7.8% GDP ग्रोथ ने बढ़ाया भरोसा, लेकिन आगे आसान नहीं राह; संजीव सान्याल ने गिनाईं 3 बड़ी चुनौतियां
वैश्विक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतें और अल नीनो बन सकते हैं भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती; पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर रही विकास दर
नई दिल्ली। भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष की पहली तिमाही में मजबूत प्रदर्शन करते हुए 7.8 प्रतिशत GDP ग्रोथ दर्ज की है। यह आंकड़ा उम्मीद से बेहतर माना जा रहा है और देश की आर्थिक गतिविधियों में मजबूती का संकेत देता है। हालांकि आने वाली तिमाहियों में विकास की यही रफ्तार बनाए रखना आसान नहीं होगा। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने वैश्विक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों और अल नीनो को भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया है।
पहली तिमाही के मजबूत GDP आंकड़ों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। घरेलू मांग और आर्थिक गतिविधियों की मजबूती के बीच भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपेक्षाकृत तेज विकास दर बनाए हुए है। इसके बावजूद बाहरी परिस्थितियां आने वाले महीनों में विकास दर को प्रभावित कर सकती हैं।
पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8 प्रतिशत
पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की GDP वृद्धि ने बाजार और आर्थिक विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। उम्मीद से बेहतर विकास दर भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाती है, लेकिन इस आंकड़े के आधार पर पूरे वित्त वर्ष की तस्वीर तय करना जल्दबाजी होगी।
आने वाली तिमाहियों में वैश्विक व्यापार, ऊर्जा कीमतों, मौसम की स्थिति, घरेलू मांग और निवेश जैसे कारक विकास की गति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
पहली चुनौती: वैश्विक अनिश्चितता
संजीव सान्याल के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौतियों में वैश्विक अनिश्चितता शामिल है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार संबंधी बदलाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर भारत पर भी पड़ सकता है।
भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से बड़े पैमाने पर जुड़ा हुआ है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ने पर निर्यात, निवेश और वित्तीय बाजार प्रभावित हो सकते हैं।
वैश्विक स्तर पर मांग कमजोर होने की स्थिति में भारतीय निर्यातकों के लिए भी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इसलिए मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था के बावजूद अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
दूसरी चुनौती: कच्चे तेल की कीमतें
भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा होने पर भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों की लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर पड़ने की आशंका रहती है।
ईंधन की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। माल ढुलाई महंगी होने पर खाद्य पदार्थों और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण कारक बनी रहेंगी।
तीसरी चुनौती: अल नीनो और मौसम
अर्थव्यवस्था के सामने तीसरी महत्वपूर्ण चुनौती अल नीनो और उससे जुड़ी मौसम संबंधी अनिश्चितता को माना जा रहा है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र का मानसून से सीधा संबंध है।
मानसून प्रभावित होने पर कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इससे ग्रामीण आय और खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित होने के साथ महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
खाद्यान्न, सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव आम उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर पड़ता है। इसलिए मौसम की स्थिति केवल कृषि ही नहीं, बल्कि व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण रहती है।
मजबूत GDP के बावजूद सतर्कता जरूरी
7.8 प्रतिशत की विकास दर निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन आगे की आर्थिक यात्रा बाहरी और घरेलू दोनों परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
वैश्विक अनिश्चितता से निर्यात एवं निवेश प्रभावित हो सकते हैं, महंगा कच्चा तेल आयात बिल और महंगाई बढ़ा सकता है, जबकि मौसम संबंधी प्रतिकूल परिस्थितियां कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग पर असर डाल सकती हैं।
ऐसे में आने वाली तिमाहियों में GDP ग्रोथ के साथ महंगाई, रोजगार, निजी निवेश, ग्रामीण मांग, निर्यात और औद्योगिक उत्पादन जैसे संकेतकों पर भी नजर रहेगी।
आगे की तिमाहियां होंगी महत्वपूर्ण
पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर GDP वृद्धि ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत शुरुआत दी है। अब सवाल यह है कि क्या विकास की यह गति आने वाली तिमाहियों में भी बरकरार रह सकेगी।
संजीव सान्याल द्वारा रेखांकित वैश्विक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतें और अल नीनो जैसे कारक आने वाले समय में अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। फिलहाल 7.8 प्रतिशत की ग्रोथ ने सकारात्मक संकेत जरूर दिया है, लेकिन आगे की राह घरेलू मजबूती के साथ वैश्विक और मौसमी चुनौतियों से निपटने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
