“ठीक हूँ”: केवल दो शब्द नहीं, एक पूरी कहानी, अंशुल जैन शास्त्री का भावपूर्ण आलेख
हर मुस्कुराता चेहरा प्रसन्न नहीं होता, हर मौन व्यक्ति अहंकारी नहीं होता और हर बार “ठीक हूँ” कहने वाला वास्तव में ठीक हो, यह जरूरी नहीं
(भाव लेखक: अंशुल जैन शास्त्री)
जब भी हम किसी से मिलते हैं, तो औपचारिकता का पहला सवाल अक्सर यही होता है, “कैसे हैं आप?” और जवाब मिलता है, “जी, ठीक हूँ।” लेकिन ठहरकर सोचिए, क्या हर बार यह कहने वाला व्यक्ति सचमुच ठीक होता है? या “ठीक हूँ” उन परिस्थितियों को छिपाने का एक सलीका है, जिन्हें हर किसी के सामने प्रकट नहीं किया जा सकता?
इन दो शब्दों के पीछे छिपी अनकही कहानियाँ
कभी-कभी इन दो शब्दों के पीछे असंख्य कहानियाँ छिपी होती हैं। किसी के मन में भविष्य की चिंता है, कोई परिवार की जिम्मेदारियों से जूझ रहा है, कोई अपनों के बदलते व्यवहार से आहत है, तो कोई ऐसे संघर्ष से गुजर रहा है जिसका अनुमान लगाना भी कठिन है। भीतर विचारों का तूफान चल रहा होता है, फिर भी होंठों पर एक ही जवाब आता है, “मैं ठीक हूँ।” क्योंकि हर किसी के पास अपना दुःख सुनाने के लिए कोई अपना नहीं होता, और हर किसी के सामने दुःख सुनाना उचित भी नहीं लगता।
जब मौन को समझ लिया जाता है अहंकार
जीवन की एक विडंबना यह भी है कि जो व्यक्ति अपनी पीड़ा को मौन में समेट लेता है, संसार कभी-कभी उसी मौन को उसका अहंकार समझ बैठता है। लोग सोचते हैं कि उसे किसी की परवाह नहीं, जबकि हो सकता है कि वह भीतर ही भीतर खुद को संभालने की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा हो।
सबसे बड़ी लड़ाइयाँ अंतर्मन में लड़ी जाती हैं
मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ प्रायः युद्ध के मैदान में नहीं, उसके अपने अंतर्मन में लड़ी जाती हैं। वहाँ न कोई दर्शक होता है, न तालियाँ बजाने वाला, न संघर्ष की गवाही देने वाला। वहाँ केवल व्यक्ति होता है, उसके विचार और परिस्थितियों से उबरने का उसका निरंतर प्रयास। जिस प्रकार आग केवल चिता पर ही नहीं जलती, उसी प्रकार पीड़ा केवल आँसुओं में प्रकट नहीं होती। कभी वह मौन बन जाती है, कभी जिम्मेदारी, कभी मुस्कान, और कभी इन्हीं दो शब्दों में सिमट जाती है।
अगली बार जब कोई कहे “मैं ठीक हूँ”
लेखक का संदेश है कि अगली बार जब कोई कहे कि वह ठीक है, तो उसके शब्दों को ही उसकी पूरी हकीकत न मान लें। उसे कमजोर समझकर सहानुभूति न दें और उसके मौन को अहंकार का नाम भी न दें। बस अपने व्यवहार में थोड़ी संवेदनशीलता और दिल में थोड़ी जगह रखें। हो सकता है उसे सलाह की जरूरत न हो, केवल इतना भरोसा चाहिए कि यदि वह कभी सचमुच टूटने लगे, तो कोई ऐसा हो जिसके सामने उसे “मैं ठीक हूँ” कहने का अभिनय न करना पड़े।
मजबूत होने का असली अर्थ
लेखक के अनुसार मजबूत होने का अर्थ यह नहीं कि दुःख नहीं होता। मजबूत होने का अर्थ है दुःख के बावजूद खुद को संभालना, हार न मानना और भीतर कितना भी अँधेरा हो, जीवन में प्रकाश खोजते रहना। इसलिए किसी के “ठीक हूँ” कहने पर उसके संघर्षों का फैसला न करें। हर कहानी शब्दों में नहीं कही जाती, हर पीड़ा आँसुओं में नहीं बहती और हर संघर्ष दिखाई नहीं देता। कुछ लोग टूटकर भी खुद को समेट लेते हैं और दुनिया से कहते हैं, “हाँ, मैं ठीक हूँ।”
