ग्वालियर में श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हो रहा श्री इंद्रध्वज तेरह दीप महामंडल विधान, इंद्र-इंद्राणियों ने की तीर्थंकरों की आराधना
वासुपूज्य दिगंबर जैन मंदिर में चौथे दिन उमड़े श्रद्धालु, भक्ति, पूजन और धर्मसभा से गूंजा जिनालय परिसर
ग्वालियर। वासुपूज्य दिगंबर जैन मंदिर समिति, ग्वालियर एवं दिगंबर जैन महिला मंडल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित श्री इंद्रध्वज तेरह दीप महामंडल विधान पूरी श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक उल्लास के साथ संपन्न हो रहा है। विधान के चौथे दिन शुक्रवार को मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण देखने को मिला। बड़ी संख्या में श्रद्धालु सुबह से ही जिनालय पहुंचे और भगवान जिनेंद्र की आराधना, पूजन एवं स्तुति कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
इस दौरान धार्मिक परंपराओं के अनुरूप इंद्र एवं इंद्राणियों के स्वरूप में श्रद्धालुओं ने नंदीश्वर द्वीप स्थित अनादि-अनंत जिनालयों की भावनात्मक आराधना की। मंत्रोच्चार, भक्ति गीत, जयघोष और ध्वजा समर्पण के साथ पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो गया। श्रद्धालुओं ने भगवान जिनेंद्र के चरणों में पूजा-अर्चना कर आत्मशुद्धि एवं शाश्वत पुण्य की कामना की।
चौथे दिन भक्ति और उल्लास से गूंजा मंदिर परिसर
श्री इंद्रध्वज तेरह दीप महामंडल विधान के चौथे दिन सुबह से ही वासुपूज्य दिगंबर जैन मंदिर में श्रद्धालुओं का आगमन प्रारंभ हो गया था। मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया था और धार्मिक ध्वजों, रंगोली तथा पुष्प सज्जा ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
जैसे ही विधान प्रारंभ हुआ, श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भगवान जिनेंद्र की स्तुति, मंत्रोच्चार और पूजन में भाग लिया। पूरे आयोजन के दौरान धर्म, संयम और आत्मकल्याण की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
इंद्र और इंद्राणियों ने की भावपूर्ण पूजा
विधान के अंतर्गत इंद्र एवं इंद्राणियों के स्वरूप में सजे श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान जिनेंद्र की पूजा-अर्चना की।
भक्ति गीतों, मंगलाचरण और जयघोष के बीच इंद्र-इंद्राणियां नृत्य करते हुए जिनालय पहुंचे और पारंपरिक विधि-विधान से भगवान की पूजा कर ध्वजा समर्पित की।
इस धार्मिक दृश्य ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। मंदिर परिसर में मौजूद लोगों ने इस अनूठे आयोजन को आध्यात्मिक आनंद का अद्भुत अनुभव बताया।
नंदीश्वर द्वीप के जिनालयों की भावना से हुई आराधना
धार्मिक मान्यता के अनुसार विधान के दौरान श्रद्धालुओं ने नंदीश्वर द्वीप स्थित अनादि-अनंत जिनालयों की भावनात्मक आराधना की।
जैन धर्म में नंदीश्वर द्वीप का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु भावपूर्वक वहां स्थित तीर्थंकर भगवानों की पूजा का ध्यान करते हुए अपने जीवन में सदाचार, संयम और आत्मशुद्धि का संकल्प लेते हैं।
पूरे विधान के दौरान भक्तों ने भक्ति और साधना के माध्यम से आत्मिक शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति की कामना की।
मंत्रोच्चार के साथ हुआ श्रीजी का अभिषेक
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि विधान के अंतर्गत विधानाचार्य पंडित अनुभव जैन एवं पंडित अमन शास्त्री के सान्निध्य में वैदिक एवं जैन मंत्रों के साथ भगवान श्रीजी का भव्य अभिषेक संपन्न हुआ।
अभिषेक के दौरान सौधर्म इंद्र के रूप में महेशचंद्र जैन सहित इंद्र-इंद्राणियों ने जयकारों के बीच भगवान का अभिषेक किया।
श्रद्धालुओं ने “जय जिनेंद्र” के उद्घोष के साथ भगवान की आराधना कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
विधि-विधान से संपन्न हुई नौ पूजाएं
विधानाचार्य पंडित अंकुर शास्त्री जैन के निर्देशन में संपूर्ण विधान धार्मिक परंपराओं के अनुरूप संपन्न हुआ।
उन्होंने मंत्रोच्चार एवं विधि-विधान के साथ नौ पूजाओं का संचालन कराया, जिसमें इंद्र एवं इंद्राणियों ने नृत्य और भक्ति के साथ भगवान जिनेंद्र की पूजा की तथा ध्वजा समर्पित कर धर्म आराधना की।
पूजा के प्रत्येक चरण में श्रद्धालु पूरी आस्था और अनुशासन के साथ सहभागी बने रहे।
श्रद्धालुओं की उमड़ी भारी भीड़

श्री इंद्रध्वज तेरह दीप महामंडल विधान में ग्वालियर शहर सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन पहुंच रहे हैं।
महिलाएं, पुरुष, युवा और बच्चे सभी धार्मिक उत्साह के साथ कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं।
आयोजकों के अनुसार विधान के प्रत्येक दिन श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है और सभी भगवान जिनेंद्र की आराधना कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
धर्मसभा में विधानाचार्य अंकुर शास्त्री का प्रेरक संबोधन
धर्मसभा को संबोधित करते हुए विधानाचार्य पंडित अंकुर शास्त्री जैन ने कहा कि इंद्रध्वज विधान जैन धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण और पुण्यदायक धार्मिक अनुष्ठान है।
उन्होंने कहा कि इस विधान के माध्यम से की जाने वाली मंत्र आराधना, पूजन और भक्ति से श्रद्धालुओं को मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
उन्होंने कहा कि यह विधान केवल बाहरी पूजा नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का माध्यम है।
“इंद्रध्वज विधान शाश्वत पुण्य का उदय है”
अपने प्रवचन में अंकुर शास्त्री ने कहा कि इंद्रध्वज महामंडल विधान शाश्वत पुण्य का उदय कराने वाला महान धार्मिक अनुष्ठान है।
उन्होंने कहा कि भगवान जिनेंद्र की पूजा-भक्ति से आत्मा शुद्ध होती है और जीव को सिद्ध अवस्था प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहें, बल्कि भगवान के बताए संयम, तप, सदाचार और अहिंसा के मार्ग को अपने जीवन में भी अपनाएं।
वीतरागी भाव अपनाने का दिया संदेश
धर्मसभा में विधानाचार्य ने कहा कि वीतरागी मुद्रा का चिंतन मनुष्य के भीतर मौजूद राग-द्वेष को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भगवान जिनेंद्र के आदर्शों के निकट रहता है, उनके गुणों का चिंतन करता है और संयम व तप को जीवन में अपनाता है, उसके लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन, आत्मसंयम और सदाचार को जीवन का आधार बनाने की प्रेरणा दी।
धार्मिक आयोजन से समाज में बढ़ रहा आध्यात्मिक वातावरण

वासुपूज्य दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित यह धार्मिक अनुष्ठान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिक चेतना और धार्मिक संस्कारों को भी मजबूत कर रहा है।
श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को जैन धर्म के सिद्धांतों, अहिंसा, संयम और आत्मकल्याण की भावना को समझने का अवसर मिलता है।
प्रमुख पदाधिकारी रहे उपस्थित
इस अवसर पर मंदिर समिति के अध्यक्ष सतीशचंद्र जैन, महामंत्री नेमीचंद्र जैन, सुरेंद्र जैन, राजेंद्र जैन, देव जैन सहित बड़ी संख्या में समाज के वरिष्ठजन, महिला मंडल की सदस्याएं एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।
सभी ने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले स्वयंसेवकों एवं समाजजनों का आभार व्यक्त किया और आगामी दिनों में भी अधिक से अधिक श्रद्धालुओं से धर्मलाभ लेने की अपील की।
भक्ति, साधना और आत्मकल्याण का अनुपम संगम
ग्वालियर में आयोजित श्री इंद्रध्वज तेरह दीप महामंडल विधान श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का अनुपम संगम बन गया है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की सहभागिता यह दर्शाती है कि समाज में धार्मिक आयोजनों के प्रति आस्था और उत्साह निरंतर बना हुआ है।
विधान के माध्यम से श्रद्धालु केवल पूजा-अर्चना ही नहीं कर रहे, बल्कि संयम, सदाचार, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प भी ले रहे हैं। यही इस महान धार्मिक आयोजन का सबसे बड़ा संदेश और उद्देश्य है।
