देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर में “जेनालाजी केंद्र” का भव्य शुभारंभ
इंदौर, (DD/MM/YYYY) – आज एक ऐतिहासिक एवं मान्यवर अवसर पर, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के खंडवा रोड स्थित ऑडिटोरियम में “जेनालाजी एवं भारतीय जैन परंपरा” विषयक सेमिनार के दौरान विश्वविद्यालय में जेनालाजी केंद्र का भव्य शुभारंभ किया गया। इस विशेष कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने के लिए माननीय उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार मुख्य अतिथि रहे, जिन्होंने दीप प्रज्ज्वलन कर “जैन मंगलाचरण” से केंद्र का औपचारिक उद्घाटन किया।
इस अवसर पर धर्म–समाज प्रचारक श्री राजेश जैन (दद्दू) ने कहा कि यह केंद्र न केवल जैन दर्शन, संस्कृति, साहित्य और इतिहास का अध्ययन करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को जैन परम्परा से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जेनालाजी केंद्र समय के साथ देशभर में जैन अध्ययन और शोध का महत्त्वपूर्ण केन्द्र बनेगा।
स्वागत एवं प्रमुख वक्ता
स्वागत एवं उद्घाटन
कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलगुरू डॉ. राकेश सिंघई के स्वागत भाषण के साथ हुई। उन्होंने उपस्थित अतिथियों, विद्वानों और छात्र-छात्राओं का हार्दिक अभिनन्दन किया। इसके बादोलिए अन्य गणमान्य अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया गया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:
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पूर्व कुलगुरू प्रोफेसर रेणु जैन
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डा॰ चंद्रशेखर कुमार, (सचिव, अल्पसंख्यक विभाग)
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रामसिंह जी जाईट, सेक्रेटरी (अल्पसंख्यक)
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प्रज्वल खरे, (रजिस्ट्रार, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय)
इन्होंने शिक्षा, संस्कृति और धर्म के क्षेत्र में योगदान की अपनी दृष्टि एवं अपेक्षाएँ साझा की।
प्रथम एवं द्वितीय सत्र: जैनालाजी की प्राचीनता
द्वितीय सत्र — नलीन शास्त्री (दिल्ली)
द्वितीय सत्र में नलीन शास्त्री (दिल्ली) ने अपनी वक्तव्य प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने जैनालाजी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, भारत में उसके विकास और विभिन्न जैन ग्रंथों एवं शिलालेखों में इसके संदर्भों का विवेचन किया। उन्होंने यह दिखाया कि कैसे जैन दर्शन और साहित्य शताब्दियों से सांस्कृतिक क्षेत्रों को प्रभावित करते आए हैं।
तृतीय सत्र — प्रो. ऋषभ फौजदार (दमोह) और रमेश यादव (पुरातत्व विभाग)
इस सत्र में प्रो. ऋषभ फौजदार (दमोह) तथा रमेश यादव (पुरातत्व विभाग) ने अपने शोध प्रबंधों और लेखों का प्रस्तुतीकरण किया, जिसमें उन्होंने जैनालाजी की प्राचीनता और उसके प्रमाणों पर बल दिया। उन्होंने पुरातन अभिलेखों, मन्दिर उत्खननों और मुढ़ल अभिलेखों को उद्धृत करते हुए यह दर्शाया कि जैन परंपराएँ कितनी प्राचीन हैं और कैसे वे सामाजिक, स्थापत्य एवं धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं।
इन प्रस्तुतियों ने श्रोतृगण को न सिर्फ़ जानकारी दी, बल्कि जैन अध्ययन में आगे की संभावनाएँ भी उद्घाटित कीं।
चौथा सत्र: जीवन शैली, पर्यावरण एवं दर्शन
इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. संगीता दिलीप मेहता ने की। उन्होंने एक ऊर्जस्वी वक्तव्य दिया, जिसमें उन्होंने जैन जीवन शैली, अहिंसा सिद्धांत और पर्यावरण संरक्षण के बीच गहरे संबंध पर जोर दिया। उनका तर्क था:
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जैन आचार एवं दृष्टिकोण न केवल आत्म–उत्कर्ष का मार्ग बताते हैं, बल्कि प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरणा भी देते हैं।
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जैन दर्शन में अहिंसा, क्षमा, परिग्रह-संयम जैसे तत्व हैं, जो आज के समय में पर्यावरणीय चेतना एवं सतत् विकास की मुहिम से सादृश्य रखते हैं।
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उन्होंने यह सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों तथा समाजों में जैन जीवन शैली पर विस्तृत शोध और संवाद हो, जिससे युवाओं को इस दृष्टिकोण से जोड़ने का अवसर मिल सके।
उनकी वक्तव्य को अतिथियों एवं श्रोताओं ने व्यापक रूप से सराहा।
अंतिम सत्र एवं समापन
उपकुलसचिव रचना ठाकुर एवं निलेश पुरोहित (SGITS) की प्रस्तुति
अंतिम सत्र में उपकुलसचिव रचना ठाकुर और निलेश पुरोहित (SGITS, ग्वालियर) ने जेनालाजी और उसकी प्राचीनता पर अपने विचार रखे। उन्होंने निम्न बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
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जैनालाजी की शिक्षा और अध्ययन किस प्रकार से आधुनिक शोध पद्धतियों और सांस्कृतिक विमर्श से जुड़ी हो सकती है
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कैसे इस केंद्र के माध्यम से विद्यार्थियों एवं शोधकर्ताओं को संसाधन, ग्रंथालय और ऑनलाइन स्रोत मुहैया किए जाने चाहिए
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इस केंद्र से प्राप्त ज्ञान एवं शोध को स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित करने के सुझाव
इस सत्र में उपस्थित जैन समाज के गणमान्य नागरिकों – जैसे श्री डी.के. जैन, डी.एस.पी मंयक जैन, ओम पाटोदी आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
आभार-प्रस्तुति
कार्यक्रम के अंत में राहुल सिंघई और रजनीश जैन (निदेशक, जेनालाजी केंद्र) ने सभी वक्ताओं, आयोजकों, अतिथियों और प्रतिभागियों हेतु अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने यह आह्वान किया कि जेनालाजी केंद्र आने वाले समय में जैन अध्ययन व शोध के क्षेत्र में एक प्रकाशस्तंभ बन सके।
संचालन और योगदान
संपूर्ण कार्यक्रम का सफल और सुसंगत संचालन निम्न संयोजकों ने किया:
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डॉ. प्रतिभा शर्मा
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अंगद ओझा
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यामिनी करमलकर
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कपिल शर्मा
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रूपाली सरये
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परिणिता रत्नपारखी
इन सभी का समर्पण, समयबद्धता और समन्वय ने इस भव्य कार्यक्रम को सफल बनाया।
महत्व एवं आगे की दिशा
जेनालाजी केंद्र का यह शुभारंभ शिक्षा एवं संस्कृति जगत में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसके माध्यम से निम्नलिखित लक्ष्य साधे जाने की संभावना है:
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शोध एवं अध्ययन का मंच – जैन दर्शन, जैन इतिहास, साहित्य एवं संस्कृति का गहन अध्ययन एवं शोध
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शैक्षिक संसाधन – ग्रंथालय, डिजिटल अभिलेख, शोध पत्र एवं पुस्तकालय-सहायता
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समुदाय संवाद – जैन समाज और अन्य समुदायों के बीच परस्पर संवाद एवं समन्वय
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प्रकाशन एवं सम्मेलन – जैनालाजी केंद्र अंतरराष्ट्रीय जैन अध्ययन समेलन एवं प्रकाशन काम करेगा
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युवा जुड़ाव – स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जैन अध्ययन एवं संस्कार कार्यक्रमों को बढ़ावा देना
इस केंद्र की स्थापना न केवल देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के लिए, बल्कि पूरे मध्य भारत और देश के जैन अध्ययन जगत के लिए एक नई ऊर्जा है।
निष्कर्ष
आज के इस आयोजन ने स्पष्ट कर दिया कि जेनालाजी केंद्र न सिर्फ एक संस्थागत गठन है, बल्कि यह धर्म, अध्ययन, संस्कृति, और समाज के बीच एक सकारात्मक पुल बनेगा। इस केंद्र को सफल बनाने के लिए विश्वविद्यालय, जैन समाज और विद्वान समुदाय को मिलकर निरंतर काम करना होगा।
इस भव्य शुभारंभ ने यह संदेश दिया है कि जैन परंपरा की जड़ों की खोज अब औपचारिक शिक्षा, अनुसंधान और सामाजिक संवाद का हिस्सा बनेगी। आने वाले वर्षों में यह केंद्र न केवल इंदौर या मध्यप्रदेश, बल्कि पूरे भारत में जैन अध्ययन का प्रतिष्ठित केन्द्र बन सकता है।

