Iran-US शांति समझौते के बाद सस्ता हुआ कच्चा तेल, लेकिन अभी नहीं घटेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम: केंद्रीय मंत्री
Iran-US के बीच हुए शांति समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। इसके बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल राहत मिलने की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की ओर से स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि वैश्विक स्तर पर तेल सस्ता होने का फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लगेगा।
केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने दी सफाई
पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और पर्यटन राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने गुरुवार को कहा कि केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम होने से देश में ईंधन के दाम तुरंत नहीं घटाए जा सकते। उन्होंने बताया कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें कई आर्थिक और लॉजिस्टिक कारकों को ध्यान में रखकर तय की जाती हैं।
मंत्री के अनुसार, वैश्विक बाजार में सस्ता हुआ कच्चा तेल भारत तक पहुंचने में समय लेता है। इसके बाद उसका रिफाइनिंग, वितरण और अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना भी आवश्यक होता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई कमी का सीधा असर तुरंत खुदरा कीमतों पर नहीं दिखता।
होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी है आपूर्ति
सुरेश गोपी ने कहा कि भारत में आयात होने वाला बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के रास्ते आता है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। यहां जहाजों की भारी आवाजाही के कारण तेल की आपूर्ति में समय लगता है। ऐसे में वैश्विक कीमतों में गिरावट का लाभ भारतीय बाजार तक पहुंचने में कुछ समय लगना स्वाभाविक है।
तेल कंपनियों और सरकार पर पड़ा दबाव
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि फरवरी में शुरू हुए संघर्ष के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था, जिससे तेल विपणन कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ा। सरकार ने इस दबाव का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया ताकि उपभोक्ताओं पर अधिक बोझ न पड़े।
उन्होंने दावा किया कि इस अवधि में केंद्र सरकार को लगभग 12 हजार करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा। सरकार ने तेल कंपनियों को राहत देने और आपूर्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए।
राज्यों पर भी उठाया सवाल
सुरेश गोपी ने कहा कि जब ईंधन की कीमतें बढ़ीं तो अधिकांश राज्यों ने वैट या अन्य करों में कोई विशेष कटौती नहीं की। ऐसे में पूरा बोझ केंद्र सरकार और तेल कंपनियों पर आ गया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को भी राजस्व की आवश्यकता होती है और तेल कंपनियों का आर्थिक रूप से मजबूत बने रहना भी जरूरी है।
शांति समझौते के बाद तेल बाजार में राहत
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता लौटने लगी है। समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से वाणिज्यिक जहाजों के लिए पूरी तरह खोलने का रास्ता साफ हुआ है।
दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का परिवहन इसी समुद्री मार्ग से होता है। संघर्ष के दौरान आपूर्ति बाधित होने की आशंका के कारण कच्चे तेल की कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। अब कीमतें घटकर लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं।
क्या उपभोक्ताओं को मिलेगी राहत?
विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट यदि लंबे समय तक बनी रहती है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला सामान्य रूप से संचालित होती रहती है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव भारत के ईंधन बाजार पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुछ राहत मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि यह प्रक्रिया तत्काल नहीं होती, क्योंकि तेल की खरीद, परिवहन, रिफाइनिंग और वितरण में समय लगता है।
इसके अलावा घरेलू ईंधन कीमतों पर केंद्र और राज्य सरकारों के कर, तेल विपणन कंपनियों की लागत तथा अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है। यदि वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं और किसी नए संकट की स्थिति उत्पन्न नहीं होती, तो उपभोक्ताओं को भविष्य में ईंधन कीमतों में कमी का लाभ मिल सकता है। फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां बाजार की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, ताकि उचित समय पर आवश्यक निर्णय लिए जा सकें।
निष्कर्ष
ईरान-अमेरिका शांति समझौते के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। हालांकि उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल राहत मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। सरकार का कहना है कि वैश्विक कीमतों में कमी का असर घरेलू बाजार तक पहुंचने में समय लगता है और ईंधन मूल्य निर्धारण कई कारकों पर निर्भर करता है। आने वाले हफ्तों में यदि तेल बाजार स्थिर रहता है तो आम लोगों को भी इसका लाभ मिल सकता है।
