ग्वालियर जमीन घोटाला में करोड़ों रुपये की पैतृक जमीन हड़पने के लिए सरकारी खसरा रिकॉर्ड गायब करने का आरोप। कोर्ट के आदेश पर बलविंदर उर्फ पलविंदर सिंह, सुरेंद्र सिंह सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
ग्वालियर जमीन घोटाला
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में करोड़ों रुपये की पैतृक जमीन हड़पने का एक बड़ा मामला सामने आया है। आरोप है कि भू-माफियाओं ने राजस्व विभाग के रिकॉर्ड से छेड़छाड़ करते हुए वर्ष 1999 से 2004 के बीच का खसरा पंचशाला रिकॉर्ड गायब करा दिया। इसके बाद जमीन को अपनी बताकर उसकी प्लॉटिंग कर 13 लोगों को रजिस्ट्री कर बेच दिया गया।
अब इस पूरे मामले में कोर्ट के आदेश पर यूनिवर्सिटी थाना पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
छह बीघा 16 बिस्वा जमीन का मामला
जानकारी के अनुसार पुरानी छावनी क्षेत्र के गंगा-मालनपुर गांव निवासी गोकुल कुमार जाटव ने शिकायत दर्ज कराई है कि उनके पिता शंकरलाल जाटव ने 4 जुलाई 1973 को छह बीघा 16 बिस्वा जमीन खरीदी थी।यह जमीन वर्षों से राजस्व रिकॉर्ड में परिवार के नाम दर्ज थी।
सरकारी रिकॉर्ड गायब करने का आरोप
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि बलविंदर उर्फ पलविंदर सिंह, सुरेंद्र सिंह तथा उनके अन्य साथियों ने मिलकर वर्ष 1999 से 2004 के बीच का खसरा पंचशाला रिकॉर्ड ही गायब करा दिया।रिकॉर्ड गायब होने के बाद जमीन पर फर्जी तरीके से मालिकाना हक दिखाया गया।
13 लोगों को बेच दिए प्लॉट
बताया गया कि सर्वे नंबर 495 की करीब एक बीघा जमीन पहले सुमेर सिंह कुशवाह के नाम दर्ज कराई गई।इसके बाद 31 मई 2021 को रजिस्ट्री कराई गई।आरोप है कि सुमेर सिंह ने जमीन पर प्लॉटिंग कर ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी, दतिया और राजस्थान के धौलपुर के कुल 13 लोगों को प्लॉट बेच दिए।
निर्माण शुरू होने पर हुआ खुलासा
पीड़ित परिवार को इस पूरे फर्जीवाड़े की जानकारी तब लगी जब खरीदार जमीन पर निर्माण कार्य कराने पहुंचे।इसके बाद परिवार ने पुलिस और एसएसपी कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।आखिरकार पीड़ित ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट के आदेश पर FIR दर्ज
मामले की सुनवाई के बाद न्यायालय ने यूनिवर्सिटी थाना पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए।इसके बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
राजस्व कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में
शिकायत में यह भी कहा गया है कि वर्ष 1999 से 2004 के बीच सरकारी रिकॉर्ड गायब होना बिना राजस्व विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत के संभव नहीं था।इस कारण जांच के दौरान संबंधित कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आने पर उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
करोड़ों रुपये की बताई जा रही जमीन
जिस जमीन को लेकर विवाद है उसकी मौजूदा बाजार कीमत लगभग एक करोड़ रुपये प्रति बीघा बताई जा रही हैइस हिसाब से छह बीघा से अधिक जमीन की कीमत छह करोड़ रुपये से ज्यादा आंकी जा रही है।
पुलिस करेगी पूरे मामले की जांच
एफआईआर दर्ज होने के बाद अब पुलिस यह पता लगाएगी कि
- सरकारी रिकॉर्ड कैसे गायब हुआ।
- किन अधिकारियों की भूमिका रही।
- फर्जी रजिस्ट्री कैसे हुई।
- कितने लोगों को जमीन बेची गई।
- आरोपियों ने कितनी आर्थिक लाभ कमाया।
