ममता बनर्जी ने जिस चुनाव चिह्न को खुद बनाया, वह कैसे हुआ फ्रीज? इंदिरा गांधी भी खो चुकी थीं पार्टी का सिंबल
तृणमूल कांग्रेस में विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने ‘फूल और घास’ चिह्न पर लगाई अस्थायी रोक, दोनों गुटों को दिए अलग नाम और निशान
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। चुनाव आयोग ने आंतरिक विवाद के कारण ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का नाम और उसका प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया है। यह वही प्रतीक है जिसे पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने स्वयं तैयार किया था और जो करीब तीन दशकों से तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान बना हुआ था।
आयोग के अंतरिम फैसले के बाद ममता बनर्जी और प्रतिद्वंद्वी गुट में से कोई भी मूल पार्टी का नाम तथा चुनाव चिह्न इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। अंतिम निर्णय आने तक दोनों पक्ष अलग-अलग नाम और प्रतीकों के साथ चुनाव लड़ेंगे। चुनाव आयोग ने यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों को ध्यान में रखते हुए की है।
ममता गुट को मिला ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चिह्न
चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया है। इस गुट को अस्थायी रूप से ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। वहीं, अरूप रॉय के नेतृत्व वाले विरोधी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया गया है।
दोनों गुट पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी उपचुनावों में इन्हीं अस्थायी नामों और निशानों के आधार पर अपने उम्मीदवार उतार सकेंगे। आयोग का यह निर्णय फिलहाल अंतरिम है और मूल तृणमूल कांग्रेस पर अधिकार का अंतिम फैसला विस्तृत सुनवाई के बाद किया जाएगा।
ममता ने खुद बनाया था ‘जोड़ा घास फूल’
ममता बनर्जी वर्ष 1997 में कांग्रेस से अलग हुई थीं और 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना हुई। पार्टी का चुनाव चिह्न बांग्ला में ‘जोड़ा घास फूल’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें घास की दो पत्तियों के बीच दो फूल दिखाई देते हैं। यह चिह्न पार्टी की जमीनी राजनीति और साधारण कार्यकर्ताओं की शक्ति का प्रतीक माना गया।
समय के साथ यह निशान पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की पहचान बन गया। पार्टी के झंडों, पोस्टरों और चुनाव प्रचार में इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ। अब संगठन पर दावे को लेकर विवाद पैदा होने के बाद चुनाव आयोग ने किसी एक गुट को तत्काल इसका अधिकार देने के बजाय इसे अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया है।
क्यों फ्रीज होता है पार्टी का चुनाव चिह्न?
जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विभाजन हो जाता है और दोनों गुट स्वयं को असली पार्टी बताते हैं, तब चुनाव आयोग उनके संगठनात्मक तथा विधायी समर्थन की जांच करता है। दोनों पक्षों के दावों पर अंतिम निर्णय में समय लगने और इस बीच चुनाव निकट होने की स्थिति में मूल नाम एवं प्रतीक फ्रीज किया जा सकता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य किसी एक गुट को विवादित चुनाव चिह्न का लाभ लेने से रोकना है। जांच पूरी होने तक दोनों पक्षों को अस्थायी नाम और उपलब्ध चुनाव चिह्न दिए जाते हैं। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सहित कई दलों में भी प्रतीक पर अधिकार को लेकर ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं।
इंदिरा गांधी के साथ 1969 में क्या हुआ था?
कांग्रेस में 1969 में बड़ा विभाजन हुआ था। एक ओर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का गुट था और दूसरी ओर पार्टी संगठन के पुराने नेताओं का समूह। विभाजन से पहले कांग्रेस का चुनाव चिह्न ‘जुए के नीचे दो बैल’ था। दोनों पक्षों ने स्वयं को असली कांग्रेस बताते हुए इस पर दावा किया।
विवाद के बाद पुराना प्रतीक फ्रीज हो गया। इंदिरा गांधी के गुट को बाद में ‘गाय और बछड़ा’ चिह्न मिला, जबकि विरोधी संगठन कांग्रेस को अलग चुनाव निशान दिया गया। वर्ष 1978 में कांग्रेस में एक और विभाजन के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आई) को ‘हाथ’ का चुनाव चिह्न मिला, जो आज भी कांग्रेस की पहचान है।
इस प्रकार पार्टी विभाजन के कारण किसी बड़े नेता का अपना स्थापित चुनाव चिह्न खोना भारतीय राजनीति में पहली बार नहीं हुआ है। ममता बनर्जी ने आयोग के निर्णय को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। अब अंतिम फैसले से तय होगा कि तृणमूल कांग्रेस का मूल नाम और ‘फूल एवं घास’ चिह्न किस गुट को मिलेगा।
