Fact Check: क्या 1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगता है 10,000 लीटर पानी? जानिए इस दावे की पूरी सच्चाई
Ethanol Water Consumption: सोशल मीडिया पर वायरल 10,000 लीटर पानी वाले दावे का सच क्या है? जानें प्लांट में वास्तविक पानी की खपत, खेती के Water Footprint और एथेनॉल उत्पादन का पूरा गणित
नई दिल्ली। Ethanol Water Consumption Fact Check: देश में पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर बहस लगातार जारी है। एथेनॉल को पेट्रोल में मिलाने से जहां ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने, किसानों की आय बढ़ाने और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की बात कही जाती है, वहीं इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी कई सवाल उठते रहे हैं।
इन्हीं सवालों में सबसे ज्यादा चर्चा इस दावे की होती है कि एक लीटर एथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर पानी खर्च हो जाता है। सोशल मीडिया पोस्ट और कुछ चर्चाओं में यह आंकड़ा इस तरह पेश किया जाता है, जैसे एथेनॉल फैक्ट्री सीधे 10,000 लीटर पानी लेकर एक लीटर एथेनॉल तैयार करती है।
लेकिन सरकारी फैक्ट-चेक के अनुसार यह दावा भ्रामक है। जुलाई 2026 में जारी भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया है कि एथेनॉल प्लांट में लगभग 3 से 5 लीटर processed water प्रति लीटर एथेनॉल का इस्तेमाल होता है। आधुनिक डिस्टिलरी में Zero Liquid Discharge जैसी प्रणालियों का इस्तेमाल भी किया जाता है।
तो फिर 10,000 लीटर का आंकड़ा कहां से आया? इसे समझने के लिए एथेनॉल प्लांट की पानी की खपत और उसके कच्चे माल की खेती में इस्तेमाल होने वाले पानी को अलग-अलग समझना जरूरी है।
10,000 लीटर पानी वाला दावा कहां से आया?
एथेनॉल बनाने में पानी की चर्चा करते समय अक्सर दो अलग-अलग चीजों को एक साथ जोड़ दिया जाता है।
पहली है औद्योगिक प्रक्रिया यानी डिस्टिलरी में इस्तेमाल होने वाला पानी।
दूसरी है कच्चे माल को उगाने में इस्तेमाल होने वाला कृषि जल।
गन्ना, धान, मक्का और अन्य फसलों को उगाने में पानी की जरूरत होती है। यदि किसी अध्ययन में किसी फसल के पूरे कृषि Water Footprint को उस फसल से बनने वाले एथेनॉल के साथ जोड़ दिया जाए तो प्रति लीटर एथेनॉल का आंकड़ा काफी बड़ा दिखाई दे सकता है।
भारत सरकार के आधिकारिक फैक्ट-चेक ने भी इसी अंतर को महत्वपूर्ण बताया है। उसके अनुसार धान की खेती के पूरे कृषि जल फुटप्रिंट को एथेनॉल उत्पादन पर डालना सही तरीका नहीं है। एथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाला चावल भी खाद्य सुरक्षा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अनुमत surplus rice से जुड़ा होता है।
इसलिए 10,000 लीटर को सीधे “एक लीटर एथेनॉल बनाने के लिए फैक्ट्री में इस्तेमाल होने वाला पानी” कहना सही नहीं है।
एथेनॉल प्लांट में वास्तविक पानी की खपत कितनी है?
भारत सरकार के जुलाई 2026 के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार एक एथेनॉल प्लांट में लगभग 3–5 लीटर processed water प्रति लीटर एथेनॉल का उपयोग होता है।
यह आंकड़ा 10,000 लीटर के दावे से बिल्कुल अलग है।
यानी अगर किसी आधुनिक प्लांट में एक लीटर एथेनॉल का उत्पादन किया जाता है तो औद्योगिक प्रक्रिया के स्तर पर पानी की खपत हजारों लीटर नहीं मानी जाती।
हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि सभी प्लांट बिल्कुल एक जैसे नहीं होते। पानी की खपत प्लांट की तकनीक, कच्चे माल, क्षमता, recycling व्यवस्था, cooling system और wastewater treatment जैसे कई कारकों पर निर्भर कर सकती है।
इसीलिए किसी एक संख्या को हर प्रकार की डिस्टिलरी पर लागू करना उचित नहीं होगा।
Zero Liquid Discharge सिस्टम क्या करता है?
आधुनिक एथेनॉल डिस्टिलरी में पानी के पुन: उपयोग पर काफी जोर दिया जाता है।
भारत सरकार के फैक्ट-चेक के मुताबिक आधुनिक डिस्टिलरी में Zero Liquid Discharge यानी ZLD सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य प्लांट से निकलने वाले तरल अपशिष्ट को नियंत्रित करना और उपलब्ध पानी को अधिक से अधिक recycle/reuse करना है।
इसका मतलब यह नहीं है कि एथेनॉल प्लांट में पानी की कोई खपत ही नहीं होती। इसका अर्थ यह है कि तकनीक के जरिए पानी और अपशिष्ट के प्रबंधन को अधिक कुशल बनाने की कोशिश की जाती है।
इसलिए एथेनॉल उद्योग में Water Management एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय विषय है।
क्या खेती में लगने वाला पानी भी एथेनॉल के खाते में जोड़ा जाना चाहिए?
यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
यदि गन्ने या मक्के को उगाने में पानी का इस्तेमाल हुआ है तो उसका Water Footprint निश्चित रूप से मौजूद है। लेकिन उस पूरी फसल को केवल एथेनॉल उत्पादन के लिए उगाया गया हो, ऐसा हर मामले में नहीं होता।
गन्ने से चीनी, शीरा और अन्य उत्पाद भी बनते हैं। इसी तरह मक्का और अन्य अनाजों के भी अनेक उपयोग होते हैं।
इसलिए पूरी फसल की खेती में लगे पानी को केवल एथेनॉल उत्पादन पर डाल देना एक जटिल कृषि-औद्योगिक प्रक्रिया को एक ही संख्या में बदल देता है।
NITI Aayog की एथेनॉल ब्लेंडिंग पर रिपोर्ट में भी अलग-अलग feedstocks के लिए Water Footprint के आंकड़े दिए गए हैं और यह बताया गया है कि sugarcane, rice और maize जैसे कच्चे माल के मामले में कृषि जल और औद्योगिक प्रक्रिया के पानी को अलग-अलग समझना जरूरी है।
गन्ने से एथेनॉल बनाने की प्रक्रिया क्या है?
भारत में एथेनॉल उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा sugar industry से जुड़े feedstock से आता है।
गन्ने से चीनी उत्पादन के दौरान बनने वाले molasses यानी शीरे का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए किया जा सकता है।
सामान्य प्रक्रिया में feedstock को fermentation के लिए तैयार किया जाता है। इसके बाद fermentation से alcohol तैयार होता है और distillation के जरिए उसे fuel-grade ethanol के लिए आवश्यक स्तर तक शुद्ध किया जाता है।
यानी पेट्रोल में मिलाया जाने वाला fuel ethanol सीधे खेत से आने वाला गन्ने का रस नहीं होता। यह एक औद्योगिक प्रक्रिया से गुजरता है।
भारत सरकार भी molasses और grain-based दोनों प्रकार की ethanol production capacity को बढ़ावा दे रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 31 अक्टूबर 2025 तक देश की ethanol production capacity बढ़कर 1,953 करोड़ लीटर हो गई थी।
चावल और मक्का से भी बनता है एथेनॉल
एथेनॉल उत्पादन केवल गन्ने तक सीमित नहीं है।
भारत में grain-based distilleries भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें मक्का, टूटे चावल और अन्य अनुमत feedstocks का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सरकारी नीति में feedstock diversification को बढ़ावा दिया गया है, ताकि एथेनॉल की उपलब्धता बढ़ाई जा सके और केवल एक स्रोत पर निर्भरता कम हो।
हालांकि खाद्य फसलों के इस्तेमाल को लेकर Food Security का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। सरकार के आधिकारिक फैक्ट-चेक के अनुसार एथेनॉल के लिए surplus rice का उपयोग निर्धारित और अनुमत व्यवस्था के तहत किया जाता है।
क्या एथेनॉल प्लांट भूजल को खत्म कर रहे हैं?
एथेनॉल प्लांट और भूजल को लेकर भी कई सवाल उठते हैं।
यहां भी किसी एक सामान्य नियम से सभी डिस्टिलरी को देखना उचित नहीं होगा। पानी का स्रोत और उसका उपयोग प्रत्येक प्लांट की पर्यावरणीय मंजूरी, स्थानीय जल उपलब्धता और संचालन व्यवस्था पर निर्भर करता है।
कई प्लांटों में पानी के reuse और recycling के लिए तकनीकी व्यवस्थाएं होती हैं। कुछ परियोजनाओं में cooling और process water को दोबारा उपयोग करने की व्यवस्था भी की जाती है।
इसलिए किसी खास एथेनॉल प्लांट के बारे में यह पता लगाने के लिए उसकी Environmental Clearance, water budget और Consent to Operate जैसे दस्तावेजों को देखना अधिक विश्वसनीय तरीका होगा।
अलग-अलग डिस्टिलरी में पानी की खपत अलग हो सकती है
यह भी समझना जरूरी है कि “एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत” के लिए एक ही सार्वभौमिक संख्या नहीं हो सकती।
पुरानी तकनीक और आधुनिक तकनीक वाले प्लांट में अंतर हो सकता है। इसी तरह molasses-based और grain-based processes में भी पानी की जरूरत अलग हो सकती है।
एक सरकारी पर्यावरणीय दस्तावेज में 150 KLPD डिस्टिलरी के लिए fresh water consumption का विशिष्ट उदाहरण दिया गया है, जिसमें पानी के reuse और process requirements को अलग-अलग दर्शाया गया है।
इससे यह समझ आता है कि पानी की खपत का आंकड़ा प्लांट की तकनीक और water recycling system से काफी प्रभावित होता है।
पुराने अध्ययनों में ज्यादा आंकड़े क्यों दिख सकते हैं?
समय के साथ डिस्टिलरी तकनीक में बदलाव हुआ है।
पुराने या अलग तकनीक पर आधारित अध्ययनों में water consumption और effluent generation के आंकड़े आज की आधुनिक डिस्टिलरी से अलग हो सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर एक पुराने दस्तावेज में distillery process के लिए अधिक water/effluent generation और recycling के जरिए उसे कम करने की तकनीक का उल्लेख मिलता है।
इसलिए किसी पुराने अध्ययन में मिले आंकड़े को बिना संदर्भ के आज के हर आधुनिक ethanol plant पर लागू करना उचित नहीं है।
क्या इसका मतलब एथेनॉल पूरी तरह पर्यावरण-मुक्त है?
नहीं।
यह कहना भी सही नहीं होगा कि एथेनॉल उत्पादन का पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
एथेनॉल उत्पादन में feedstock cultivation, fertilizer use, transportation, processing, energy consumption और water management जैसे कई environmental factors शामिल होते हैं।
इसलिए किसी भी biofuel का मूल्यांकन करते समय केवल एक आंकड़े—जैसे “कितना पानी लगता है”—के आधार पर पूरा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
एथेनॉल के फायदे और चुनौतियों का आकलन पूरे lifecycle के आधार पर किया जाना चाहिए।
फिर एथेनॉल को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है?
भारत सरकार के Ethanol Blended Petrol Programme का उद्देश्य पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर imported fossil fuel पर निर्भरता कम करना, किसानों और sugar mills को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना तथा ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार Ethanol Supply Year 2024-25 में पेट्रोल में 19.24 प्रतिशत blending हासिल हुई थी। सरकार ने 2025-26 के लिए 20 प्रतिशत blending का लक्ष्य रखा था।
सरकार के अनुसार एथेनॉल blending से sugar mills को बेहतर cash flow मिला है और इससे किसानों को भी लाभ पहुंच सकता है।
एथेनॉल और किसानों का संबंध
भारत में एथेनॉल नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य कृषि अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करना है।
Sugar mills को molasses और अन्य ethanol feedstocks से अतिरिक्त revenue मिलता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 से 2023-24 के बीच sugar mills ने ethanol की बिक्री से ₹1 लाख करोड़ से अधिक revenue अर्जित किया था।
इसके अलावा सरकार ने ethanol production capacity बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाओं के जरिए distilleries और sugar mills को प्रोत्साहन दिया है।
