भाद्रपद दशलक्षण महापर्व 15 से 25 सितंबर तक, जिनालयों में होंगे विशेष धार्मिक आयोजन
आत्मशुद्धि, संयम और आत्मचिंतन का संदेश देगा दस दिवसीय महापर्व
मुरैना (मनोज जैन नायक)। दिगंबर जैन समाज का प्रमुख आध्यात्मिक पर्व दशलक्षण महापर्व इस वर्ष 15 सितंबर से 25 सितंबर तक श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। पर्व के दौरान नगर के विभिन्न जिनालयों में प्रतिदिन दशलक्षण धर्म की विशेष पूजन, भगवान जिनेंद्र का अभिषेक, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप, ध्यान एवं धार्मिक प्रवचनों सहित अनेक आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
दशलक्षण महापर्व को जैन दर्शन में आत्मशुद्धि, संयम और आत्मचिंतन का महत्वपूर्ण अवसर माना गया है। इस दौरान जैन धर्मावलंबी अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार धार्मिक आराधना करते हुए क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को कम करने तथा क्षमा, विनम्रता, सरलता और संयम जैसे सद्गुणों को जीवन में अपनाने का प्रयास करेंगे।
वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने पर्व की जानकारी देते हुए बताया कि जैन दर्शन के अनुसार दशलक्षण धर्म किसी व्यक्ति विशेष के गुण नहीं हैं, बल्कि ये शुद्ध आत्मा के स्वाभाविक गुण माने गए हैं। इसलिए दशलक्षण महापर्व को केवल बाहरी धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि आत्मा की आराधना और अपने भीतर झांकने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
उन्होंने बताया कि सामान्य रूप से दशलक्षण पर्व भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तक मनाया जाता है। इस वर्ष पंचमी की तिथि दो दिन होने के कारण पर्व की तिथियों को लेकर विभिन्न स्थानों पर मतभेद की स्थिति बनी है। कुछ स्थानों पर आचार्यों के मतानुसार 16 सितंबर से पर्वारंभ माना जा रहा है, जबकि 15 सितंबर से दशलक्षण पर्व की आराधना प्रारंभ करना भी उचित माना जा रहा है।
दस धर्म देते हैं आत्मशुद्धि का संदेश
दशलक्षण महापर्व के दसों धर्म व्यक्ति को आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
उत्तम क्षमा के माध्यम से क्रोध और द्वेष का त्याग कर सभी जीवों के प्रति क्षमाभाव रखने की प्रेरणा दी जाती है।
उत्तम मार्दव अहंकार का त्याग कर विनम्रता अपनाने का संदेश देता है। धन, पद, ज्ञान, रूप अथवा प्रतिष्ठा का अभिमान छोड़कर सरल और सहज व्यवहार करना इसका उद्देश्य है।
उत्तम आर्जव मन, वचन और कर्म में सरलता बनाए रखने तथा छल-कपट से दूर रहने की शिक्षा देता है।
उत्तम शौच केवल बाहरी स्वच्छता तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ लोभ, तृष्णा और अशुद्ध भावों से मन को मुक्त कर भावों की निर्मलता की ओर बढ़ना है।
उत्तम सत्य व्यक्ति को सत्य बोलने के साथ-साथ हितकारी, मित और प्रिय वचन बोलने की प्रेरणा देता है।
उत्तम संयम मन, वचन और शरीर पर नियंत्रण रखने तथा इंद्रियों को विषयों में अनियंत्रित रूप से प्रवृत्त होने से रोकने का संदेश देता है। साथ ही सभी जीवों की रक्षा और जीवदया की भावना को भी महत्व दिया जाता है।
उत्तम तप में उपवास, एकासन आदि बाहरी तप के साथ मन के भीतर मौजूद विकारों को दूर करने का प्रयास किया जाता है।
उत्तम त्याग दान, सेवा और परोपकार के साथ राग-द्वेष एवं कषायों के त्याग की प्रेरणा देता है।
उत्तम आकिंचन्य व्यक्ति को ‘यह मेरा है’ जैसी आसक्ति कम करने तथा सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह और संग्रह की भावना से दूर होने का संदेश देता है।
उत्तम ब्रह्मचर्य इंद्रिय संयम के साथ पर-पदार्थों से ध्यान हटाकर निज आत्मा में रमण और आत्मचिंतन की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
जिनालयों में होंगे विविध धार्मिक आयोजन
दशलक्षण महापर्व के दौरान नगर के विभिन्न जिनालयों में सुबह से धार्मिक गतिविधियां शुरू होंगी। श्रद्धालु भगवान जिनेंद्र का अभिषेक एवं पूजन करने के साथ दशलक्षण धर्म की दैनिक विशेष पूजा करेंगे। इसके अलावा स्वाध्याय, शास्त्र वाचन, सामायिक, प्रतिक्रमण, ध्यान, एकासन और उपवास जैसे धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाएंगे।
पर्व के दौरान जीवदया, दान, सेवा और परोपकार के कार्यों को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। रात्रि के समय जिनालयों में धार्मिक प्रवचन एवं अन्य आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना है, जिनमें समाजजन बड़ी संख्या में सहभागिता करेंगे।
डॉ. जैन ने कहा कि दशलक्षण पर्व में तप और व्रत की कठोरता प्रत्येक व्यक्ति अपनी शारीरिक क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार रखता है। इसका उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मा के परिणामों को निर्मल करना है। दस दिनों के दौरान व्यक्ति अपने भीतर झांकते हुए क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को कम करने तथा क्षमा, संयम और आत्मचिंतन को बढ़ाने का प्रयास करता है।
उन्होंने कहा कि दशलक्षण महापर्व को केवल दस दिनों तक चलने वाला धार्मिक पर्व मानना पर्याप्त नहीं है। यह जीवन को बेहतर बनाने वाली दस आध्यात्मिक शिक्षाओं का पर्व है। यदि इन दस धर्मों को केवल पूजा और पाठ तक सीमित न रखते हुए दैनिक जीवन के व्यवहार में उतारा जाए, तो व्यक्ति के विचार, आचरण और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।
दशलक्षण महापर्व के माध्यम से जैन समाज में आत्मचिंतन, संयम, जीवदया, क्षमाभाव और त्याग की भावना को मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा। पर्व के दौरान श्रद्धालु धार्मिक आराधना के साथ यह संकल्प भी लेंगे कि वे अपने जीवन में कषायों को कम कर आत्मकल्याण और शुद्धात्मा की ओर आगे बढ़ेंगे।
