क्षमावाणी केवल क्षमा मांगना नहीं, मन से द्वेष मिटाना भी है: आचार्य उदारसागर
मुरैना में क्षमावाणी महोत्सव का आयोजन, पिता ने पुत्र, सास ने बहू और पति ने पत्नी से मांगी क्षमा
मुरैना (मनोज जैन नायक)। दशलक्षण महापर्व के समापन के बाद मनाए जाने वाले क्षमावाणी पर्व के अवसर पर मुरैना में चातुर्मासरत आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने क्षमा के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि क्षमावाणी केवल एक-दूसरे से औपचारिक रूप से क्षमा मांगने का अवसर नहीं, बल्कि अंतर्मन में झांककर आत्मावलोकन करने और राग-द्वेष, क्रोध तथा अहंकार जैसे विकारों को दूर करने का पर्व है।
आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य का जीवन संबंधों से बना है और संबंधों में मतभेद होना स्वाभाविक है। कई बार छोटी-सी बात अहंकार और क्रोध के कारण बड़ी बन जाती है। व्यक्ति अक्सर सामने वाले की गलती देखता है, लेकिन अपनी भूल स्वीकार करने में संकोच करता है। क्षमावाणी पर्व हमें इसी प्रवृत्ति को बदलने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को विचार करना चाहिए कि उसके मन, वचन और काय से किसी जीव को दुख तो नहीं पहुंचा, किसी के प्रति कटु भाव तो उत्पन्न नहीं हुआ और उसके व्यवहार से किसी का मन तो आहत नहीं हुआ।
क्षमा आत्मबल और संयम को मजबूत करती है
आचार्यश्री ने कहा कि क्षमा वीरों का आभूषण है। क्रोध करना आसान है, लेकिन प्रतिकूल परिस्थिति में स्वयं को शांत रखना और क्षमा का भाव बनाए रखना कठिन साधना है। वास्तविक वीर वही है, जो बदला लेने के अवसर पर भी क्षमा का मार्ग चुनता है।
उन्होंने कहा कि क्षमा केवल सामने वाले के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के लिए भी आवश्यक है। मन में क्रोध, शिकायत और द्वेष बनाए रखने से सबसे पहले व्यक्ति स्वयं अशांत होता है। ऐसे में दूसरे को क्षमा करना अपने मन को भी बोझ से मुक्त करना है। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छता जरूरी है, उसी प्रकार आत्मशुद्धि के लिए मन में जमा क्रोध और द्वेष को दूर करना आवश्यक है।
आचार्यश्री ने कहा कि अपनी भूल स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए। यदि हमारी किसी बात से माता-पिता, परिवारजन, मित्र, समाजजन अथवा किसी जीव को कष्ट पहुंचा हो तो मन से क्षमा मांगनी चाहिए। साथ ही जिसने हमारे साथ गलत व्यवहार किया है, उसे भी हृदय से क्षमा करने का प्रयास करना चाहिए।

मुनिश्री उपशांत सागर ने बताया ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ का भाव
मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि क्षमावाणी पर्व आत्मा के भीतर चल रहे संघर्ष को समाप्त करने का अवसर है। बाहर की शांति तभी संभव है, जब मन के भीतर शांति हो। क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार और द्वेष के साथ वास्तविक सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि क्षमावाणी के दिन केवल शब्दों में नहीं, बल्कि भावों में परिवर्तन का संकल्प लेना चाहिए। जैन दर्शन में ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ की भावना व्यापक है। इसका आशय है कि मन, वचन और काय से जाने-अनजाने में किसी के प्रति कोई अनुचित व्यवहार हुआ हो तो उसके लिए क्षमा मांगी जाए। इसी प्रकार दूसरों की भूलों को भी मन में गांठ बनाकर नहीं रखना चाहिए। क्षमा तभी पूर्ण मानी जाएगी, जब मन से पुरानी कटुता समाप्त हो जाए।
उत्तम क्षमा दशलक्षण धर्म का प्रथम लक्षण
जैन दर्शन में उत्तम क्षमा को दशलक्षण धर्म में प्रथम स्थान प्राप्त है। इसका अर्थ केवल किसी से माफी मांगना नहीं, बल्कि क्रोध और द्वेष का त्याग कर सभी जीवों के प्रति मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण रखना है।
दशलक्षण महापर्व के दस दिनों में साधक आत्मचिंतन और आत्मसंयम की साधना करता है। इसके समापन पर क्षमावाणी पर्व व्यक्ति को पूरे वर्ष के व्यवहार का आत्मावलोकन करने और जिन लोगों के प्रति मन में कटुता या द्वेष उत्पन्न हुआ हो, उसे समाप्त करने का अवसर देता है।
जैन परंपरा में क्षमा मांगना और क्षमा करना दोनों को आत्मशुद्धि का साधन माना गया है। क्षमा मांगने से अहंकार कम होता है और क्षमा करने से द्वेष समाप्त होता है। ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ की भावना इसी आत्मशुद्धि के साथ समस्त जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और अहिंसा का संदेश देती है।
पिता ने पुत्र, सास ने बहू और पति ने पत्नी से मांगी क्षमा
बड़े जैन मंदिर में आयोजित क्षमावाणी महोत्सव में भावनात्मक दृश्य देखने को मिले। पिता ने पुत्र से, सास ने बहू से और पति ने पत्नी से जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगी। समाजजनों ने एक-दूसरे से क्षमा याचना कर आपसी कटुता और मनमुटाव समाप्त करने का संकल्प लिया।
आचार्यश्री उदारसागर एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज के सान्निध्य में हुए सामूहिक क्षमावाणी कार्यक्रम में अध्यक्ष एवं पूर्व प्राचार्य अनिल जैन, नेमीचंद जैन, दीपचंद जैन और दर्शनलाल जैन ने क्षमावाणी के महत्व पर विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन एडवोकेट दिनेश जैन बरैया ने किया।
इस अवसर पर श्री जिनेन्द्र प्रभु का कलशाभिषेक भी किया गया। बड़ी संख्या में समाजजन कार्यक्रम में उपस्थित रहे और क्षमा, संयम, मैत्री तथा सद्भाव के संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
