चंदेरी: आस्था के नौ रूप और जवाबदेही के नौ सवाल
डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चंदेरी’
चंदेरी की धरती निराली है। यहाँ इतिहास पत्थरों पर लिखा है और संस्कृति जीवन में बसी है। किले की ऊँचाई पर गर्व होता है, पर बरसात में सदर बाजार की गलियाँ नदी का छोटा रूप बन जाती हैं। इतिहास के पत्थर सदियों से टिके हैं, जबकि जनता की समस्याएँ हर बरसात में नए सिरे से सिर उठाती हैं। नवरात्र में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा हो रही है। इन नौ देवियों को जनता की नौ बुनियादी अपेक्षाओं से जोड़ें, तो एक सीधा सवाल उभरता है: आश्वासन से आगे काम कब दिखेगा?
पानी और शिक्षा: बुनियादी जरूरतें
पानी (माँ शैलपुत्री): चंदेरी बावड़ियों और तालाबों की विरासत वाला नगर है, इसलिए यहाँ जल प्रबंधन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। समस्या आने पर कोई पुरानी सरकार को दोष देता है, कोई भविष्य की योजना गिनाता है, और जनता खाली बर्तन लेकर निकल जाती है। उसे बैठकों की संख्या नहीं, यह जानना है कि घर में पानी कितने दिन और कितने समय आएगा।
शिक्षा (माँ ब्रह्मचारिणी): मंचों पर डिजिटल इंडिया की बातें खूब होती हैं, पर असली परीक्षा कक्षा में है। शिक्षक पर्याप्त हैं या नहीं, पुस्तकालय और प्रयोगशाला हैं या नहीं, गरीब विद्यार्थियों को मार्गदर्शन मिल रहा है या नहीं, इसका सार्वजनिक आकलन होना चाहिए। देश का भविष्य भाषणों में नहीं, कक्षाओं में बनता है।

सुरक्षा और स्वास्थ्य: नागरिक की सुविधा
महिला सुरक्षा (माँ चंद्रघंटा): नारी सम्मान का अर्थ केवल उत्सवों में सम्मान नहीं है। बेटी सुरक्षित स्कूल जा सके, महिला निर्भय होकर बाजार पहुँचे और शिकायत पर समय से कार्रवाई हो, यही कसौटी है। सार्वजनिक स्थानों पर रोशनी और शिकायतों की सुनवाई जरूरी है।
अस्पताल (माँ कूष्मांडा): बीमार को डॉक्टर, दवा और जाँच चाहिए, उद्घाटन समारोह नहीं। सितंबर 2026 में अस्पताल मार्ग पर जलभराव, गंदे पानी और गड्ढों की खबर आई थी। अस्पताल पहुँचने के लिए सड़क की परीक्षा पास करनी पड़े, तो विकास की भी स्वास्थ्य-जाँच जरूरी है।
बच्चों का पोषण (माँ स्कंदमाता): योजनाओं की सफलता फाइल में नहीं, थाली में दिखनी चाहिए। आंगनवाड़ी केंद्र नियमित चल रहे हैं या नहीं और सहायता जरूरतमंद परिवारों तक पहुँच रही है या नहीं, इसका पारदर्शी आकलन होना चाहिए।
रोजगार और नशा: युवाओं का भविष्य
रोजगार (माँ कात्यायनी): चंदेरी की साड़ी की पहचान दूर तक है, पर सवाल है कि कारीगरों और युवाओं की आमदनी उतनी बढ़ी या नहीं। पर्यटक का खर्च स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुँचे, इसके लिए पर्यटन, हस्तशिल्प, कौशल प्रशिक्षण और छोटे उद्यमों को साथ बढ़ावा देना होगा।
नशा (माँ कालरात्रि): नशा केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है। शिकायतों पर निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है, पर युवाओं को खेल मैदान, पुस्तकालय, प्रशिक्षण और परामर्श जैसे अवसर भी चाहिए। केवल “गलत रास्ते पर मत जाओ” कहना काफी नहीं।
सफाई और सुशासन: जलभराव से जवाबदेही तक
सफाई और जलनिकासी (माँ महागौरी): सितंबर 2026 में भारी बारिश के बाद सदर बाजार में पानी भरा और दुकानों में घुस गया। बारिश प्रकृति का काम है, पर निकासी की व्यवस्था नगर प्रबंधन का। बार-बार जलभराव वाले स्थानों पर अस्थायी सफाई नहीं, तकनीकी सर्वेक्षण और स्थायी समाधान चाहिए। जनता निरीक्षण की तस्वीर नहीं, समाधान की तस्वीर चाहती है।
सुशासन (माँ सिद्धिदात्री): चुनाव में जनता मालिक होती है, उसके बाद फरियादी क्यों बन जाती है? प्रमुख कार्यों की सूची, बजट, शुरुआत और समाप्ति की तारीख और जिम्मेदार विभाग सार्वजनिक होने चाहिए। काम समय पर हो तो श्रेय मिले, देरी हो तो कारण बताए जाएँ।

जनप्रतिनिधियों से पाँच सीधे सवाल
ये सवाल किसी दल के विरोध में नहीं, जवाबदेही की भावना से हैं:
- क्या सभी वार्डों में पेयजल, सड़क, नाली, सफाई और स्ट्रीट लाइट का सार्वजनिक सर्वेक्षण हुआ है?
- सदर बाजार और अस्पताल मार्ग के जलभराव के लिए क्या समयबद्ध कार्ययोजना है?
- पर्यटन और साड़ी उद्योग से युवाओं, कारीगरों और महिलाओं को रोजगार देने के लिए क्या ठोस कदम उठे हैं?
- स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सुरक्षा और पोषण योजनाओं का लाभ पात्र नागरिकों तक पहुँच रहा है या नहीं, इसकी सार्वजनिक समीक्षा कैसे होती है?
- नगरपालिका के कार्यों, बजट और प्रगति की जानकारी नागरिकों को आसानी से क्यों न मिले?
अंतिम बात: आस्था के साथ जवाबदेही
समस्याएँ एक दिन में नहीं बनीं, न एक दिन में सुलझेंगी, और इसमें पूर्ववर्ती तथा वर्तमान दोनों व्यवस्थाओं की भूमिका है। पर पुरानी समस्या का हवाला देकर वर्तमान जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। राजनीति का उद्देश्य आरोप नहीं, प्रतिस्पर्धा के जरिए बेहतर काम होना चाहिए। व्यंग्य का मकसद भी केवल हँसाना नहीं, सोचने पर विवश करना है।
इसलिए चंदेरी की जनता का सवाल सीधा है: ढोलिया गेट, राजघाट रोड और बाजार से दिल्ली दरवाजे का पानी कब निकलेगा, अस्पताल का रास्ता कब सुधरेगा, और आम आदमी को अपने काम के लिए कितनी बार दफ्तर जाना पड़ेगा? इनका उत्तर नारों में नहीं, काम में दिखना चाहिए।
माँ दुर्गा से प्रार्थना है कि आस्था की ज्योति जलती रहे और जनसेवा का संकल्प कागजों से निकलकर धरातल पर दिखे। जय माता दी!
डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चंदेरी’, राष्ट्रीय गौरव, सामाजिक चिंतक एवं पत्रकार
