इंदौर में सीसी सड़कों पर पांच साल में ₹800 करोड़ खर्च करने का दावा, पुरानी सड़कें तोड़कर दोबारा बनाने पर सवाल
दैनिक स्वराज वाणी | इंदौर
इंदौर नगर निगम की सीमेंट कांक्रीट (सीसी) सड़कों पर हुए खर्च को लेकर सवाल उठे हैं। एक समाचार पड़ताल में दावा किया गया है कि निगम ने पिछले पांच वर्षों में सीसी सड़क निर्माण पर करीब ₹800 करोड़ खर्च किए और कई स्थानों पर पहले से बनी सीसी सड़कों को तोड़कर दोबारा बनाया गया। रिपोर्ट ने इसे ‘₹800 करोड़ का सड़क घोटाला’ कहा है। हालांकि, ₹800 करोड़ कुल खर्च का दावा है; इतनी ही राशि का गबन हुआ है, यह किसी आधिकारिक जांच से स्थापित नहीं हुआ है। इस आरोप का निष्कर्ष निगम के कार्यादेशों, पुरानी सड़कों की स्थिति, भुगतान रिकॉर्ड और स्वतंत्र तकनीकी जांच के आधार पर ही निकलेगा।
पहले से बनी सड़क को फिर क्यों बनाया गया?
पड़ताल का मुख्य सवाल उन सड़कों से जुड़ा है, जो पहले भी सीमेंट कांक्रीट की थीं। यदि किसी सड़क को उसकी उपयोगी अवधि पूरी होने से पहले तोड़ा गया, तो यह देखना होगा कि उसकी स्थिति क्या थी और पुनर्निर्माण की आवश्यकता किसने प्रमाणित की। सड़क खराब हो सकती है, उसकी क्षमता बढ़ाने की जरूरत भी हो सकती है; लेकिन हर काम के लिए तकनीकी कारण और स्वीकृति का रिकॉर्ड होना चाहिए।
इसलिए जांच केवल सड़क के पहले से सीसी होने तक सीमित नहीं रह सकती। जरूरी होगा कि हर विवादित सड़क का पुराना निर्माण वर्ष, उस समय की लागत, गुणवत्ता जांच, मरम्मत का रिकॉर्ड, नया कार्यादेश और दोबारा निर्माण के कारण का मिलान किया जाए। तभी पता चलेगा कि काम आवश्यक था या सार्वजनिक धन का अनावश्यक उपयोग हुआ।
ठेकेदार की जवाबदेही पर भी सवाल
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इंदौर की सीसी सड़क परियोजनाओं में डिफेक्ट लाइबिलिटी पीरियड, यानी निर्माण में खराबी सामने आने पर ठेकेदार की जवाबदेही की अवधि, केवल तीन साल रखी गई। रिपोर्ट ने इसकी तुलना भोपाल, सूरत और अन्य शहरों में बताई गई पांच से दस वर्ष की अवधि से की है। अलग-अलग शहरों और परियोजनाओं की शर्तें बदल सकती हैं। इसलिए इस तुलना की पुष्टि संबंधित निविदा और अनुबंध दस्तावेजों से करनी होगी।
डिफेक्ट लाइबिलिटी पीरियड महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इस दौरान निर्माण में तय मानकों से जुड़ी खराबी सामने आने पर अनुबंध के अनुसार ठेकेदार से सुधार कराया जा सकता है। किसी सड़क के जल्दी खराब होने पर यह जानना जरूरी है कि उस समय उसकी जवाबदेही अवधि चल रही थी या नहीं और निगम ने ठेकेदार को सुधार का निर्देश दिया था या नया निर्माण कार्य मंजूर किया।
₹800 करोड़ के आंकड़े की जांच कैसे हो?
पांच वर्षों के खर्च का आकलन करने के लिए निगम की स्वीकृत परियोजनाओं और वास्तव में किए गए भुगतान को अलग-अलग देखना होगा। निविदा की अनुमानित लागत, ठेके का मूल्य और अंतिम भुगतान एक जैसे आंकड़े नहीं होते। परियोजना के दौरान काम का दायरा बदलने पर रकम भी बदल सकती है। इसीलिए ₹800 करोड़ के दावे की पुष्टि के लिए सड़कवार सूची और भुगतान विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।
इस सूची में हर सड़क की लंबाई, पुरानी सतह का प्रकार, निर्माण वर्ष, नया काम शुरू होने की तारीख और ठेकेदार का नाम दर्ज हो तो नागरिक भी खर्च और काम की आवश्यकता समझ सकेंगे। निगम के इंजीनियरों की निरीक्षण रिपोर्ट और सड़क की गुणवत्ता जांच से आरोपों का तकनीकी परीक्षण संभव होगा।
आरोप और निष्कर्ष में अंतर
पहले से बनी सड़क का पुनर्निर्माण अपने आप में भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं करता। इसी तरह, बड़ी राशि खर्च हो जाना काम के सही होने का प्रमाण भी नहीं है। सवाल यह है कि क्या सड़क तोड़ने का उचित कारण दर्ज था, क्या पुराने ठेकेदार की जवाबदेही तय की गई और क्या नए काम की लागत नियमों के अनुसार मंजूर हुई।
फिलहाल उपलब्ध विवरण में नगर निगम के अधिकारियों या संबंधित ठेकेदारों का जवाब शामिल नहीं है। उनका पक्ष और दस्तावेज सामने आने पर ही आरोपों का पूरा मूल्यांकन किया जा सकेगा। इंदौर की सड़कों पर सार्वजनिक धन खर्च हुआ है; इसलिए सड़कवार कार्य और भुगतान का स्पष्ट विवरण इस मामले में सबसे जरूरी अगला कदम है।
