त्योहारों की आहट के साथ Damoh में मूर्तिकारों की व्यस्तता बढ़ गई है। कछियाना मोहल्ला निवासी मूर्तिकार मोनू रैकवार इन दिनों दिन-रात मेहनत कर मिट्टी की प्रतिमाओं को आकर्षक रूप देने में जुटे हुए हैं। उनके हाथों की महीन कारीगरी और चेहरे के भाव प्रतिमाओं को जीवंत बना रहे हैं।
मिट्टी से प्रतिमा तक का सफर
मोनू रैकवार के लिए मूर्तिकला केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि कला, परंपरा और आस्था से जुड़ा कार्य है। एक प्रतिमा को तैयार करने में कई दिनों का समय लगता है। सबसे पहले मिट्टी को तैयार किया जाता है, इसके बाद ढांचा तैयार कर प्रतिमा को आकार दिया जाता है। नक्काशी, चेहरे के भाव, रंग-रोगन और अंतिम सजावट के बाद प्रतिमा अपना आकर्षक रूप लेती है।
मोनू बताते हैं कि प्रतिमा बनाने के प्रत्येक चरण में धैर्य और बारीकी की जरूरत होती है। छोटी-सी गलती भी पूरी प्रतिमा के स्वरूप को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि वह हर प्रतिमा पर विशेष ध्यान देते हैं।
बढ़ती महंगाई बनी बड़ी चुनौती
मूर्तिकारों के सामने इस समय बढ़ती लागत भी बड़ी चुनौती है। मिट्टी, रंग, कपड़ा, सजावटी सामग्री और अन्य आवश्यक सामान के दाम बढ़ने से प्रतिमा तैयार करने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद मोनू रैकवार अपनी कला की गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहते।
उनका प्रयास रहता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद प्रतिमाओं को बेहतर और आकर्षक बनाया जाए। उनका कहना है कि ग्राहक जब तैयार प्रतिमा देखकर प्रसन्न होते हैं और उनके चेहरे पर खुशी दिखाई देती है, तो कई दिनों की मेहनत सार्थक महसूस होती है।

पारंपरिक कला को बचाने की कोशिश
कछियाना मोहल्ले में तैयार हो रहीं प्रतिमाएं मोनू रैकवार के हुनर की पहचान बनने के साथ ही पारंपरिक मूर्तिकला को जीवित रखने का प्रयास भी हैं। आधुनिक दौर में मशीनों और बाजार में उपलब्ध तैयार सजावटी वस्तुओं के बावजूद हाथ से प्रतिमा तैयार करने की कला आज भी लोगों के बीच विशेष स्थान रखती है।
मोनू के हाथों से मिट्टी धीरे-धीरे आकार लेकर देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाओं में बदलती है। उनकी मेहनत यह बताती है कि पारंपरिक हुनर केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत भी है।
चेहरे के भाव और रंगों पर खास ध्यान
प्रतिमाओं की खूबसूरती में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका चेहरे के भाव और रंगों की होती है। मोनू रैकवार इन दोनों पहलुओं पर विशेष ध्यान देते हैं। आंखों की बनावट, चेहरे की मुस्कान, आभूषणों की सजावट और वस्त्रों के रंगों को संतुलित तरीके से तैयार किया जाता है।
उनकी कोशिश रहती है कि प्रतिमा में श्रद्धा और आकर्षण दोनों दिखाई दें। यही कारण है कि मिट्टी से तैयार होने वाली प्रतिमाएं अंतिम रूप लेने के बाद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं।

मेहनत के साथ जुड़ी है आस्था
मोनू रैकवार का कहना है कि प्रतिमा बनाते समय उन्हें यह महसूस होता है कि वे केवल मिट्टी को आकार नहीं दे रहे, बल्कि लोगों की आस्था को स्वरूप दे रहे हैं। इसी भावना के कारण वह हर प्रतिमा को पूरी श्रद्धा और मेहनत से तैयार करते हैं।
त्योहारों के दौरान इन प्रतिमाओं की मांग बढ़ जाती है, जिससे मूर्तिकारों का काम भी कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे समय में परिवार के सदस्य भी उनके काम में सहयोग करते हैं। देर रात तक प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का सिलसिला चलता रहता है।
हुनर को मिलना चाहिए प्रोत्साहन
स्थानीय मूर्तिकारों का मानना है कि पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने के लिए कलाकारों को प्रोत्साहन और उचित बाजार उपलब्ध होना जरूरी है। बढ़ती लागत के बीच यदि स्थानीय कलाकारों को सहयोग मिले तो वे इस कला को नई पीढ़ी तक पहुंचा सकते हैं।
दमोह के मोनू रैकवार इसी उम्मीद के साथ अपनी कला को आगे बढ़ा रहे हैं। मिट्टी, रंग और मेहनत के मेल से तैयार हो रही उनकी प्रतिमाएं त्योहारों की आस्था को नया रूप दे रही हैं।
कछियाना मोहल्ले में इन दिनों चल रहा उनका काम यह संदेश भी देता है कि हुनर और लगन के सामने संसाधनों की कमी बड़ी बाधा नहीं बन सकती। हाथों में कला हो और मन में आस्था, तो साधारण मिट्टी भी आकर्षक प्रतिमा का रूप ले सकती है।
स्वराज वाणी संवाददाता सोनू अठया, दमोह, मध्य प्रदेश
