India अंतरराष्ट्रीय कानूनों का समर्थन करता है, ईरानी युद्धपोत की घटना के बाद विदेश मंत्री जयशंकर का बयान
नई दिल्ली: India के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने कहा है कि भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और संयुक्त राष्ट्र के नियमों का हमेशा समर्थन करता है। उनका यह बयान श्रीलंकाई तट के निकट ईरानी युद्धपोत की घटना के तुरंत बाद आया, जिसमें यह जहाज गलती से फंस गया और बाद में डूबने की खबर आई। जयशंकर ने इसे लेकर कहा कि भारत ने इस पूरे मामले को कानूनी और मानवतावादी दृष्टिकोण से देखा।
इस घटना ने हिंद महासागर की रणनीतिक सुरक्षा, भारत की क्षेत्रीय भूमिका और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के महत्व पर नई बहस को जन्म दिया है। जयशंकर ने रायसीना डायलॉग के मंच से विस्तृत रूप में इस विषय पर अपनी बात रखी और भारत के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया।
ईरानी युद्धपोत की घटना और India की प्रतिक्रिया
जयशंकर ने कहा कि भारत को ईरान की ओर से जानकारी मिली थी कि उनका एक युद्धपोत गलती से भारतीय सीमा के पास फंस गया था। इसके बाद भारतीय अधिकारियों ने उसे कोच्चि बंदरगाह पर आने की अनुमति दी, ताकि जहाज और उसके चालक दल को सुरक्षित स्थान पर लाया जा सके। विदेश मंत्री ने बताया कि इस जहाज में कई नए कैडेट भी थे और वे फ्लीट रिव्यू के लिए आए थे।
जयशंकर ने इस घटना की प्रक्रिया का विवरण देते हुए कहा:
“1 मार्च को हमने उन्हें आने की अनुमति दी। उन्हें वहां आने में कुछ दिन लगे और फिर जहाज कोच्चि पहुंचा। जब वे यहां आए, तो परिस्थितियाँ बदल गईं। वे गलत दिशा में फंस गए। श्रीलंका के पास भी इसी तरह की स्थिति हुई थी, जिसमें कुछ जहाजों ने निर्णय लिया, लेकिन दुर्भाग्यवश एक जहाज ऐसा नहीं कर पाया। हमने इस पूरे मामले को इंसानियत के नजरिए से देखा, कानूनी मसलों के अलावा।”
इस बयान से यह स्पष्ट हुआ कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के साथ-साथ मानवतावादी दृष्टिकोण को भी महत्व दिया। उन्होंने यह भी जोर दिया कि भारत ने किसी भी परिस्थिति में अपने समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा और सीमा की अखंडता को खतरे में नहीं आने दिया।
भारत का अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर प्रतिबद्ध रुख
जयशंकर ने यह दोहराया कि भारत हमेशा संयुक्त राष्ट्र के समुद्री और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि किसी भी देश का युद्धपोत या नागरिक जहाज यदि किसी विदेशी क्षेत्र में फंस जाता है, तो उसे मानवतावादी दृष्टिकोण से सहायता मिलनी चाहिए।
विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत ने ईरानी जहाज की मदद करने में कोई देरी नहीं की, और यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से की गई। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएँ अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों और नियमों के अनुपालन की आवश्यकता को उजागर करती हैं।
हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक स्थिति
जयशंकर ने हिंद महासागर की महत्वता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में पिछले कई दशकों से विदेशी सेनाएं स्थित हैं और इस क्षेत्र का भू-राजनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। डिएगो गार्सिया जैसे स्थानों पर विदेशी नौसैनिक बलों की मौजूदगी ने हिंद महासागर की सुरक्षा और व्यापार मार्गों की रणनीतिकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
विदेश मंत्री ने कहा:
“हिंद महासागर का क्षेत्र एक इकोसिस्टम है, जो रिकवरी और रीबिल्डिंग के दौर से गुजर रहा है। यह केवल कुछ देशों का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का सामूहिक प्रयास है। हमारे ट्रेड पैटर्न और कनेक्टिविटी को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। भारत ने पिछले दशक में इस प्रक्रिया में निवेश किया है और इस दिशा में निरंतर काम कर रहा है।”
उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर चल रही बहसों के बावजूद, भारत ने हमेशा व्यावहारिक और वास्तविक दृष्टिकोण से निर्णय लिए हैं।
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भारत अपनी तरक्की खुद तय करेगा
जयशंकर ने यह स्पष्ट किया कि भारत की आर्थिक और सामरिक तरक्की किसी भी बाहरी दबाव या अन्य देशों की गलतियों से नहीं तय होगी। उन्होंने कहा:
“अगर हमें हिंद महासागर में अपनी अलग पहचान बनानी है, तो इसे संसाधन, काम, प्रतिबद्धता और व्यावहारिक परियोजनाओं से समर्थन देना होगा। हिंद महासागर को कैसे आकार दिया जाए, इसके अलग-अलग पहलू हैं। यह अकेला महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर नहीं रखा गया – हम इसके बीच में हैं। हमारी ग्रोथ से हिंद महासागर के अन्य देशों को भी फायदा होगा। जो हमारे साथ काम करेंगे, उन्हें ज्यादा लाभ मिलेगा। भारत की तरक्की भारत से तय होगी, हमारी ताकत से, दूसरों की गलतियों से नहीं।”
जयशंकर ने यह भी जोर दिया कि भारत का दृष्टिकोण क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार और समुद्री कनेक्टिविटी के संतुलन पर आधारित है। उन्होंने कहा कि भारत केवल अपने हितों की रक्षा ही नहीं कर रहा, बल्कि पूरे हिंद महासागर क्षेत्र के विकास में योगदान दे रहा है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और भारत की भूमिका
इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी भारत की भूमिका को सराहा। भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवतावादी दृष्टिकोण का पालन करते हुए निर्णय लिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना भारत की रणनीतिक स्थिति और समुद्री कूटनीति को उजागर करती है। भारत ने यह संदेश दिया कि वह हिंद महासागर में एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में मौजूद है, जो केवल अपनी सुरक्षा और हितों को नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता और सुरक्षा को महत्व देता है।
निष्कर्ष
ईरानी युद्धपोत की घटना ने यह साबित किया कि अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवतावाद दोनों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना कितना आवश्यक है। भारत ने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी निभाई और यह दिखाया कि हिंद महासागर में उसकी भूमिका केवल सामरिक नहीं, बल्कि आर्थिक, व्यापारिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
जयशंकर के बयान ने भारत की विदेश नीति को स्पष्ट किया – भारत न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करता है बल्कि क्षेत्रीय सहयोग, सुरक्षा और विकास के मुद्दों में सक्रिय भूमिका निभाता है।
इस पूरी घटना और बयान से यह संदेश जाता है कि भारत अपने हितों और क्षेत्रीय स्थिरता के संतुलन के लिए रणनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में है और भविष्य में भी हिंद महासागर में अपनी भूमिका को सशक्त बनाए रखेगा।
