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भव्य कोटा राम कथा 2025: गुरुदेव जयकीर्ति जी गुरुराज का साधु-सेवा, धर्म, अणुव्रत और पद्म पुराण प्रसंगों पर दिव्य प्रवचन

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Published On: 23 November 2025
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भव्य श्रीराम कथा का तृतीय दिवस: गुरुदेव श्री जयकीर्ति जी गुरुराज ने साधु-सेवा, धर्म एवं चरित्र की महिमा पर दिया दिव्य उपदेश | Kota Ram Katha 2025 | Jain Dharma Pravachan

कोटा (राजस्थान)।
रामपुरा स्थित अकलंक स्कूल परिसर में चल रही पद्म पुराण आधारित भव्य श्रीराम कथा का आज तृतीय दिवस अद्भुत आध्यात्मिक माहौल के बीच सम्पन्न हुआ।
विशिष्ट राम कथाकार, अनुष्ठान विशेषज्ञ, परम पूज्य ध्यान दिवाकर मुनि प्रवर 108 श्री जयकीर्ति जी गुरुराज इन दिनों कोटा में विराजमान हैं। राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” ने बताया कि आज गुरुदेव की दिव्य वाणी, मधुर संगीत एवं भक्ति-रस से पूरा पंडाल मंत्रमुग्ध हो उठा और श्रद्धालु भक्ति में झूमने लगे।

साधु-सेवा ही सर्वोच्च सेवा — जितना विश्वास, उतना ही फल: गुरुदेव श्री जयकीर्ति जी

गुरुदेव ने अपनी अमृतमय वाणी में कहा—

“जीवन में जितने विश्वास के साथ साधु की सेवा की जाती है, उतना ही सेवा का फल प्राप्त होता है।
जितना समर्पण साधु के प्रति किया जाता है, उतनी ही कृपा साधु की प्राप्त होती है।”

उन्होंने यह भी बताया कि संसार में कई अवसर बार-बार मिल जाते हैं, परंतु साधु-सेवा का अवसर अत्यंत दुर्लभ है, जिसे तन-मन-धन एवं भाव से समर्पित होकर ही पाया जा सकता है।

धर्म और धन का अनोखा संबंध

गुरुदेव ने स्पष्ट कहा—

  • धन वही जो धर्म के साथ रहे।

  • जो धन धर्म से रहित है, वह मिट्टी के समान है।

  • चाहे धन कम हो या अधिक, यदि वह धर्म के साथ है तो सोने से भी कीमती है।

उन्होंने भक्ति एवं जीवन की नीतियाँ बताते हुए कहा कि जो देव-शास्त्र-गुरु के समक्ष भक्ति से नाचते हैं, उन्हें संसार के सामने नहीं नाचना पड़ता।

विद्या और कला प्राप्ति के लिए आवश्यक है तल्लीनता

गुरुदेव ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा—

  • “किसी भी विद्या या कला को सीखने के लिए उसमें डूबना पड़ता है,
    मन-प्राण से तल्लीन होना पड़ता है।
    तभी पूर्णता प्राप्त होती है।”

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रामकथा में आज के दिव्य प्रसंग: कपिल ब्राह्मण, यक्ष की नगरी और अणुव्रत अपनाने की प्रेरणा

आज की कथा में गुरुदेव ने पद्म पुराण के अद्भुत प्रसंगों को अत्यंत भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया—

कपिल ब्राह्मण का जीवन परिवर्तन

  • राम-लक्ष्मण-सीता कपिल ब्राह्मण के घर पहुँचे, जहाँ उनका अपमान हुआ।

  • बाद में यक्ष ने सुंदर नगरी बनाई, जिसे देखकर ब्राह्मण आश्चर्यचकित रह गया।

  • मुनिराज से धर्मोपदेश सुनकर उसके जीवन में परिवर्तन आया और उसने पत्नी सहित अणुव्रत अपनाए

  • प्रभु श्रीराम के दर्शन से उनकी दरिद्रता दूर हुई और अंततः उन्होंने जिनदीक्षा लेकर जीवन को धन्य किया।

अतिवीर्य राजा का वैराग्य

राम-लक्ष्मण ने अतिवीर्य राजा से युद्ध किया।
युद्ध में पराजय के बाद राजा ने वैराग्य धारण किया और निर्ग्रंथ पद में प्रविष्ट हुए।

द्वय मुनिराज का केवलज्ञान

वंशधर पर्वत पर द्वय मुनिराज उपसर्ग से जूझ रहे थे।
राम-लक्ष्मण-सीता ने उपसर्ग दूर किया और उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ।

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जटायु का रूपांतरण और अणुव्रत अंगीकार

एक कुरूप गिद्ध (जटायु) ने मुनिराज के चरणोदक सेवन से रत्नमय सुंदर रूप पाया।
जातिस्मरण होने से उसे पश्चाताप हुआ और उसने अणुव्रत धारण किए।

गुरुदेव ने कहा—

“चाहे कितना भी वैभव क्यों न हो, जिन शासन से बड़ी कोई विभूति नहीं।
जिन धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं।
और मुनिराज जैसा दयालु संसार में कोई नहीं।”

मंगलाचरण, पाद-प्रक्षालन और दीप-प्रज्वलन

पाद-प्रक्षालन

गुरुदेव का पाद प्रक्षालन
अकलंक संस्थान अध्यक्ष पीयूष बज एवं समस्त स्टाफ द्वारा किया गया।

दीप-प्रज्वलन

कार्यक्रम में दीप प्रज्वलन करने वाले प्रमुख श्रेष्ठिजन—

  • क्रांति जैन (अध्यक्ष, कोटा व्यापार महासंघ)

  • भागचंद लुहाड़िया

  • नवीन लुहाड़िया

  • पदम टोंग्या

  • चांदमल गंगवाल

  • पारस जैन “पार्श्वमणि”

  • रविन्द्र बाकलीवाल

  • जवाहर जैन

  • सुरेश सामरिया

  • महावीर ठग

गुरुदेव को मां जिनवाणी समर्पण

आज “मां जिनवाणी” को पालकी में रखकर गुरुदेव के करकमलों में समर्पित करने का सौभाग्य —

  • श्री विमलचंद जी

  • मनोज जी – साधना जी

  • पीयूष जी – पिंकी जी

  • शोभित जी – प्रीति जी

  • नुवान सरपटीया (मूवासवाला)

  • विजयपाडा परिवार

को प्राप्त हुआ।

धर्म चर्चा में राजा श्रेणिक की भूमिका

राजा श्रेणिक के रूप में प्रश्न पूछने वाले—

  • श्री पद्मकुमार जी

  • विद्युलता जी

  • राहुल

  • सोना

  • अनन्य

  • ग्रंथ गुलाबवाड़ी

पारस जैन “पार्श्वमणि” का संदेश: “धर्म सुनो, जीवन को धर्ममय बनाओ”

पत्रकार पारस जैन “पार्श्वमणि” ने कहा—

“जीवन को जीवंत करने के लिए श्रीराम कथा अवश्य सुनें।
इसे आत्मसात कर अपने जीवन को धर्ममय बनाएं और मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हों।”

लेखक/प्रस्तुति:
पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार, कोटा

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