Bhopal State Museum में गणेश के रंगों में सजा इतिहास
भोपाल। गणेशोत्सव के दौरान घर-घर विराजने वाले भगवान गणेश के स्वरूप को अगर कला और इतिहास की नजर से देखना हो, तो राजधानी स्थित राज्य संग्रहालय की गैलरियां खास आकर्षण का केंद्र हैं। यहां भगवान गणेश केवल प्राचीन पाषाण प्रतिमाओं में ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पेंटिंग्स में भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देते हैं। इन कलाकृतियों में धार्मिक आस्था के साथ उस समय की कला, संस्कृति, वेशभूषा और राजसी जीवन की झलक भी देखने को मिलती है।
पुरातत्वविद् बी.के. लोखंडे के अनुसार संग्रहालय में गणेश जी के कई दुर्लभ स्वरूप मौजूद हैं। इनमें गौरी गणेश, सौम्य स्वरूप, बाल्यकाल के क्रीड़ारत रूप, शक्ति के साथ उच्छिष्ट स्वरूप, सिद्धि के साथ गणेश, देवप्रकोष्ठ में रत्नजड़ित मुकुट धारण किए गणेश, एकदंत और अष्टभुजी नृत्यरत स्वरूप प्रमुख हैं। कुछ प्रतिमाएं स्थानक मुद्रा में हैं तो कुछ आसनस्थ मुद्रा में दिखाई देती हैं। इन पाषाण कलाकृतियों से गणेश पूजा की प्राचीन परंपरा और भारतीय शिल्पकला की समृद्ध विरासत का पता चलता है।
19वीं शताब्दी की पेंटिंग में सिंधिया दरबार
राज्य संग्रहालय की आकर्षक कलाकृतियों में 19वीं शताब्दी की एक पेंटिंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें सिंधिया दरबार में भगवान गणेश की पूजा का पूरा दृश्य चित्रित किया गया है। मराठा शैली से प्रभावित इस पेंटिंग को एक अंग्रेज कलाकार ने तैयार किया था।
इसमें महाराजा जीवाजीराव सिंधिया अपने दरबारियों और कर्मचारियों के साथ गणेश पूजा करते नजर आते हैं। पेंटिंग में करीब 120 चेहरों को बेहद बारीकी से उकेरा गया है। कई प्रमुख व्यक्तियों के नाम मोड़ी लिपि में लिखे गए हैं। इससे चित्र में मौजूद लोगों की पहचान करने में मदद मिलती है।
चित्र में पूजा स्थल पर गणेश प्रतिमा स्थापित है। सामने पूजा सामग्री रखी हुई है और आसपास दरबारी, कर्मचारी तथा पुजारी दिखाई देते हैं। नीचे भव्य आसन पर महाराजा जीवाजीराव सिंधिया विराजमान हैं। रंगीन पर्दे, सजी हुई छत और राजसी सजावट उस दौर के दरबार का वातावरण जीवंत कर देती है।
ऋद्धि-सिद्धि के साथ राजसी अंदाज
संग्रहालय की एक अन्य पेंटिंग में भगवान गणेश को ऋद्धि-सिद्धि के साथ राजसी स्वरूप में दिखाया गया है। गणेश जी स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित सिंहासन पर विराजमान हैं और उनके दोनों ओर ऋद्धि-सिद्धि खड़ी दिखाई देती हैं। प्राकृतिक परिवेश, बारीक रेखांकन और रंगों का संतुलित इस्तेमाल इस चित्र को खास बनाता है। यह पेंटिंग 19वीं शताब्दी की राजपूत चित्रशैली की विशेषताओं को दर्शाती है।
गणेश और मां सरस्वती की मनमोहक छवि
एक अन्य पेंटिंग में भगवान गणेश के साथ मां सरस्वती को प्राकृतिक वातावरण में चित्रित किया गया है। कमल पर विराजमान गणेश जी हाथों में अपने पारंपरिक आयुध धारण किए हुए हैं, जबकि मां सरस्वती वीणा बजाती हुई दिखाई देती हैं। आसपास पेड़-पौधे, हरियाली और खुला आकाश चित्र को प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान करते हैं।
इस पेंटिंग में कलाकार ने सीमित रंगों का इस्तेमाल करते हुए भी गहराई और आकर्षण पैदा किया है। यह कलाकृति भी 19वीं शताब्दी की राजपूत चित्रकला की कलात्मक विशेषताओं को सामने लाती है।
आस्था के साथ इतिहास की झलक
राज्य संग्रहालय की गणेश प्रतिमाएं और पेंटिंग्स यह बताती हैं कि भगवान गणेश भारतीय धार्मिक परंपरा के साथ-साथ कला और संस्कृति के भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। अलग-अलग कालखंडों में कलाकारों ने गणेश जी को अपनी कला और तत्कालीन सामाजिक परिवेश के अनुरूप अलग-अलग रूपों में चित्रित किया।
गणेशोत्सव के दौरान संग्रहालय की ये कलाकृतियां श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण बन सकती हैं। यहां भगवान गणेश के दर्शन के साथ भारतीय इतिहास, शिल्पकला और राजसी संस्कृति को भी करीब से समझने का अवसर मिलता है। इस तरह राज्य संग्रहालय की गैलरियां गणेश उत्सव को केवल धार्मिक पर्व के रूप में नहीं, बल्कि कला और विरासत से जोड़ने का माध्यम भी बन रही हैं।
