धर्म के नाम पर आडंबर क्यों? — Anshul Jain Shastri
धर्म का उद्देश्य आत्मकल्याण है, प्रदर्शन नहीं
मुरैना/द्रोणगिरी।
मनुष्य के जीवन में धर्म का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। धर्म केवल पूजा-पाठ, व्रत, अनुष्ठान या बाहरी आडंबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन को सही दिशा देने वाली वह आध्यात्मिक शक्ति है, जो व्यक्ति को अपनी वास्तविक पहचान से परिचित कराती है। धर्म मनुष्य को यह बोध कराता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि ज्ञान, दर्शन, आनंद और शक्ति से परिपूर्ण शुद्ध आत्मा है।
धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मशांति, आत्मचिंतन, आत्मकल्याण और अंततः मोक्ष की प्राप्ति है। लेकिन वर्तमान समय में एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि क्या हम धर्म को उसके वास्तविक स्वरूप में समझ रहे हैं या केवल बाहरी प्रदर्शन और परंपराओं तक सीमित कर रहे हैं?
धर्म साधना का मार्ग है, इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम नहीं
आज समाज में कई स्थानों पर धर्म का स्वरूप साधना से अधिक साधन के रूप में दिखाई देने लगा है। अनेक लोग मंदिरों में भगवान के दर्शन करने जाते हैं, लेकिन उनके मन में व्यापार वृद्धि, धन-संपत्ति, नौकरी, संतान प्राप्ति या व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान जैसी इच्छाएं प्रमुख होती हैं।
पूजा, आराधना और व्रत यदि केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम बन जाएं, तो धर्म की मूल भावना कमजोर हो जाती है। धर्म हमें यह नहीं सिखाता कि हम हर परिस्थिति में बाहरी सहायता की अपेक्षा करें, बल्कि यह सिखाता है कि अपने भीतर इतनी शक्ति विकसित करें कि जीवन की कठिनाइयों का सामना विवेक और धैर्य के साथ कर सकें।
धर्म व्यक्ति को इच्छाओं का गुलाम नहीं बनाता, बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण करना सिखाता है। अनियंत्रित इच्छाएं ही मनुष्य के दुख और अशांति का प्रमुख कारण बनती हैं।
भगवान से संसार नहीं, स्वयं में परिवर्तन मांगना चाहिए
सच्चा धर्म यह नहीं कहता कि भगवान से सांसारिक वस्तुओं की मांग की जाए। भगवान मार्ग दिखाते हैं, लेकिन जीवन में परिवर्तन स्वयं के प्रयासों से ही आता है।
जैन दर्शन में तीर्थंकरों ने कभी किसी को धन, वैभव या सांसारिक सुखों का आश्वासन नहीं दिया। उन्होंने केवल आत्मा की पहचान, कर्मों की शुद्धि और मुक्ति का मार्ग बताया। उनका संदेश था कि मनुष्य अपने कर्मों और विचारों को श्रेष्ठ बनाकर जीवन को सार्थक बना सकता है।
धर्म का उद्देश्य व्यक्ति को भौतिक उपलब्धियों के पीछे दौड़ाना नहीं, बल्कि उसे आत्मिक उन्नति की ओर ले जाना है।
अंधविश्वास धर्म नहीं, अज्ञान का विस्तार है
वर्तमान समय में धर्म के नाम पर कई प्रकार के आडंबर देखने को मिलते हैं। कहीं ताबीज और टोटकों के माध्यम से समस्याओं का समाधान बताने का दावा किया जाता है, तो कहीं चमत्कारों और भय के आधार पर लोगों की आस्था का लाभ उठाया जाता है।
जहां विवेक समाप्त होता है, वहीं आडंबर जन्म लेता है। धर्म हमेशा मनुष्य को जागरूक और विचारशील बनाता है, जबकि अंधविश्वास उसकी सोचने-समझने की क्षमता को सीमित कर देता है।
धर्म का आधार ज्ञान, विवेक और सत्य होना चाहिए। केवल बाहरी दिखावे से कोई व्यक्ति धार्मिक नहीं बन सकता। धार्मिकता व्यक्ति के व्यवहार, विचार और आचरण में दिखाई देती है।
मंदिर आत्म परिवर्तन का केंद्र है
मंदिर केवल अपनी इच्छाओं की सूची भगवान के सामने रखने का स्थान नहीं है। मंदिर वह स्थान है जहां मनुष्य अपने भीतर झांकता है, आत्मचिंतन करता है और जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा प्राप्त करता है।
यदि मंदिर जाने के बाद व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है, उसके क्रोध में कमी आती है, लोभ कम होता है, अहंकार समाप्त होता है और क्षमा, दया तथा करुणा जैसे गुणों का विकास होता है, तभी उसकी पूजा सार्थक मानी जाती है।
बाहरी पूजा तभी सफल होती है जब उसके साथ आंतरिक शुद्धता और व्यवहार में परिवर्तन भी जुड़ा हो।
आचरण ही धर्म की वास्तविक पहचान है
जैन आचार्यों, मुनिराजों और जिनवाणी का संदेश सदैव स्पष्ट रहा है कि धर्म को केवल वेशभूषा, तिलक, माला या बाहरी पहचान से नहीं समझा जा सकता। धर्म व्यक्ति के जीवन और आचरण में प्रकट होना चाहिए।
सत्य, अहिंसा, संयम, दया, क्षमा और विनम्रता धर्म के वास्तविक आधार हैं। यदि व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठान तो करता है, लेकिन उसके व्यवहार में क्रोध, अहंकार, द्वेष और हिंसा बनी रहती है, तो धर्म का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
धर्म का प्रभाव मनुष्य के चरित्र में दिखाई देना चाहिए।
धर्म व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है
वास्तविक धर्म मनुष्य को कमजोर या आश्रित नहीं बनाता, बल्कि उसे आत्मबल प्रदान करता है। धर्म यह प्रेरणा देता है कि व्यक्ति अपने जीवन की जिम्मेदारियों को समझे और अपने कर्मों के माध्यम से बेहतर भविष्य का निर्माण करे।
जो व्यक्ति धर्म को समझता है, वह परिस्थितियों से घबराता नहीं बल्कि धैर्य, विवेक और संयम के साथ उनका सामना करता है।
धर्म व्यक्ति को यह विश्वास देता है कि जीवन में परिवर्तन बाहरी चमत्कारों से नहीं, बल्कि स्वयं के प्रयासों और श्रेष्ठ कर्मों से आता है।
आज आवश्यकता धर्म को समझने की है
आज समाज को धर्म बदलने की नहीं, बल्कि धर्म को सही अर्थों में समझने की आवश्यकता है। हमें आडंबर नहीं, आत्मदर्शन चाहिए। हमें चमत्कार नहीं, चरित्र निर्माण चाहिए। हमें अंधभक्ति नहीं, सम्यक ज्ञान चाहिए।
जब धर्म केवल प्रदर्शन का विषय बन जाता है, तब उसकी मूल भावना कमजोर होने लगती है। धर्म का उद्देश्य लोगों को जोड़ना, जीवन को श्रेष्ठ बनाना और आत्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ाना है।
धर्म व्यक्ति को प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और मानवता का मार्ग दिखाता है।
सच्चा धर्म भीतर का परिवर्तन है
धर्म का अर्थ संसार की वस्तुएं प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानना है। जो धर्म मनुष्य के भीतर शांति, विवेक, करुणा और आत्मजागरण का प्रकाश उत्पन्न करता है, वही सच्चा धर्म है।
जो धर्म व्यक्ति को अहंकार से मुक्त करे, जीवन में संयम लाए और दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाए, वही धर्म की वास्तविक भावना है।
केवल इच्छाओं को बढ़ाने वाला प्रदर्शन धर्म नहीं हो सकता। धर्म वह है जो मनुष्य को भीतर से बदल दे और उसे श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा दे।
— भाव लेखक: अंशुल जैन शास्त्री
