झाबुआ के साहित्य साधक डॉ. रामशंकर चंचल ने रक्षाबंधन पर बच्चों की खुशी में शामिल होकर अपना प्रिय फिल्मी गीत गाया। 70 की उम्र में उनका यह मस्तमौला अंदाज सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहा है।
डॉ रामशंकर चंचल झाबुआ का अद्भुत अंदाज: 70 की उम्र में गीत गाकर बटोरी बेहिसाब सराहना
झाबुआ। डॉ रामशंकर चंचल झाबुआ अपनी साहित्य साधना और फकीरी की मस्ती के कारण एक सम्मानजनक नाम के रूप में पहचाने जाते हैं। अपनी लेखनी के माध्यम से देश-दुनिया में दस्तक देने वाले डॉ. रामशंकर चंचल का एक अलग ही अंदाज रक्षाबंधन के पर्व पर देखने को मिला। घर में बच्चों की खुशियों में शामिल होते हुए उन्होंने 70 वर्ष की उम्र में अपना प्रिय फिल्मी गीत ‘चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए’ सुनाया।
उनके इस अंदाज ने परिवार के सदस्यों को तो आनंदित किया ही, सोशल मीडिया पर भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। वीडियो सामने आने के बाद उनके चाहने वालों को डॉ. रामशंकर चंचल के व्यक्तित्व का एक और पहलू देखने को मिला।
डॉ रामशंकर चंचल झाबुआ का गीत बना आकर्षण
डॉ रामशंकर चंचल झाबुआ ने गीत को अपनी मस्ती और सहज अंदाज में गाया। इसके बाद वीडियो को फेसबुक और गूगल सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किया गया। वीडियो देखने वाले कई लोगों के लिए यह सुखद आश्चर्य था कि साहित्य की दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाले डॉ. चंचल गीत भी इतनी रुचि और मस्ती के साथ गाते हैं।
उनका यह वीडियो हजारों चाहने वालों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वीडियो पर लोगों की ओर से बधाइयां, शुभकामनाएं और सराहना मिल रही है। डॉ. चंचल के लिए लोगों का यह प्यार उनके लंबे साहित्यिक और सामाजिक जुड़ाव को भी दर्शाता है।
चाहने वालों के प्यार को बताया सबसे बड़ा आशीष
वीडियो को मिल रही सराहना के बीच जब डॉ. रामशंकर चंचल से पूछा गया कि वे इतना अच्छा गाते भी हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए इसका श्रेय अपने चाहने वालों को दिया।
उन्होंने कहा कि यह इस फकीर के प्रति चाहने वालों का बेहिसाब प्यार और आशीष है। उन्होंने बताया कि जब वे घूमने जाते हैं तो अक्सर मस्ती में गुनगुनाते रहते हैं। उन्हें गायन का शौक रहा है और कभी मंच पर भी गीत सुनाया करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने मंच पर गाना बंद कर दिया।
साहित्य के साथ चित्रकला और गायन का भी रहा शौक
डॉ रामशंकर चंचल झाबुआ का व्यक्तित्व केवल साहित्य और कविता तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बताया कि वे चित्र भी बनाते रहे हैं। उनकी कविताओं और रचनाओं के साथ उनके बनाए कई चित्र भी प्रकाशित हुए हैं।
साहित्य, चित्रकला और गायन—तीनों विधाओं से उनका जुड़ाव रहा है। हालांकि समय के साथ उन्होंने अपना मुख्य ध्यान लेखन और नई कविताओं पर केंद्रित कर दिया।
इस संदर्भ में उन्हें महान कवि रहीम की प्रसिद्ध सीख ‘एके साधे सब सधै’ याद आई। इसके बाद उन्होंने मुख्य रूप से साहित्य साधना को ही अपने जीवन का प्रमुख हिस्सा बनाया और लगातार नई रचनाओं के सृजन में लगे रहे।
70 की उम्र में भी वही फकीरी की मस्ती
उम्र के 70वें पड़ाव पर भी डॉ. रामशंकर चंचल की सहजता और फकीरी की मस्ती लोगों को आकर्षित करती है। रक्षाबंधन जैसे पारिवारिक पर्व पर बच्चों की खुशी में शामिल होकर गीत गाना उनके इसी सहज व्यक्तित्व की झलक माना जा रहा है।
उनका कहना है कि जीवन में मिले लोगों के प्यार और आशीर्वाद से बड़ी कोई उपलब्धि नहीं है। यही कारण है कि वीडियो पर मिल रही प्रतिक्रियाओं को भी वे अपनी गायकी की उपलब्धि के बजाय अपने चाहने वालों का प्रेम मानते हैं।
सोशल मीडिया पर मिल रही बधाइयां
डॉ रामशंकर चंचल झाबुआ का यह वीडियो सोशल मीडिया पर उनके चाहने वालों के बीच चर्चा में है। साहित्य के माध्यम से उन्हें जानने वाले लोगों को इस वीडियो के जरिए उनकी गायकी और मस्तमौला अंदाज से रूबरू होने का अवसर मिला।
रक्षाबंधन के अवसर पर परिवार के बीच सामने आया यह वीडियो अब डॉ. चंचल के हजारों चाहने वालों के लिए भी खास बन गया है। साहित्य, चित्रकला और गीत-संगीत से उनका जुड़ाव यह बताता है कि रचनात्मकता किसी एक विधा तक सीमित नहीं होती।
रिपोर्टर: झाबुआ प्रतिनिधि

