India Belgium Defence Deal: भारत-बेल्जियम के बीच डिफेंस सेक्टर में 10 बड़े समझौते, जोरावर टैंक से रॉकेट और गोला-बारूद तक बढ़ेगा सहयोग
India Belgium Defence Deal: भारत और बेल्जियम ने रक्षा क्षेत्र में सहयोग को नई दिशा देने के लिए कई अहम समझौते किए हैं। बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों की कंपनियों के बीच करीब 10 समझौतों पर सहमति बनी। इन समझौतों में टैंक की टरेट, रॉकेट सिस्टम, गोला-बारूद, ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, समुद्री सुरक्षा और माइन्स हटाने जैसी आधुनिक रक्षा तकनीकें शामिल हैं।
इस सहयोग की खास बात यह है कि भारत का फोकस सिर्फ विदेशों से तैयार रक्षा उपकरण खरीदने पर नहीं है। दोनों देशों की कंपनियां भारत में तकनीक के विकास, उत्पादन और सिस्टम इंटीग्रेशन की दिशा में भी साथ काम करेंगी। इससे भारत की घरेलू रक्षा निर्माण क्षमता बढ़ाने और डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
जोरावर टैंक के लिए अहम होगी 3105 टरेट
भारत के स्वदेशी हल्के जोरावर टैंक के लिए बेल्जियम की जॉन कॉकरिल डिफेंस की 3105 टरेट को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह 105mm गन से लैस टरेट है और जोरावर टैंक के शुरुआती प्रोटोटाइप में इसका इस्तेमाल भी किया जा चुका है।
जोरावर को विशेष रूप से ऊंचाई वाले और कठिन पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन के लिए विकसित किया जा रहा है। ऐसे क्षेत्रों में हल्के और तेजी से तैनात किए जा सकने वाले टैंक की जरूरत होती है। भारत-चीन सीमा के ऊंचाई वाले इलाकों को भी जोरावर की तैनाती के प्रमुख संभावित क्षेत्रों में देखा जाता है।
समझौते के तहत भारत में इस टरेट के उत्पादन की दिशा में भी काम किया जा रहा है। जॉन कॉकरिल और भारत की इलेक्ट्रो न्यूमैटिक्स एंड हाइड्रोलिक्स के बीच साझेदारी के जरिए टरेट के निर्माण की योजना है। इससे भविष्य में भारत में ही इसके उत्पादन की क्षमता विकसित हो सकती है।
भारत में तैयार होंगे 70mm रॉकेट
डिफेंस सहयोग का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा 70mm रॉकेट सिस्टम है। बेल्जियम की थेल्स और भारत की कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड के बीच इस क्षेत्र में समझौता हुआ है।
इसके तहत अनगाइडेड यानी बिना गाइडेंस वाले और लेजर-गाइडेड दोनों प्रकार के रॉकेट सिस्टम पर काम किया जाएगा। खास बात यह है कि इन रॉकेटों के निर्माण के लिए भारत में उत्पादन क्षमता विकसित की जाएगी।
समझौते के तहत थेल्स तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराएगी, जबकि कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स उत्पादन, परीक्षण और सिस्टम इंटीग्रेशन में भूमिका निभाएगी। योजना के मुताबिक भारत में तैयार होने वाला पहला रॉकेट 2027 की शुरुआत तक सामने आ सकता है।
इन 70mm रॉकेट सिस्टम का इस्तेमाल भारतीय सशस्त्र बलों के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर किया जा सकता है। इनकी तकनीक का उपयोग एयर, लैंड और समुद्री अभियानों में भी किए जाने की संभावना बताई गई है।
समुद्री माइन्स हटाने में मिलेगी नई तकनीक
भारत और बेल्जियम के बीच समुद्री सुरक्षा को लेकर भी अहम सहयोग हुआ है। लार्सन एंड टुब्रो और एक्सेल रोबोटिक्स के बीच हुए समझौते के तहत ऐसे रोबोटिक सिस्टम पर काम किया जाएगा, जो समुद्र के अंदर मौजूद माइन्स को खोजने और उनकी पहचान करने में मदद कर सकें।
समुद्री माइन्स किसी भी नौसेना और समुद्री व्यापार के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। इनकी पहचान और सुरक्षित तरीके से हटाना बेहद जटिल प्रक्रिया होती है। ऐसे में रोबोटिक और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भारतीय नौसेना की माइन काउंटरमेजर क्षमता को मजबूत कर सकता है।
यह सहयोग समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने और जहाजों की आवाजाही में जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सालाना 10 करोड़ राउंड बनाने की तैयारी
गोला-बारूद उत्पादन को लेकर भी दोनों देशों के बीच बड़ा समझौता हुआ है। बेल्जियम की लाचॉसी और भारत की टेम्बो क्लासिक इंजीनियरिंग के बीच प्रस्तावित परियोजना के तहत भारत में एक बड़ी उत्पादन लाइन स्थापित करने की योजना है।
बताया गया है कि प्रस्तावित प्लांट की क्षमता हर साल करीब 10 करोड़ राउंड गोला-बारूद बनाने की होगी। इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 50 मिलियन यूरो बताई गई है।
प्लांट में दो प्रकार के गोला-बारूद के लिए पूरी उत्पादन लाइन तैयार करने के साथ दो अन्य कैलिबर के लिए जरूरी मशीनरी और टूलिंग उपलब्ध कराने की योजना है। परियोजना की स्थापना और डिलीवरी 2028-29 के दौरान होने की योजना बताई गई है।
बड़े स्तर पर घरेलू उत्पादन होने से भारत को गोला-बारूद की जरूरतों के लिए विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर भी जोर
आज के युद्ध में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ी है। भारत और बेल्जियम के बीच हुए समझौतों में इस क्षेत्र को भी जगह दी गई है। दोनों देशों की कंपनियां ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल उपकरण और अन्य आधुनिक रक्षा प्रणालियों पर सहयोग करेंगी।
भारत की कोशिश है कि विदेशी कंपनियों की तकनीकी विशेषज्ञता को देश की अपनी उत्पादन क्षमता और इंजीनियरिंग कौशल के साथ जोड़ा जाए। इससे अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों के स्थानीय निर्माण को बढ़ावा मिल सकता है।
आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की दिशा में बड़ा कदम
भारत-बेल्जियम के बीच हुए ये समझौते केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं हैं। इनमें तकनीक ट्रांसफर, संयुक्त विकास, उत्पादन और सिस्टम इंटीग्रेशन पर भी जोर दिया गया है।
जोरावर टैंक की टरेट से लेकर 70mm रॉकेट, समुद्री माइन्स हटाने की तकनीक, ड्रोन सिस्टम और बड़े पैमाने पर गोला-बारूद उत्पादन तक कई क्षेत्रों में सहयोग भारत की रक्षा औद्योगिक क्षमता को मजबूत कर सकता है। इससे घरेलू कंपनियों को भी आधुनिक तकनीक और वैश्विक रक्षा कंपनियों के साथ काम करने का अवसर मिलेगा।
कुल मिलाकर, भारत और बेल्जियम के बीच ये रक्षा समझौते दोनों देशों के रणनीतिक और औद्योगिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माने जा रहे हैं। भारत के लिए इन परियोजनाओं का सबसे बड़ा फायदा घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आधुनिक रक्षा तकनीक को देश में विकसित करने के रूप में सामने आ सकता है।
