कुपोषण से जूझ रही 3 वर्षीय दिव्यांशी का मामला दमोह जिले के हटा क्षेत्र से सामने आया है। आर्थिक तंगी, पलायन और गंभीर कुपोषण के बीच बच्ची को बेहतर इलाज के लिए दमोह रेफर करने की तैयारी की जा रही है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
कुपोषण से जूझ रही 3 वर्षीय दिव्यांशी: कहीं देर न हो जाए, बेहतर इलाज के लिए दमोह रेफर की तैयारी
रिपोर्टर: सोनू अठया | दमोह (मध्य प्रदेश)
हटा से सामने आया गंभीर मामला
कुपोषण से जूझ रही 3 वर्षीय दिव्यांशी का मामला मध्य प्रदेश के दमोह जिले के हटा अनुविभाग अंतर्गत ग्राम वर्धा मड़ियादों से सामने आया है। शासन द्वारा प्रदेश को कुपोषण मुक्त बनाने के लिए लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन गरीबी, जागरूकता की कमी और पलायन जैसी परिस्थितियों के कारण आज भी कई मासूम गंभीर कुपोषण का शिकार हो रहे हैं।
यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या समय रहते ऐसे बच्चों तक पर्याप्त सहायता पहुंच पा रही है?
कौन है दिव्यांशी?
तीन वर्षीय दिव्यांशी आदिवासी, पूनम आदिवासी और बिरजू (बृजकिशोर) आदिवासी की तीसरी पुत्री है। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। मजदूरी ही उनकी आय का मुख्य साधन है। रोजगार की तलाश में माता-पिता समय-समय पर महानगरों की ओर पलायन करते रहते हैं।
परिवार की तीनों बेटियों के बीच केवल एक से डेढ़ वर्ष का अंतर है, जिससे बच्चों के पोषण और देखभाल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
परिवार की आर्थिक स्थिति बनी सबसे बड़ी चुनौती
दिव्यांशी का इलाज केवल स्वास्थ्य का नहीं बल्कि आर्थिक संघर्ष का भी विषय बन गया है। पिता मजदूरी के लिए बाहर गए हुए हैं जबकि मां अकेले बच्ची की देखभाल कर रही है।
सीमित आय, पर्याप्त पोषण की कमी और लगातार आर्थिक परेशानियों ने परिवार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि गरीबी और पलायन बच्चों में कुपोषण के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
आंगनवाड़ी की सतर्कता से बची उम्मीद
गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने नियमित वजन जांच के दौरान देखा कि दिव्यांशी का वजन लगातार कम हो रहा है।
स्थिति गंभीर लगने पर बच्ची को तत्काल हटा स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में भर्ती कराया गया।
यदि समय रहते यह पहचान नहीं होती तो बच्ची की स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती थी।
एनआरसी में उपचार के बाद दमोह रेफर की तैयारी
एनआरसी में उपचार के दौरान डॉक्टरों ने बच्ची की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी, लेकिन अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
उपचार के दौरान बच्ची में टीबी जैसे लक्षण भी दिखाई दिए, जिसके बाद विशेषज्ञ चिकित्सकीय जांच एवं बेहतर उपचार के लिए उसे दमोह रेफर करने की सलाह दी गई।
स्वास्थ्य विभाग अब बच्ची को जिला अस्पताल स्तर पर विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है।
परियोजना अधिकारी ने क्या कहा?
हटा परियोजना अधिकारी शिव राय ने बताया कि—
- बच्ची का समय पर टीकाकरण कराया गया।
- उसे एनआरसी में भर्ती कर उपचार दिया गया।
- विशेषज्ञ उपचार की आवश्यकता होने पर दमोह रेफर किया जाएगा।
- जिला स्तर पर समुचित इलाज की पूरी व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
स्वास्थ्य विभाग की अपील
स्वास्थ्य विभाग ने अभिभावकों से अपील की है कि—
- बच्चों का नियमित वजन अवश्य कराएं।
- संतुलित एवं पौष्टिक आहार दें।
- समय पर सभी टीके लगवाएं।
- कमजोरी या वजन कम होने पर तुरंत आंगनवाड़ी या स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करें।
- कुपोषण के लक्षणों को नजरअंदाज न करें।
कुपोषण क्यों बनता है गंभीर समस्या?
कुपोषण बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास को प्रभावित करता है। यदि समय पर उपचार नहीं मिले तो संक्रमण, टीबी जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि शुरुआती पहचान और उचित पोषण से अधिकांश बच्चों को स्वस्थ बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
कुपोषण से जूझ रही 3 वर्षीय दिव्यांशी की कहानी केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं बल्कि समाज और व्यवस्था दोनों के लिए एक चेतावनी है।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की सतर्कता से बच्ची समय पर उपचार तक पहुंची, लेकिन अब आवश्यकता है कि उसे शीघ्र विशेषज्ञ इलाज मिले ताकि उसका जीवन सुरक्षित हो सके।
यदि शासन, स्वास्थ्य विभाग और समाज मिलकर समय रहते ऐसे बच्चों की पहचान और सहायता करें तो कुपोषण मुक्त समाज का लक्ष्य निश्चित रूप से हासिल किया जा सकता है।
