Green Infrastructure को भूलने का नतीजा: देश में बढ़ रही हीट वेव, पर्यावरणविद् प्रो. ज्याणी की चेतावनी
देश में लगातार बढ़ती गर्मी और हीट वेव की स्थिति को लेकर पर्यावरणविद् प्रो. श्यामसुंदर ज्याणी ने गंभीर चिंता जताई है। इंदौर में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम “Green Infrastructure” को समझने और अपनाने में पीछे रह गए हैं, जिसका सीधा असर जलवायु परिवर्तन और तापमान में वृद्धि के रूप में दिखाई दे रहा है। उन्होंने बताया कि देश में हर साल करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही वास्तव में पेड़ बन पाते हैं, क्योंकि उनकी देखभाल और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा जाता।
प्रो. ज्याणी ने जोर देकर कहा कि केवल वृक्षारोपण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मिट्टी, पानी, हवा और जैव विविधता जैसे प्राकृतिक तत्वों के संतुलन को समझना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों की अलग जरूरतें होती हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना पर्यावरणीय असंतुलन को और बढ़ाता है।
करोड़ों पौधे, लेकिन परिणाम सीमित
प्रो. ज्याणी ने कहा कि देश में हर साल करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही जीवित रहकर बड़े पेड़ बन पाते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पौधरोपण के साथ-साथ उनकी देखभाल और स्थानीय परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है।
उनके अनुसार, कई बार हम क्षेत्र की जरूरतों को नजरअंदाज कर एक ही तरह की पौधारोपण नीति अपनाते हैं, जो सफल नहीं हो पाती।
Green Infrastructure क्यों जरूरी है?
क्षेत्रीय जरूरतों को समझना जरूरी
प्रो. ज्याणी ने उदाहरण देते हुए कहा कि मध्यप्रदेश जैसे घने जंगलों वाले क्षेत्रों में पौधे आसानी से पनप जाते हैं, लेकिन राजस्थान जैसे रेगिस्तानी क्षेत्रों में पेड़ लगाने के लिए अलग रणनीति की जरूरत होती है।
हर क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु अलग होती है, इसलिए पौधों का चयन भी उसी के अनुसार होना चाहिए। एक ही मॉडल पूरे देश में लागू नहीं किया जा सकता।
कृषि और पर्यावरण पर भी असर
उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर कृषि पर भी पड़ रहा है। पहले जहां कम उर्वरक से अधिक उत्पादन होता था, वहीं अब अधिक संसाधनों के बावजूद उत्पादन घट रहा है।
उनके अनुसार, यह स्थिति दर्शाती है कि हमारी मिट्टी की गुणवत्ता और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, जिसका सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर
प्रो. ज्याणी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक व्यक्ति या संस्था का काम नहीं है, बल्कि यह सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक समाज, सरकार और स्थानीय समुदाय मिलकर काम नहीं करेंगे, तब तक बड़े बदलाव संभव नहीं हैं।
उन्होंने हवा, पानी और मिट्टी की सुरक्षा को सबसे जरूरी बताया और कहा कि इन्हीं तीन तत्वों पर पूरा जीवन निर्भर है।
सोशल इकोलॉजी की जरूरत
पर्यावरणविद् ने “सोशल इकोलॉजी” की अवधारणा पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि जैसे हर क्षेत्र का खान-पान अलग होता है, वैसे ही पर्यावरणीय जरूरतें भी अलग-अलग होती हैं।
यदि हम प्रकृति और समाज के बीच संतुलन समझकर काम करेंगे, तो पर्यावरण संरक्षण स्वाभाविक रूप से संभव हो सकेगा।
निष्कर्ष
प्रो. श्यामसुंदर ज्याणी के अनुसार, केवल वृक्षारोपण अभियान चलाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्थानीय समझ और दीर्घकालिक योजना की जरूरत है।
बढ़ती हीट वेव और जलवायु परिवर्तन के बीच उनका संदेश स्पष्ट है कि “ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर” को समझना और अपनाना अब समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।
