाली बढ़ोतरी का सीधा असर आम और मध्यमवर्गीय परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ता है। प्याज, चीनी, दाल और खाद्य तेल जैसी रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने पर सबसे अधिक परेशानी उन परिवारों को होती है, जिनकी आय सीमित है। ऐसे में केवल कीमतें बढ़ने के बाद कदम उठाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सरकार को पहले से ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिससे संभावित मूल्य वृद्धि को समय रहते रोका जा सके।
बरसात में प्याज की कीमत बढ़ना हर साल की समस्या
हर वर्ष बरसात के मौसम में प्याज की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है। आवक कम होने के साथ ही बाजार में प्याज के दाम बढ़ने लगते हैं। यह स्थिति कोई नई नहीं है और पिछले कई वर्षों से अलग-अलग समय पर देखने को मिलती रही है। सवाल यह है कि जब सरकार और संबंधित विभागों को पहले से पता है कि बरसात के दौरान प्याज की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, तो मूल्य नियंत्रण के उपाय पहले से क्यों नहीं किए जाते?
प्याज जैसी आवश्यक वस्तु के लिए पर्याप्त बफर स्टॉक तैयार रखना और जरूरत के समय उसे बाजार में उतारना महत्वपूर्ण है। यदि सरकार के पास प्याज का बफर स्टॉक उपलब्ध है, तो उसे सही समय पर बाजार में जारी किया जाना चाहिए। इससे आपूर्ति बढ़ेगी और अचानक होने वाली मूल्य वृद्धि को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
कीमत बढ़ने के बाद आयात का फैसला समस्या का स्थायी समाधान नहीं
चीनी सहित कई खाद्य वस्तुओं के मामले में भी अक्सर देखा जाता है कि कीमतों में बढ़ोतरी होने के बाद आयात जैसे विकल्पों पर विचार किया जाता है। लेकिन आयात का निर्णय लेने और वस्तु के भारतीय बाजार तक पहुंचने के बीच समय लगता है। इस अवधि में उपभोक्ताओं को बढ़ी हुई कीमतों पर ही सामान खरीदना पड़ता है।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि मांग, उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक का नियमित आकलन किया जाए। यदि किसी वस्तु की कमी होने की आशंका है, तो समय रहते उचित निर्णय लिया जाना चाहिए। संकट उत्पन्न होने के बाद कार्रवाई करने की परंपरा के स्थान पर पूर्व नियोजित और प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी होगी।
कृषि प्रधान देश में दलहन और तिलहन का आयात क्यों?
भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। देश में विशाल कृषि भूमि और बड़ी संख्या में किसान खेती से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद दलहन और तिलहन की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बार आयात का सहारा लेना पड़ता है। यह स्थिति कृषि नीति और उत्पादन क्षमता को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है।
आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी यदि हम दलहन और तिलहन जैसी महत्वपूर्ण कृषि उपज में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं, तो इसके कारणों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। किसानों को ऐसी फसलों के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करने, बेहतर बीज उपलब्ध कराने, सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने, तकनीकी सहायता देने और उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करने की दिशा में दीर्घकालीन नीति आवश्यक है।
जमाखोरी से कृत्रिम संकट पैदा होने की आशंका
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि केवल उत्पादन की कमी से नहीं होती। कई बार बाजार में पर्याप्त माल होने के बावजूद जमाखोरी के कारण कृत्रिम कमी जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यदि व्यापारी या कारोबारी अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से बड़ी मात्रा में आवश्यक वस्तुओं का भंडारण कर लेते हैं, तो खुले बाजार में उनकी उपलब्धता कम हो सकती है। इससे कीमतें तेजी से ऊपर जाने लगती हैं।
ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन को स्टॉक की नियमित जांच करनी चाहिए। आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता, थोक और खुदरा कीमतों तथा गोदामों में मौजूद स्टॉक पर निगरानी रखनी होगी। नियमों का उल्लंघन या अवैध जमाखोरी पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ समय पर कार्रवाई होनी चाहिए।
मुनाफाखोरी पर भी प्रभावी नियंत्रण की जरूरत
महंगाई के दौरान मुनाफाखोरी भी उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ाती है। यदि थोक बाजार में किसी वस्तु के दाम सीमित मात्रा में बढ़े हों लेकिन खुदरा बाजार में उसकी कीमत असामान्य रूप से अधिक वसूली जा रही हो, तो प्रशासन को इसकी जांच करनी चाहिए।
थोक और खुदरा कीमतों के अंतर की नियमित समीक्षा करने से यह पता लगाया जा सकता है कि कीमतों में बढ़ोतरी वास्तविक लागत के कारण हुई है या अनुचित लाभ कमाने का प्रयास किया जा रहा है। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए बाजार की पारदर्शिता बढ़ाना भी जरूरी है।
केंद्र के साथ राज्यों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
महंगाई पर नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल केंद्र सरकार की नहीं हो सकती। इसमें राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। कृषि उत्पादन से लेकर मंडियों, भंडारण व्यवस्था, परिवहन और खुदरा बाजार तक कई स्तरों पर राज्य सरकारों के विभाग सीधे जुड़े होते हैं।
राज्य सरकारों को अपने-अपने क्षेत्रों में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों की नियमित समीक्षा करनी चाहिए। जिला प्रशासन को भी बाजार की स्थिति पर निगरानी रखते हुए शिकायत मिलने का इंतजार करने के बजाय सक्रिय रूप से जांच और कार्रवाई करनी चाहिए।
उत्पादन से वितरण तक मजबूत निगरानी तंत्र जरूरी
महंगाई नियंत्रण के लिए एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें फसलों के अनुमानित उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक वस्तु पहुंचने की पूरी श्रृंखला की निगरानी हो। किस फसल का कितना उत्पादन होने वाला है, बाजार में उसकी संभावित मांग कितनी है, सरकारी और निजी गोदामों में कितना स्टॉक उपलब्ध है तथा आने वाले महीनों में आपूर्ति की क्या स्थिति रहने वाली है—इन सभी आंकड़ों का समय रहते विश्लेषण किया जाना चाहिए।
तकनीक और डिजिटल डाटा का इस्तेमाल कर सरकारें ऐसी प्रणाली विकसित कर सकती हैं, जिससे किसी आवश्यक वस्तु की संभावित कमी और मूल्य वृद्धि का पूर्वानुमान लगाया जा सके। इससे समय रहते बफर स्टॉक जारी करने, आयात या अन्य आवश्यक कदम उठाने में मदद मिलेगी।
समस्या आने से पहले तैयारी ही बेहतर समाधान
हमारी प्रशासनिक व्यवस्था में अक्सर समस्या गंभीर होने के बाद कार्रवाई तेज होती दिखाई देती है। इस प्रवृत्ति को बदलने की आवश्यकता है। महंगाई नियंत्रण में प्रतिक्रियात्मक नीति के बजाय पूर्व तैयारी और दूरदर्शी नीति ज्यादा प्रभावी साबित हो सकती है।
आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय, पर्याप्त बफर स्टॉक, घरेलू उत्पादन में वृद्धि, जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर सख्त निगरानी तथा समय पर प्रशासनिक कार्रवाई आवश्यक है। यदि इन सभी स्तरों पर योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो अचानक बढ़ने वाली खाद्य महंगाई से आम नागरिकों को काफी हद तक राहत दी जा सकती है।
