Imran Khan-Asim Munir: सेना से टकराव से पीछे क्यों हट रही PTI? पाकिस्तान की राजनीति में आर्मी चीफ की ताकत समझिए
इमरान खान के करीबी के सुलह के संकेत के बाद पाकिस्तान की राजनीति में नई चर्चा, PTI के बदले रुख के पीछे कानूनी और राजनीतिक दबाव भी अहम
इस्लामाबाद। पाकिस्तान की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और सैन्य नेतृत्व के बीच लंबे समय से जारी टकराव अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के प्रवक्ता और इमरान खान के करीबी जुल्फिकार बुखारी के हालिया बयान से संकेत मिला है कि पार्टी भविष्य में सेना और उसके प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के साथ सीधे टकराव से बचने की रणनीति अपना सकती है।
बुखारी ने कहा है कि यदि इमरान खान रिहा होते हैं तो वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिससे पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचे। उनके मुताबिक इमरान व्यक्तिगत या राजनीतिक मतभेदों से ऊपर देश के हित को प्राथमिकता देते हैं। इस बयान को सीधे तौर पर इमरान खान का आधिकारिक रुख मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इससे PTI की रणनीति में संभावित बदलाव की चर्चा जरूर तेज हो गई है।
सेना से टकराव कम करने के संकेत क्यों अहम?
इमरान खान को अप्रैल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए प्रधानमंत्री पद से हटाया गया था। इसके बाद उनका सैन्य प्रतिष्ठान के साथ टकराव लगातार बढ़ता गया। मई 2023 में उनकी गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए और सैन्य प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया गया।
इसके बाद PTI नेताओं और कार्यकर्ताओं पर बड़े पैमाने पर कानूनी कार्रवाई हुई। पार्टी के कई नेताओं को गिरफ्तार किया गया और संगठन पर दबाव बढ़ता चला गया। ऐसे हालात में सेना के साथ सीधी राजनीतिक लड़ाई जारी रखना PTI के लिए कठिन साबित हुआ है।
यही कारण है कि जुल्फिकार बुखारी का बयान पार्टी की संभावित व्यावहारिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक अस्तित्व बचाने की रणनीति?
इमरान खान और PTI के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में कानूनी मामलों के साथ पार्टी के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखना शामिल है। लगातार मुकदमों, गिरफ्तारियों और संगठन पर दबाव के बीच सेना से टकराव कम करना पार्टी के लिए बातचीत का रास्ता खोल सकता है।
इसे ‘सरेंडर’ कहने के बजाय राजनीतिक रणनीति में बदलाव के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा। पाकिस्तान के इतिहास में नागरिक सरकारों और सेना के बीच शक्ति संघर्ष लंबे समय से चलता आया है। ऐसे में किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए सैन्य प्रतिष्ठान को पूरी तरह नजरअंदाज करके सत्ता की राजनीति करना आसान नहीं रहा है।
क्या बैकचैनल बातचीत की तैयारी है?
PTI नेतृत्व के नरम होते बयानों के पीछे सैन्य प्रतिष्ठान के साथ पर्दे के पीछे बातचीत की संभावना भी देखी जा रही है। सार्वजनिक बयानबाजी में तनाव कम होने पर दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक समाधान तलाशने का रास्ता खुल सकता है।
ऐसी किसी बातचीत की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इसे फिलहाल संभावना के रूप में ही देखा जाना चाहिए। हालांकि PTI के लिए इसका उद्देश्य इमरान खान की स्थिति, पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को राहत तथा भविष्य में राजनीतिक गतिविधियों के लिए अधिक जगह हासिल करना हो सकता है।
आसिम मुनीर इतने प्रभावशाली क्यों?
पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका ऐतिहासिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण रही है। देश में कई बार सैन्य शासन रहा है और नागरिक सरकारों के दौर में भी राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति तथा रणनीतिक मामलों में सेना का प्रभाव मजबूत रहा है।
जनरल आसिम मुनीर के कार्यकाल में भी सेना की भूमिका केवल रक्षा और सुरक्षा मामलों तक सीमित नहीं दिखाई देती। आर्थिक और निवेश संबंधी फैसलों में सैन्य नेतृत्व की भागीदारी ने उसके प्रभाव को और महत्वपूर्ण बनाया है।
हालांकि संवैधानिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख होता है और सेना प्रमुख को प्रधानमंत्री के ‘बराबर’ संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है। लेकिन पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में सैन्य प्रतिष्ठान के व्यापक संस्थागत प्रभाव के कारण सेना प्रमुख को बेहद शक्तिशाली पद माना जाता है।
SIFC ने बढ़ाई सेना की आर्थिक भूमिका
पाकिस्तान में विशेष निवेश सुविधा परिषद यानी Special Investment Facilitation Council (SIFC) के जरिए विदेशी निवेश और आर्थिक परियोजनाओं को गति देने का प्रयास किया गया है। इस व्यवस्था में सैन्य नेतृत्व की भागीदारी ने अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में भी सेना की भूमिका को मजबूत किया।
इसके अलावा तस्करी, अवैध व्यापार और विदेशी मुद्रा से जुड़ी गैरकानूनी गतिविधियों के खिलाफ अभियानों में भी सैन्य संस्थानों की भूमिका चर्चा में रही है।
विदेश नीति में भी सेना का प्रभाव
पाकिस्तान की चीन, अमेरिका, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे महत्वपूर्ण देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी में सेना की भूमिका लंबे समय से अहम रही है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC से लेकर आतंकवाद विरोधी नीति और क्षेत्रीय सुरक्षा तक कई मामलों में सैन्य नेतृत्व का प्रभाव दिखाई देता है।
आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों और सैन्य खुफिया ढांचे पर नियंत्रण भी सेना प्रमुख को पाकिस्तान की सत्ता संरचना में बेहद प्रभावशाली बनाता है।
इमरान के लिए आगे का रास्ता क्या?
इमरान खान की आगे की राजनीति काफी हद तक उनके कानूनी मामलों, संभावित रिहाई और PTI तथा सैन्य प्रतिष्ठान के संबंधों पर निर्भर करेगी। यदि दोनों पक्षों के बीच तनाव कम होता है तो पाकिस्तान में लंबे समय से जारी राजनीतिक गतिरोध को कम करने का रास्ता बन सकता है।
फिलहाल जुल्फिकार बुखारी के बयान को इमरान खान की ओर से पूर्ण समझौते या ‘सरेंडर’ की घोषणा नहीं माना जा सकता। लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि PTI के भीतर सेना से लगातार टकराव के बजाय संवाद और राजनीतिक समाधान की संभावनाओं पर विचार हो रहा है। आने वाले समय में यही रणनीति पाकिस्तान की राजनीति की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में से एक बन सकती है।
