Indore बीआरटीएस हटाने में लापरवाही पर हाई कोर्ट सख्त, समझ नहीं आता काम कैसे हो रहा है
Indore : में बीआरटीएस (बूस्टेड रैपिड ट्रांजिट सिस्टम) हटाने के मामले में लगातार सुस्ती और लापरवाही पर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। कोर्ट ने इस प्रक्रिया की धीमी गति और सरकारी एजेंसियों की धीमी कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए कहा कि “समझ नहीं आता कि काम कैसे हो रहा है।” न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।
कोर्ट ने जताई गंभीर नाराजगी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने यह कहा कि यह लग रहा है कि इंदौर का बीआरटीएस हटना ही नहीं है। कोर्ट ने याद दिलाया कि भोपाल में बीआरटीएस समय पर हट गया था और वहां कोई बाधा नहीं आई। वहीं इंदौर में काम की धीमी गति और एजेंसी तय करने में विलंब ने स्थिति को बिगाड़ दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी सुस्ती के चलते यह काम कभी पूरा नहीं हो पाएगा।
सरकारी जवाब और एजेंसियों का विवरण
सरकारी वकील ने कोर्ट को जानकारी दी कि बीआरटीएस और बस स्टॉप हटाने के लिए आठ एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने कहा कि भंवरकुआ, भोलाराम नगर और राजीव गांधी चौराहा के बस स्टॉप पहले ही हटाए जा चुके हैं और दो अन्य स्थानों पर काम चल रहा है। सरकारी पक्ष ने आश्वासन दिया कि लगभग दो माह में बीआरटीएस और सभी बस स्टॉप हटाने का काम पूरा हो जाएगा।
हालांकि, कोर्ट ने इस वाद-विवाद और आश्वासनों को पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई पर कलेक्टर और निगमायुक्त व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहें और वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि केवल रिपोर्ट देने से काम पूरा नहीं होगा, समय सीमा तय करना आवश्यक है।
यातायात सुधार और जनहित याचिकाएँ
Indore में बीआरटीएस हटाने से जुड़े मामले के साथ-साथ शहर की खराब यातायात व्यवस्था को लेकर चार अलग-अलग जनहित याचिकाएँ भी हाई कोर्ट में लंबित हैं। न्यायालय ने इस सुनवाई के दौरान कहा कि जनता की परेशानी को ध्यान में रखते हुए यातायात सुधार की दिशा में तत्काल कार्य होना चाहिए।
कोर्ट द्वारा गठित समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विनय झेलावत ने बताया कि कोर्ट के आदेशों के बाद शहर में यातायात सुधार की दिशा में कुछ कदम उठाए गए हैं, लेकिन अभी भी कई महत्वपूर्ण कार्य लंबित हैं। कोर्ट ने कहा कि जब तक लगातार बैठकें नहीं होंगी और नीति स्पष्ट नहीं होगी, तब तक किसी ठोस सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती।
नोडल अधिकारी और इंजीनियरिंग स्टाफ
कोर्ट ने निगम के एक्जीक्यूटिव इंजीनियर से पूछा कि निगम में कितने इंजीनियर हैं। अधिकारी ने बताया कि कुल 150 इंजीनियर कार्यरत हैं। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इसके बावजूद बीआरटीएस और बस स्टॉप हटाने में इतनी देरी क्यों हो रही है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि नोडल अधिकारी नियमित रूप से समिति की बैठकों में शामिल हों और कार्य प्रगति की रिपोर्ट पेश करें।
अतिक्रमण और पुलिस की भूमिका
सुनवाई के दौरान शहर में अतिक्रमण की समस्या भी उठी। भवरकुआ पुलिस थाने के बाहर अतिक्रमण पर सुनवाई हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया ने कोर्ट को बताया कि पूरे शहर में पार्किंग के नाम पर बनाए गए बेसमेंट में व्यावसायिक गतिविधियां हो रही हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि बेसमेंट में पार्किंग सुनिश्चित की जाए ताकि सड़क पर वाहन खड़े न हों।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि पुलिस द्वारा जब्त वाहन सड़क पर खड़े रहते हैं और अतिक्रमण में सहयोग नहीं किया जा रहा। कोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार यह स्पष्ट करना होगा कि कब तक और कितने अतिक्रमण हटाए गए।
ब्रिजों और बोगदों में अतिक्रमण
कोर्ट ने शास्त्री ब्रिज और अन्य ब्रिजों में अतिक्रमण की स्थिति पर भी सवाल उठाया। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि भंडारी और राजकुमार ब्रिज के बोगदों में बसें अभी भी खड़ी हैं, जबकि शास्त्री ब्रिज से अतिक्रमण हटा दिया गया है। कोर्ट ने निगम और प्रशासन को निर्देश दिया कि अतिक्रमण हटाने की पूरी जानकारी रिपोर्ट के रूप में पेश की जाए।
अगली सुनवाई और रिपोर्टिंग
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी। इस दिन कलेक्टर और निगमायुक्त व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होंगे और वास्तविक स्थिति स्पष्ट करेंगे। कोर्ट ने कहा कि केवल आश्वासन देने से काम नहीं चलेगा, समय-सीमा और वास्तविक रिपोर्ट पेश करना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
Indore हाई कोर्ट की यह कड़ी प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि प्रशासन को जनहित, यातायात सुधार और अनुशासनात्मक दृष्टि से तत्काल कदम उठाने होंगे। बीआरटीएस हटाने और शहर की यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए सरकार और निगम की जवाबदेही अब कोर्ट के सामने है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनता की परेशानी और समय की मर्यादा को देखते हुए इस प्रक्रिया में ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस सुनवाई से यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है, उन्हें लागू करने में भी तेजी और पारदर्शिता अनिवार्य है।
