सुपात्र को दिया गया दान ही कहलाता है सुपात्र दान : साध्वी श्री निराग रसा श्री जी
संवाददाता :संयम जैन
महिदपुर रोड में धर्मसभा का आयोजन, चातुर्मास के दौरान साध्वीश्री ने दान की महिमा और चतुर्विध दान का बताया महत्व
महिदपुर रोड। नगर में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य साध्वी श्री अमृत रसा श्री जी, साध्वी श्री निराग रसा श्री जी महाराज साहब आदि ठाणा के सानिध्य में धर्मसभा का आयोजन किया गया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी श्री निराग रसा श्री जी महाराज साहब ने सुपात्र दान की महिमा बताते हुए कहा कि जो दान प्राप्त करने के योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, उसे सुपात्र दान कहा जाता है। गृहस्थ जीवन में सुपात्र दान को परम धर्म और आत्मशुद्धि का प्रमुख साधन माना गया है।
साध्वीश्री ने कहा कि दान केवल किसी वस्तु या धन को देने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर त्याग, सेवा और करुणा की भावना को विकसित करता है। जब दान योग्य एवं गुणवान व्यक्ति को श्रद्धा और निस्वार्थ भाव से दिया जाता है, तो इससे पुण्य का संचय होता है तथा मनुष्य के भीतर मोह और लोभ की भावना धीरे-धीरे कम होती है।
उन्होंने बताया कि साधु, साध्वी, संत, मुनि और ज्ञानी गुरु जैसे सुपात्रों को आवश्यकतानुसार आहार, औषधि, ज्ञान और अभय प्रदान करना पुण्यदायी माना गया है। इस प्रकार के दान से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक संस्कारों का विकास होता है और वह आत्मकल्याण एवं मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
संयम और शील का पालन करने वाले होते हैं सुपात्र
साध्वी श्री निराग रसा श्री जी ने सुपात्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संयमी, शीलवान, तपस्वी तथा जैन महाव्रतों का पालन करने वाले संत एवं मुनि सुपात्र माने जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों को श्रद्धा एवं समर्पण भाव से दान देना धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि दान देते समय व्यक्ति के मन में किसी प्रकार का अहंकार नहीं होना चाहिए। यदि दान केवल दिखावे के लिए किया जाए या उसके बदले किसी फल की अपेक्षा रखी जाए तो दान की वास्तविक भावना कमजोर हो जाती है। इसलिए दान हमेशा विनम्रता, श्रद्धा और निस्वार्थ भाव से करना चाहिए।
चार प्रकार का होता है चतुर्विध दान
धर्मसभा में साध्वीश्री ने जैन धर्म में बताए गए चार प्रकार के दान की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आहार दान, औषधि दान, ज्ञान दान और अभय दान को चतुर्विध दान कहा जाता है।
आहार दान के माध्यम से जरूरतमंद एवं साधु-साध्वियों की भोजन संबंधी आवश्यकता की पूर्ति की जाती है। औषधि दान के माध्यम से बीमार या जरूरतमंद व्यक्ति को उपचार एवं दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं। ज्ञान दान के माध्यम से व्यक्ति को सही ज्ञान और जीवन को बेहतर बनाने वाली शिक्षा प्रदान की जाती है। वहीं अभय दान का अर्थ भय से मुक्ति प्रदान करना है।
साध्वीश्री ने कहा कि इन चारों प्रकार के दान का अपना विशेष महत्व है और इन्हें श्रद्धा एवं सामर्थ्य के अनुसार किया जाना चाहिए।

दान से कम होता है मोह और लोभ
धर्मसभा में साध्वीश्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में मोह और लोभ अनेक प्रकार के बंधनों का कारण बनते हैं। दान की भावना इन विकारों को कम करने में सहायक होती है। जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं से आगे बढ़कर दूसरों के कल्याण के लिए कुछ त्याग करता है, तो उसके भीतर करुणा और संवेदना का विकास होता है।
उन्होंने कहा कि दान का उद्देश्य केवल पुण्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करना और जीवन में त्याग की भावना को मजबूत करना भी है। निस्वार्थ सेवा एवं दान के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
धार्मिक भक्ति एवं प्रभावना का लाभ
महिदपुर रोड जैन समाज के मीडिया प्रभारी सचिन भंडारी ने बताया कि चातुर्मास के दौरान धार्मिक गतिविधियों का क्रम लगातार जारी है। इसी क्रम में संपूर्ण दिवस धार्मिक भक्ति एवं प्रभावना का लाभ विभिन्न परिवारों द्वारा लिया गया।
उन्होंने बताया कि धार्मिक भक्ति एवं प्रभावना का लाभ रमेशचंद्र-अजीत कुमार बोथरा परिवार द्वारा लिया गया। वहीं सिद्धितप तपस्वियों के सुबह के पारणे का लाभ अजय कुमार-आशीष कुमार चौरड़िया परिवार ने लिया।
शाम के बियासने का लाभ मनोहरलाल, जितेंद्र कुमार, हेमंत कुमार एवं सिद्धार्थ कुमार कोचर परिवार तथा मावा वाला परिवार द्वारा लिया गया।
जैन श्रीसंघ ने लिया धर्मलाभ
धर्मसभा एवं मंगल कार्यक्रम में सकल जैन श्रीसंघ के सदस्यों के साथ बाहर से पधारे श्रद्धालु एवं महानुभाव तथा चातुर्मास समिति के सदस्य उपस्थित रहे। सभी ने साध्वीश्री के प्रवचन का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन धार्मिक आयोजन, प्रवचन और भक्ति कार्यक्रमों के माध्यम से समाजजनों को धर्म, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि का संदेश दिया जा रहा है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इन आयोजनों में शामिल होकर साध्वीश्री के प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं।

निस्वार्थ दान की प्रेरणा
धर्मसभा के माध्यम से साध्वी श्री निराग रसा श्री जी ने समाजजनों को दान की वास्तविक भावना समझाते हुए कहा कि दान करते समय व्यक्ति को अपनी भावना पर विशेष ध्यान देना चाहिए। दान दिखावे के लिए नहीं बल्कि सेवा और आत्मकल्याण की भावना से किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य किसी योग्य व्यक्ति या जरूरतमंद की सहायता करता है और बदले में किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखता, तब उसके भीतर त्याग और करुणा का भाव मजबूत होता है। यही भावना व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने साध्वीश्री के संदेश को ध्यानपूर्वक सुना और जीवन में दान, संयम एवं सेवा की भावना को अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान धार्मिक वातावरण बना रहा और श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ आयोजन में सहभागिता की।
