Indore में आवारा कुत्तों की समस्या: हाईकोर्ट की सख्त फटकार, 12 जनवरी तक प्रभावी कार्रवाई के निर्देश
Indore । मध्य प्रदेश की राजधानी इंदौर में आवारा कुत्तों की समस्या पिछले कई सालों से एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। शहर के नागरिकों के लिए यह समस्या सिर्फ असुविधा का कारण नहीं बन रही, बल्कि सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा भी पैदा कर रही है। शुक्रवार को इस मामले पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया और नगर निगम को निर्देश दिए कि वह 12 जनवरी तक प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करे।
हाईकोर्ट ने नगर निगम के दावों पर सवाल उठाए कि शहर में अब तक 2.39 लाख से अधिक कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है। अदालत ने इन आंकड़ों को संदेहास्पद बताते हुए कहा कि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत प्रतीत होती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आंकड़ों और जमीनी हकीकत में अंतर है और नगर निगम की कार्यप्रणाली गंभीर रूप से सवालों के घेरे में है।
हाईकोर्ट ने आंकड़ों और नगर निगम के दावों पर जताया संदेह
सुनवाई के दौरान नगर निगम ने दावा किया कि शहर में व्यापक नसबंदी अभियान चलाया गया है और अब तक 2.39 लाख से अधिक स्ट्रीट डॉग्स का नसबंदी किया जा चुका है। हालांकि, बेंच में शामिल प्रशासनिक जज विजयकुमार शुक्ला और जस्टिस बीके द्विवेदी ने इन आंकड़ों पर गहरा संदेह व्यक्त किया।
कोर्ट ने कहा कि कॉलोनियों में बच्चे घर से बाहर निकलने में डर महसूस कर रहे हैं, जिससे उनका सामाजिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है। न्यायाधीशों ने यह भी सवाल उठाया कि नसबंदी और स्टरलाइजेशन अभियान पर प्रति कुत्ते लगभग 2,000 रुपए का खर्च दिखाया जा रहा है, लेकिन इसका कोई प्रभाव सड़क पर दिखाई नहीं देता। जस्टिस विजयकुमार शुक्ला ने टिप्पणी की, “नसबंदी और आंकड़े बताना एक बड़ा घोटाला है। शहर में हर जगह आवारा कुत्ते दिखते हैं।”
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह मामला केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा और स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा है। अदालत ने कहा कि नगर निगम की लापरवाही का प्रभाव शहरवासियों पर पड़ रहा है और इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

Indore नगर निगम का पक्ष और अदालत की प्रतिक्रिया
Indore नगर निगम के अधिकारियों ने बताया कि शहर में दो स्थानों पर स्टरलाइजेशन कैंप चल रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि जहां से भी शिकायत आती है, वहां से कुत्तों को उठाकर रैबीज का इंजेक्शन दिया जाता है और नसबंदी की जाती है।
हालांकि, अदालत ने इस दावे पर सवाल उठाया कि यदि इतने बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया है तो सड़क पर कुत्तों की संख्या कम क्यों नहीं हो रही। कोर्ट ने पैदल चलने वालों, बाइक और स्कूटर चालकों पर कुत्तों के हमलों की बढ़ती घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि स्थिति गंभीर होती जा रही है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल अभियान चलाने का दावा करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविकता यह है कि नगर निगम को जमीनी स्तर पर प्रभावी परिणाम दिखाने होंगे। अदालत ने संकेत दिया कि यदि 12 जनवरी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो नसबंदी और स्टरलाइजेशन अभियान की न्यायिक जांच का आदेश दिया जा सकता है।
सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि आवारा कुत्तों का मुद्दा केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं है, बल्कि जनता की सुरक्षा, बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने कहा कि यह जिम्मेदारी नगर निगम की है कि वह शहर में नागरिकों के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करे।
अदालत ने नगर निगम को निर्देश दिए कि शहर के प्रमुख स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए और अभियान की वास्तविक प्रगति अदालत के समक्ष पेश की जाए। हाईकोर्ट ने इस मामले में सीनियर एडवोकेट पीयूष माथुर को न्यायमित्र और एडवोकेट मनीष यादव को इंटरविनर नियुक्त किया है।
न्यायालय ने चेताया कि अगर नगर निगम ने समय पर और प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो अदालत कड़ी कानूनी कार्रवाई कर सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि सभी सरकारी अधिकारी और संबंधित कर्मचारी इस मामले में पूरी तरह जवाबदेह होंगे।
जनता और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
इस मामले पर जनता में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ नागरिक मानते हैं कि नगर निगम प्रयास कर रहा है, लेकिन अभियान पर्याप्त नहीं है। वहीं, कई लोग अदालत के कड़े रुख की सराहना कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि इस कदम से सड़क पर सुरक्षा बढ़ेगी और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि आवारा कुत्तों की समस्या केवल नसबंदी तक सीमित नहीं है। इसके लिए नियमित निगरानी, जमीनी स्तर पर निगरानी टीम और स्वास्थ्य उपायों की आवश्यकता है। उनका कहना है कि केवल स्टरलाइजेशन कैंप चलाना पर्याप्त नहीं, बल्कि इसके प्रभाव का निरंतर मूल्यांकन भी आवश्यक है।
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आगामी सुनवाई और कार्रवाई
हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई 12 जनवरी के लिए निर्धारित की है। तब तक नगर निगम को शहर के प्रमुख इलाकों से आवारा कुत्तों को हटाने और अभियान की वास्तविक प्रगति अदालत के सामने पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कार्रवाई संतोषजनक नहीं मिली, तो न्यायिक जांच और कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि यह मामला प्रशासनिक दक्षता का नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा है। इसलिए नगर निगम को तत्काल प्रभावी कदम उठाने होंगे।
निष्कर्ष
Indore में आवारा कुत्तों की समस्या और नगर निगम के 2.39 लाख नसबंदी के दावे के बीच अंतर ने यह साबित कर दिया कि आंकड़े और जमीनी हकीकत में अक्सर अंतर होता है। हाईकोर्ट ने नगर निगम को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 12 जनवरी तक ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएँ।
यह मामला नगर निगम और अन्य स्थानीय निकायों के लिए एक चेतावनी है कि जनता की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। आवारा कुत्तों की समस्या केवल संख्या में कमी लाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए प्रभावी योजना, निगरानी और निरंतर मूल्यांकन आवश्यक है।
Indore के नागरिक उम्मीद कर रहे हैं कि हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद नगर निगम जमीनी स्तर पर कार्रवाई करेगा और शहर को सुरक्षित और नागरिकों के अनुकूल बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाएगा।
