गुरु पूर्णिमा पर बड़े जैन मंदिर में श्रद्धा और भक्ति का आयोजन, आचार्य उदारसागर ने बताया गुरु को आत्मकल्याण का मार्गदर्शक
मुरैना (मनोज जैन नायक)। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर, मुरैना में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने गुरु की महिमा बताते हुए कहा कि जैन धर्म में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। उन्होंने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु जीवन के तीन प्रमुख आधार हैं, जिनके मार्गदर्शन से व्यक्ति आत्मकल्याण के पथ पर आगे बढ़ता है।
आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि गुरु आत्मकल्याण के मार्ग के सच्चे पथ प्रदर्शक होते हैं। अपने तप, त्याग, संयम और ज्ञान के प्रकाश से गुरु जीव को अज्ञानरूपी अंधकार से निकालकर सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की ओर ले जाते हैं। गुरु केवल सांसारिक शिक्षा देने वाले नहीं होते, बल्कि वे आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराने वाले महान मार्गदर्शक होते हैं।
उन्होंने कहा कि गुरु के सान्निध्य से व्यक्ति के जीवन में विवेक, विनय, करुणा, क्षमा, अहिंसा और संयम जैसे गुणों का विकास होता है। गुरु की शिक्षाएं मनुष्य को राग-द्वेष और कषायों से दूर कर आत्म उन्नति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि गुरु के उपदेशों को केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारना चाहिए। सत्य, अहिंसा, संयम, स्वाध्याय और आत्मचिंतन को अपनाकर ही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा व्यक्त की जा सकती है।
गुरु बिन ज्ञान न होय — मुनिश्री उपशांतसागर
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने कहा कि “गुरु बिन ज्ञान न होय।” गुरु के बिना जीवन को सही दिशा मिलना कठिन है। उन्होंने बताया कि ‘गु’ अज्ञान का प्रतीक है और ‘रु’ ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक माना गया है। जो व्यक्ति के जीवन से अज्ञान का अंधकार दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाए, वही सच्चा गुरु कहलाता है।
मुनिश्री ने कहा कि गुरु अपने तप, त्याग और आदर्श जीवन के माध्यम से शिष्यों को आत्मकल्याण और मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं। गुरु का मार्गदर्शन जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है और व्यक्ति को श्रेष्ठ आचरण की ओर अग्रसर करता है।

अभिषेक, शांतिधारा और पूजन के साथ हुआ शुभारंभ
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी। धार्मिक कार्यक्रमों की शुरुआत अभिषेक, शांतिधारा और जिनेंद्र भगवान के पूजन के साथ हुई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज के चरणों में वंदन कर गुरु महिमा का गुणगान किया।
इस अवसर पर श्रावक श्रेष्ठी प्रेमचंद जैन, पदमचंद जैन, डॉ. मनोज जैन, वीरेंद्र जैन, रविंद्र जैन, मनीष जैन सहित अनेक श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्यश्री का पाद प्रक्षालन किया। महिला मंडल द्वारा जिनवाणी (शास्त्र) भेंट कर गुरु भक्ति का परिचय दिया गया।
संतों की गरिमामयी उपस्थिति रही
समारोह में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज के साथ मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज, ऐलकश्री उत्साहसागरजी महाराज, क्षुल्लकश्री उपकारसागरजी महाराज और क्षुल्लिका माताजी की गरिमामयी उपस्थिति रही।
चित्र अनावरण और दीप प्रज्वलन के बाद महिला मंडलों द्वारा आचार्यश्री अभिनंदनसागरजी महाराज, आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज और आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज का अष्टद्रव्य से पूजन कर श्रद्धापूर्वक अर्घ्य समर्पित किए गए।

भजनों से भक्तिमय हुआ वातावरण
गुरु पूर्णिमा समारोह के दौरान अरिहंत म्यूजिकल ग्रुप द्वारा गुरु महिमा और जिनेंद्र भक्ति से जुड़े मधुर भजनों की प्रस्तुति दी गई। भक्ति गीतों से पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रद्धा से भर उठा।
पूरे आयोजन में गुरु भक्ति, धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने गुरु के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए धर्म मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
