Mohan Bhagwat Statement: धर्म जोड़ने और धारण करने का मार्ग, इसे सही अर्थ में समझना जरूरी—मोहन भागवत
उज्जैन की युवा धर्म संसद में बोले RSS प्रमुख—धर्म केवल पूजा पद्धति नहीं, जीवन को दिशा देने वाला आचरण और कर्तव्य
उज्जैन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म समाज को जोड़ने, जीवन को धारण करने और व्यक्ति को सही दिशा देने वाला मार्ग है। धर्म को केवल पूजा पद्धति या किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। इसके व्यापक स्वरूप को समझना और आचरण में उतारना आवश्यक है।
डॉ. भागवत ने उज्जैन में आयोजित राष्ट्रीय युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए धर्म, युवा शक्ति, अहंकार, कर्तव्य और भारतीय जीवन मूल्यों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज के समय में यदि कोई युवा धर्म की बात करता है तो कई बार उसे पुरानी अथवा बुढ़ापे की सोच से जोड़ दिया जाता है। यह धारणा उचित नहीं है, क्योंकि धर्म किसी विशेष आयु वर्ग का विषय नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन को व्यवस्थित करने वाला सिद्धांत है।
उन्होंने युवाओं से कहा कि धर्म को जानने के लिए खुले मन, विनम्रता और निरंतर अध्ययन की आवश्यकता है। केवल यह मान लेना कि हमें सब कुछ पता है, ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन सकता है।
‘रिलीजन’ और ‘धर्म’ के अर्थ में अंतर
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में कहा कि अंग्रेजी के शब्द ‘रिलीजन’ और भारतीय परंपरा के ‘धर्म’ को एक ही अर्थ में समझना सही नहीं है। रिलीजन आमतौर पर किसी विशेष मत, संप्रदाय, विश्वास या पूजा पद्धति से संबंधित होता है, जबकि धर्म का भारतीय अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है।
उन्होंने कहा कि धर्म शब्द संस्कृत की ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ धारण करना है। जो व्यक्ति, समाज और सृष्टि को धारण करे तथा सभी को एक सूत्र में बांधे, वही धर्म है। धर्म मनुष्य को उसके कर्तव्य का बोध कराता है और जीवन में संतुलन स्थापित करता है।
भागवत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और परिस्थिति के अनुसार उसका कर्तव्य अलग हो सकता है, लेकिन सभी के मूल में सत्य, करुणा, संयम, न्याय और परस्पर सहयोग जैसे मूल्य होते हैं। धर्म का उद्देश्य किसी को बांटना नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच एकता स्थापित करना है।
धर्म जीवनशैली और आचरण का विषय
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म केवल बोलने, पढ़ने अथवा धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने का विषय नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप व्यक्ति के व्यवहार और आचरण में दिखाई देता है। परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाना भी धर्म का हिस्सा है।
उन्होंने युवाओं को समझाया कि जीवन में अनुशासन, नैतिकता, सेवा और परोपकार को स्थान देना जरूरी है। व्यक्ति पूजा तो करे, लेकिन उसके व्यवहार में अहंकार, द्वेष और अन्याय बना रहे तो धर्म का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
उन्होंने कहा कि धर्म व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार की उन्नति की दिशा देता है। यह मनुष्य को केवल स्वयं के हित में जीने के बजाय संपूर्ण समाज के कल्याण के बारे में सोचने की प्रेरणा देता है।
युवाओं का धर्म से जुड़ना सकारात्मक संकेत
संघ प्रमुख ने कहा कि देशभर के युवाओं का धर्म और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर चर्चा के लिए एकत्र होना सकारात्मक संकेत है। युवाओं को धर्म के संबंध में प्रश्न पूछने, विचार करने और उसके वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने इस सोच को गलत बताया कि धर्म केवल बुजुर्गों या जीवन के अंतिम चरण से जुड़ा विषय है। धर्म मनुष्य के प्रत्येक निर्णय, व्यवहार और संबंध को प्रभावित करता है। इसलिए युवावस्था से ही इसके मूल तत्वों को समझना आवश्यक है।
भागवत ने कहा कि युवा धर्म को अंधविश्वास के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के शाश्वत सिद्धांतों के रूप में समझें। किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करना चाहिए कि वह परंपरा से चली आ रही है। उसके पीछे मौजूद उद्देश्य, मूल्य और सामाजिक उपयोगिता को भी जानना चाहिए।
अहंकार छोड़कर सत्य को समझने की आवश्यकता
युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत ने अहंकार से बचने का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि कई बार मनुष्य को यह भ्रम हो जाता है कि सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार ही होना चाहिए। वास्तव में प्रकृति और सृष्टि अपने शाश्वत नियमों के अनुसार चलती हैं।
उन्होंने कहा कि सूर्य का उदय और अस्त होना अथवा प्रकृति का चक्र किसी व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर नहीं है। इसी प्रकार धर्म के सार्वभौमिक नियम भी मनुष्य के अहंकार से नहीं बदलते। धर्म को समझने के लिए व्यक्ति को यह भाव छोड़ना होगा कि वह सब कुछ जानता है।
की रिपोर्ट के अनुसार, भागवत ने युवाओं से अहंकार छोड़कर विनम्रता और आत्मचिंतन के साथ सत्य की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सच्चा धर्मबोध एक लंबी साधना है, जिसे सहज संवाद और निरंतर चिंतन से प्राप्त किया जा सकता है।
24 राज्यों से पहुंचे युवा प्रतिनिधि
उज्जैन के देवास रोड स्थित गीता भवन परिसर में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय युवा धर्म संसद में देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में युवा, विद्यार्थी, शिक्षक और अन्य प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं। आयोजन में धर्म, संस्कृति, शिक्षा, तकनीक, परिवार, मानवीय मूल्य और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है।
कार्यक्रम का आयोजन सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा किया गया है। अलग-अलग सत्रों में संत, शिक्षाविद्, लेखक, चिंतक और विशेषज्ञ युवाओं से संवाद कर रहे हैं। कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति पर आधारित प्रदर्शनी एवं चित्रकला कार्यशाला भी आयोजित की गई है।
रिपोर्टों में प्रतिभागियों की संख्या 1500 से 1700 के बीच बताई गई है। देश के 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए कलाकार एवं युवा प्रतिनिधि आयोजन में अपनी सहभागिता कर रहे हैं। अमर उजाला के अनुसार, कार्यक्रम में कला, अध्यात्म और युवा ऊर्जा का संगम देखने को मिल रहा है।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका पर मंथन
युवा धर्म संसद में वक्ताओं द्वारा आधुनिक तकनीकी दौर में मानवीय मूल्यों की आवश्यकता, भारतीय ज्ञान परंपरा, चरित्र निर्माण और सामाजिक उत्तरदायित्व पर विचार रखे जा रहे हैं। विद्यार्थियों को अपने प्रश्न विशेषज्ञों के सामने रखने और विभिन्न विषयों पर संवाद करने का अवसर भी मिल रहा है।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में युवाओं को धर्म के वास्तविक अर्थ को समझकर उसे जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जब धर्म को जोड़ने, धारण करने और सबके कल्याण का मार्ग मानकर व्यवहार किया जाता है, तभी समाज में एकता एवं शांति स्थापित होती है।
उन्होंने युवाओं से अपने ज्ञान पर अहंकार करने के बजाय लगातार सीखने, प्रश्न पूछने और सत्य को समझने का प्रयास करने का आह्वान किया। उनका कहना था कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को मुक्त, जिम्मेदार और समाज के प्रति संवेदनशील बनाना है।
