साधु-संतों की निंदा नहीं, उनके गुणों को ग्रहण करें : आचार्यश्री उदारसागर
धर्मसभा में गुरु-भक्ति, आत्मशुद्धि और गुणग्राही दृष्टि का दिया संदेश; 19 अगस्त को मनाया जाएगा भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव
मुरैना (मनोज जैन नायक)। साधु-संतों और गुरुओं का उपकार जीवन में कभी नहीं भूलना चाहिए। वे स्वयं के आत्मकल्याण के साथ-साथ प्राणीमात्र के कल्याण की भावना रखते हैं। उनका जीवन त्याग, संयम, तप और आत्मसाधना का प्रतीक होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को साधु-संतों के प्रति श्रद्धा, विनय और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। यह विचार चातुर्मासरत ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री 108 उदारसागरजी महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि किसी साधु-संत अथवा गुरु की बुराई या निंदा करना श्रावक के लिए उचित नहीं है। यदि कभी किसी साधु के आचरण में कोई कमी दिखाई भी दे तो उसका प्रचार-प्रसार करने अथवा निंदा करने के बजाय मौन धारण करना श्रेष्ठ है। जैन दर्शन व्यक्ति को दूसरों के दोष देखने के बजाय स्वयं के भीतर झांकने और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में आत्मकल्याण का मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र से होकर गुजरता है। साधु का जीवन इसी आत्मसाधना, त्याग और संयम की चर्या का आदर्श प्रस्तुत करता है। इसलिए हमें साधु-संतों के जीवन में दिखाई देने वाले गुणों को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।
दोष देखने के बजाय गुणों से सीख लेने की जरूरत
आचार्यश्री उदारसागरजी ने कहा कि यदि किसी साधु के व्यवहार में कोई ऐसी बात दिखाई देती है जिसे हम उचित नहीं मानते, तो उसके दोषों की चर्चा करने के बजाय अपने भीतर यह भावना करनी चाहिए कि जब मुझे साधु बनने का अवसर मिलेगा, तब मैं ऐसी भूल नहीं करूंगा।
उन्होंने कहा कि साधु की मुद्रा, वेश और संयमित जीवन स्वयं में कल्याणकारी प्रेरणा देते हैं। जिसने संसार के भोगों का त्याग कर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया है, उसके प्रति श्रद्धा रखना हमारा कर्तव्य है।
आचार्यश्री ने गुणग्राही और दोषदर्शी दृष्टि का अंतर समझाते हुए कहा कि गुणग्राही व्यक्ति दूसरों के गुणों से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को बेहतर बनाता है। वहीं दोषदर्शी व्यक्ति गुणों के सामने भी दोष खोजता रहता है। इसलिए मनुष्य को अपनी दृष्टि को सकारात्मक बनाकर दूसरों के गुणों से सीख लेने का प्रयास करना चाहिए।

गुरु केवल उपदेशक नहीं, आत्मा को जागृत करने वाले मार्गदर्शक
आचार्यश्री ने कहा कि गुरु केवल उपदेश देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह आत्मा को जागृत करने वाला मार्गदर्शक होता है। गुरु के प्रति श्रद्धा का अर्थ केवल पूजा, वंदना अथवा चरणों में नमन करना नहीं है। वास्तविक गुरु-भक्ति तब है, जब शिष्य गुरु द्वारा बताए गए मार्ग को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करे।
उन्होंने कहा कि यदि हम गुरु के चरणों में श्रद्धा रखते हैं तो उनके उपदेशों को व्यवहार में उतारना भी आवश्यक है। अहिंसा, संयम, त्याग, आत्मशुद्धि और सदाचार के मार्ग पर चलना ही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा का परिचायक है।
धर्मसभा में उपस्थित श्रावकों को उन्होंने अपने भीतर के विकारों को दूर करने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य के विचार, व्यवहार और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों के अनुसार जीवन जी रहा है : उपशांत सागर
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि साधु-संतों के गुणों को ग्रहण करना ही सच्ची गुरु-भक्ति है। किसी व्यक्ति के दोषों की चर्चा करने से अपना कोई कल्याण नहीं होता, लेकिन किसी के गुणों को अपने जीवन में अपनाने से आत्मा का विकास अवश्य होता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने मन में निंदा के स्थान पर विनय, ईर्ष्या के स्थान पर प्रशंसा और दोष-दर्शन के स्थान पर गुण-दर्शन की भावना विकसित करनी चाहिए। यही भाव व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ाता है।
मुनिश्री ने कहा कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार जीवन जी रहा है। जैन दर्शन हमें किसी दूसरे के कर्मों का निर्णायक बनने के बजाय अपने कर्मों और अपने परिणामों को सुधारने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को दूसरों के जीवन और कर्मों पर निर्णय देने के बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए। अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों को शुद्ध करने का प्रयास ही वास्तविक धर्म साधना है।

अहिंसा, संयम और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलने का आह्वान
मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने श्रावकों से आह्वान किया कि वे साधु-संतों के प्रति श्रद्धा और वात्सल्य का भाव रखें। उनके जीवन के श्रेष्ठ गुणों को अपने व्यवहार में उतारें तथा गुरु द्वारा बताए गए अहिंसा, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ें।
उन्होंने कहा कि गुरु और साधु-संतों के प्रति वास्तविक विनय केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण में दिखाई देना चाहिए। व्यक्ति अपने जीवन में जितना अधिक संयम और आत्मनिरीक्षण अपनाएगा, उतना ही वह आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकेगा।
धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री एवं मुनिश्री के प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुना। पूरे वातावरण में धार्मिक और आध्यात्मिक भाव बना रहा।
19 अगस्त को भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव
बड़ा जैन मंदिर कमेटी के ऑडिटर डॉ. मनोज जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि बुधवार 19 अगस्त को जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव बड़े जैन मंदिर में आयोजित किया जाएगा।
यह आयोजन आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज के निर्देशन में होगा। इस अवसर पर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी को निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा।
कार्यक्रम के तहत प्रातः 7 बजे श्री पार्श्वनाथ स्वामी का जलाभिषेक, वृहद शांतिधारा एवं विशेष पूजन किया जाएगा। इसके बाद प्रातः 8:15 बजे आचार्यश्री एवं मुनिश्री के प्रवचन होंगे।
इसके पश्चात प्रातः 9:30 बजे मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ निर्वाण कांड का वाचन किया जाएगा और भगवान पार्श्वनाथ स्वामी को निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा।
मंदिर समिति की ओर से श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में कार्यक्रम में शामिल होकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव का पुण्य लाभ लेने का आग्रह किया गया है।
धर्मसभा में दिए गए आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज के संदेश ने श्रद्धालुओं को साधु-संतों के प्रति श्रद्धा रखने, उनके गुणों को ग्रहण करने और अपने जीवन में आत्मनिरीक्षण एवं संयम को अपनाने की प्रेरणा दी। वहीं 19 अगस्त को होने वाले भगवान पार्श्वनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव को लेकर जैन समाज में उत्साह का वातावरण है।

