लोभ व्यक्ति को विनाश और पतन की ओर ले जाता है: साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी; 51 से अधिक श्रद्धालु कर रहे सिद्धि तप
Mahidpur Road Jain News: महिदपुर रोड स्थित श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के लिए विराजित परम पूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब आदि ठाणा के सान्निध्य में धर्म आराधना का क्रम जारी है। मंगलवार को धर्मसभा में साध्वीश्री ने क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों की व्याख्या करते हुए लोभ को मनुष्य के आध्यात्मिक और नैतिक पतन का प्रमुख कारण बताया। वहीं नगर में पहली बार 51 से अधिक तपस्वियों की सिद्धि तप आराधना गतिमान है। 20 अगस्त, गुरुवार से नवकार महामंत्र आराधना भी प्रारंभ होगी।
महिदपुर रोड। श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के लिए विराजित परम पूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब आदि ठाणा के पावन सान्निध्य में मंगलवार को धर्मसभा आयोजित की गई। बड़ी संख्या में समाजजनों ने धर्मसभा में उपस्थित होकर साध्वीश्री के प्रवचन का लाभ लिया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब ने मनुष्य के जीवन में क्रोध, मान, माया और लोभ के प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि चार कषायों में लोभ अत्यंत खतरनाक है। लोभ जब मनुष्य के मन में स्थान बना लेता है तो उसकी इच्छाएं लगातार बढ़ती जाती हैं और वह संतोष से दूर होता चला जाता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन में सुख और शांति चाहिए तो अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हुए संतोष, संयम और त्याग की भावना विकसित करनी चाहिए।
चार कषायों में लोभ अत्यंत खतरनाक
साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब ने कहा कि जैन दर्शन में क्रोध, मान, माया और लोभ को चार प्रमुख कषाय माना गया है। ये कषाय व्यक्ति को आत्मकल्याण के मार्ग से दूर करते हैं।
उन्होंने कहा कि इनमें लोभ का प्रभाव विशेष रूप से गंभीर हो सकता है। व्यक्ति के भीतर धन, संपत्ति या अन्य बाहरी पदार्थों को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा जब नियंत्रण से बाहर हो जाती है तो वह लोभ का रूप ले लेती है।
साध्वीश्री ने कहा कि आवश्यकता और लालच के बीच के अंतर को समझना जरूरी है। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति स्वाभाविक है, लेकिन आवश्यकता से अधिक पाने की निरंतर इच्छा मन की शांति को प्रभावित करती है।
‘लोभ का कोई थौभ नहीं होता’
धर्मसभा में साध्वीश्री ने कहा कि “लोभ का कोई थौभ नहीं होता”, अर्थात लोभ की कोई निश्चित सीमा नहीं होती। व्यक्ति जितना प्राप्त करता जाता है, उसकी इच्छाएं उतनी ही बढ़ सकती हैं।
उन्होंने समझाया कि लोभ का रंग यदि जीवन पर एक बार गहराई से चढ़ जाए तो उससे मुक्त होना आसान नहीं होता। इसी कारण धर्म मनुष्य को इच्छाओं पर नियंत्रण और संतोष की भावना अपनाने की प्रेरणा देता है।
धन या बाहरी वस्तुओं को पाने की अत्यधिक इच्छा मनुष्य को अपने वास्तविक उद्देश्य से दूर कर सकती है। जब व्यक्ति हर समय केवल संग्रह और प्राप्ति के बारे में सोचने लगता है, तब उसके जीवन से शांति और संतुष्टि कम होने लगती है।
लोभ से बचने के लिए संयम और संतोष जरूरी
साध्वीश्री ने कहा कि लोभ से बचने के लिए मनुष्य को अपने जीवन में संयम का अभ्यास करना चाहिए। हमारे पास जो उपलब्ध है, उसके प्रति संतोष का भाव विकसित करने से अनावश्यक इच्छाओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक साधना का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। व्यक्ति के व्यवहार और विचारों में परिवर्तन आना भी धर्म आराधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्रोध को क्षमा से, मान को विनम्रता से, माया को सरलता से और लोभ को संतोष तथा त्याग से कम करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मिक शांति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
51 से अधिक तपस्वियों की सिद्धि तप आराधना


महिदपुर जैन समाज के मीडिया प्रभारी सचिन भंडारी ने बताया कि नगर में पहली बार परम पूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब की पावन निश्रा में बड़े स्तर पर सिद्धि तप की आराधना चल रही है।
इस धार्मिक आराधना में 51 से अधिक सिद्धि तप तपस्वी साधना में लीन हैं। तपस्वियों की इस साधना को लेकर जैन समाज में विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिल रहा है।
समाजजन तपस्वियों की अनुमोदना करने के साथ धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। चातुर्मास के दौरान आयोजित विभिन्न धर्म आराधनाओं से नगर का वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।
भंडारी परिवार ने लिया साधार्मिक भक्ति का लाभ
मंगलवार की साधार्मिक भक्ति प्रभावना एवं संपूर्ण दिवस का लाभ लाभार्थी कोमलचंद-सचिन कुमार भंडारी परिवार, बप्पैया वाला द्वारा लिया गया।
परिवार की ओर से धार्मिक आयोजन में सहभागिता करते हुए तपस्वियों और समाजजनों की सेवा का लाभ लिया गया। समाज की ओर से लाभार्थी परिवार की धार्मिक भावना की अनुमोदना की गई।
चातुर्मास के दौरान विभिन्न परिवार धार्मिक आयोजनों, तपस्वियों की सेवा और साधार्मिक भक्ति में सहभागी होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
कोचर परिवार ने लिया तपस्वियों के पारणे का लाभ
सिद्धि तप करने वाले तपस्वियों के पारणे का लाभ रमेशचंद, अमित कुमार और अंकेश कुमार कोचर मावा वाला परिवार द्वारा लिया गया।
वहीं शाम के बियासने का लाभ अशोक कुमार, राकेश कुमार और ऋषभ कुमार कोचर मावा वाला परिवार ने प्राप्त किया।
इन धार्मिक कार्यक्रमों में समाज के विभिन्न परिवार लगातार सहयोग कर रहे हैं। तपस्वियों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके तप की अनुमोदना की जा रही है।
20 अगस्त से शुरू होगी नवकार महामंत्र आराधना
चातुर्मास के दौरान धर्म आराधना का क्रम आगे भी जारी रहेगा। गुरुवार, 20 अगस्त से श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में अत्यंत प्रभावशाली नवकार महामंत्र आराधना प्रारंभ होगी।
इस विशेष आराधना में करीब 25 तपस्वी विधि-विधान के साथ तप और धर्म साधना में लीन होंगे। नवकार महामंत्र जैन धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्र माना जाता है और इसकी आराधना को लेकर समाजजनों में विशेष उत्साह है।
कार्यक्रम साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब आदि ठाणा की पावन निश्रा में आयोजित होगा।
नवकार महामंत्र के माध्यम से होगी धर्म साधना
नवकार महामंत्र आराधना के दौरान तपस्वी निर्धारित धार्मिक विधियों का पालन करते हुए साधना करेंगे। इसके माध्यम से आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश दिया जाएगा।
साध्वीश्री के सान्निध्य में चातुर्मास के दौरान धर्मसभा, तप, जप, आराधना और अन्य धार्मिक गतिविधियां लगातार आयोजित की जा रही हैं।
समाज के महिला, पुरुष और युवा सदस्य भी इन कार्यक्रमों में शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में पहुंचे समाजजन
मंगलवार को आयोजित मंगलकारी धर्मसभा और अन्य कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने साध्वीश्री के प्रवचन सुनकर धर्मलाभ प्राप्त किया और तपस्वियों की तपस्या की अनुमोदना की।
साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब ने धर्मसभा के माध्यम से समाज को संदेश दिया कि जीवन को सुखी और सार्थक बनाने के लिए बाहरी संपदा से अधिक आंतरिक संतोष आवश्यक है।
