इंदौर नगर निगम के Green Waste Plant पर सवाल
बिचौली हप्सी और हरना गांव में भूजल प्रदूषण के आरोप, मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा
इंदौर में नगर निगम द्वारा बिचौली हप्सी क्षेत्र में संचालित Green Waste Plant को लेकर गंभीर पर्यावरणीय सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय ग्रामीणों और याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि इस प्लांट से निकलने वाला दूषित कचरा और अपशिष्ट सीधे आसपास के तालाब में डाला जा रहा है, जिससे न केवल तालाब का पानी प्रदूषित हो रहा है बल्कि आसपास का भूजल भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
यह मामला अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में पहुंच चुका है, जहां सुनवाई के बाद अदालत ने शासन, नगर निगम और प्लांट संचालन करने वाली एजेंसी को नोटिस जारी कर 14 मई तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी मामले में पक्षकार बनाकर विस्तृत जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।
Green Waste Plant की स्थिति और ग्रामीणों की चिंता
जानकारी के अनुसार, यह ग्रीन वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट बिचौली हप्सी क्षेत्र में सिटी फॉरेस्ट और एक तालाब के बीच पीपीपी मॉडल पर स्थापित किया गया है। इसे शहर के ग्रीन वेस्ट मैनेजमेंट के लिए महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट बताया गया था।
लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि यहां आने वाला कचरा केवल जैविक अपशिष्ट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसमें अन्य प्रकार का कचरा भी शामिल होता है। इस कचरे के प्रसंस्करण के बाद जो अवशेष निकलता है, उसे सही तरीके से निपटाने के बजाय पास के तालाब में डंप किया जा रहा है।
इससे तालाब का पानी खराब हो रहा है और धीरे-धीरे इसका असर आसपास के भूजल पर भी पड़ने लगा है। क्षेत्र के बिचौली हप्सी और हरना बादली गांव के लोग इस स्थिति से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
ग्रामीणों का जीवन और जल संकट की आशंका
हरना बादली गांव और आसपास के क्षेत्रों में पीने के पानी का मुख्य स्रोत बोरिंग और कुएं हैं। ऐसे में भूजल प्रदूषण ग्रामीणों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में पीने के पानी की गंभीर कमी हो सकती है। कई जगहों पर पानी की गुणवत्ता में बदलाव की शिकायतें भी सामने आने लगी हैं।
लोगों को डर है कि यदि भूजल लगातार दूषित होता रहा तो इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ेगा और कई तरह की बीमारियां फैल सकती हैं।
आग की घटना से बढ़ा विवाद
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि हाल ही में प्लांट में आग लगने की घटना के बाद स्थिति और खराब हो गई।
आग के बाद वहां मौजूद जहरीला मलबा और अपशिष्ट बहकर सीधे तालाब में पहुंच गया, जिससे पानी और अधिक दूषित हो गया। इसके बाद से ही ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ गया और उन्होंने प्रशासन से कार्रवाई की मांग की।
हाईकोर्ट में सुनवाई और सवाल
हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यदि यह प्लांट पूरी तरह “जीरो वेस्ट” मॉडल पर आधारित है, तो फिर प्रदूषण कैसे फैल रहा है?
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि ग्रीन वेस्ट के साथ कई अन्य प्रकार के कचरे भी प्लांट में आ जाते हैं, जिनका उचित निपटान नहीं हो पा रहा है।
इस पर अदालत ने गंभीरता दिखाते हुए सभी संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मौके पर जाकर जांच करने के निर्देश दिए हैं।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका अहम
मामले में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को विशेष रूप से जिम्मेदारी दी गई है कि वह प्लांट, तालाब और आसपास के क्षेत्रों के भूजल और जल गुणवत्ता की विस्तृत जांच करे।
बोर्ड की रिपोर्ट इस पूरे मामले में बेहद महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इसी के आधार पर आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई तय की जाएगी।
नगर निगम पर उठे सवाल
नगर निगम की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं कि इतने संवेदनशील पर्यावरणीय प्रोजेक्ट की निगरानी में चूक कैसे हुई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते उचित निगरानी की जाती तो यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती। अब नगर निगम को कोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि प्लांट के संचालन और अपशिष्ट निपटान की व्यवस्था कैसे की जा रही है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर खतरा
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भी औद्योगिक या कचरा प्रसंस्करण इकाई से निकलने वाला अपशिष्ट जल स्रोतों में मिल रहा है, तो यह गंभीर पर्यावरणीय खतरा है।
भूजल प्रदूषण धीरे-धीरे फैलने वाली समस्या है, जिसका असर लंबे समय तक बना रहता है और इसे सुधारना बेहद मुश्किल होता है।
इसके साथ ही, दूषित पानी के उपयोग से त्वचा रोग, पेट की बीमारियां और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं।
ग्रामीणों की मांग और आगे की उम्मीद
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि प्लांट की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच की जाए और यदि अनियमितता पाई जाती है तो सख्त कार्रवाई की जाए।
उनका कहना है कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन पर्यावरण और आम लोगों के जीवन से समझौता नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
इंदौर का यह मामला अब केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और शहरी कचरा प्रबंधन की बड़ी चुनौती को उजागर करता है।
हाईकोर्ट की निगरानी में चल रही यह प्रक्रिया आने वाले समय में तय करेगी कि ग्रीन वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट वास्तव में पर्यावरण के अनुकूल है या फिर यह स्थानीय लोगों के लिए खतरा बन रहा है।

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