क्षिप्रा आरती को लेकर बढ़ा विवाद: परंपरागत तीर्थ पुरोहितों की भूमिका पर सवाल, आरती के ‘इवेंट’ बनने से उठी नई बहस
वर्षों से रामघाट और सिद्धनाथ पर पूजा-पाठ व कर्मकांड कराने वाले तीर्थ पुरोहितों का दावा—“हमारी परंपरा और रोजी-रोटी को प्रशासनिक व्यवस्था से अलग किया जा रहा”
उज्जैन।
मोक्षदायिनी मां क्षिप्रा के रामघाट पर होने वाली आरती इन दिनों धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था और परंपरागत अधिकारों को लेकर भी चर्चा के केंद्र में है। एक ओर क्षिप्रा आरती का स्वरूप लगातार भव्य होता जा रहा है और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु तथा सेलिब्रिटी तक इसमें शामिल हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वर्षों से क्षिप्रा के घाटों पर पूजन-अर्चन और कर्मकांड कराते आ रहे तीर्थ पुरोहितों के बीच अपनी पारंपरिक भूमिका को लेकर असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है।
तीर्थ पुरोहितों का महाकाल मंदिर से अलग रहा है पारंपरिक कार्यक्षेत्र
तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि उनका कार्यक्षेत्र परंपरागत रूप से क्षिप्रा नदी के घाट रहे हैं। रामघाट हो या सिद्धनाथ घाट, श्रद्धालुओं के पूजन-अर्चन, पिंडदान, तर्पण, मृत्यु उपरांत होने वाले कर्मकांड और अन्य धार्मिक अनुष्ठान वर्षों से इन्हीं तीर्थ पुरोहितों द्वारा कराए जाते रहे हैं।
इन पुरोहितों के पास अपने यजमान परिवारों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी की जानकारी पोथियों में दर्ज होने का दावा भी किया जाता है। यही पोथियां उनके पारंपरिक धार्मिक कार्य की पहचान मानी जाती हैं। उनका कहना है कि घाट पर धार्मिक कर्मकांड ही उनकी आजीविका का प्रमुख आधार है और इसे केवल किसी प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता।
तीर्थ पुरोहितों का यह भी कहना है कि उनका महाकाल मंदिर की पूजा व्यवस्था से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। महाकाल मंदिर की पूजा-पद्धति और वहां की धार्मिक व्यवस्थाएं मंदिर के पुजारी एवं पुरोहित परिवारों की परंपरा से संचालित होती हैं, जबकि तीर्थ पुरोहितों का पारंपरिक कार्यक्षेत्र क्षिप्रा के घाटों पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठान हैं।
महाकाल मंदिर प्रबंध समिति की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
विवाद के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति का अधिकार क्षेत्र कहां तक है?
मंदिर प्रबंध समिति शासन द्वारा गठित संस्था है, जिसका मूल दायित्व महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्थाओं, मंदिर की आय-व्यय व्यवस्था तथा मंदिर से संबंधित प्रशासनिक निर्णयों को देखना है।
ऐसे में तीर्थ पुरोहितों की ओर से सवाल उठाया जा रहा है कि क्षिप्रा के घाटों पर सदियों से चले आ रहे धार्मिक कर्मकांड और आरती की परंपरा में मंदिर प्रबंध समिति की भूमिका किस आधार पर निर्धारित की जा रही है?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजनों में महाकाल मंदिर को छोड़कर व्यापक व्यवस्थाओं से संबंधित अनेक निर्णय जिला प्रशासन और अन्य संबंधित विभागों के स्तर पर लिए जाते हैं।
धार्मिक व्यवस्थाओं में लगातार बढ़ता शुल्क और ‘विशेष दर्शन’ का चलन
क्षिप्रा आरती के विवाद को व्यापक संदर्भ में देखने वाले लोग पिछले कुछ वर्षों में उज्जैन की प्रमुख धार्मिक व्यवस्थाओं में आए बदलावों का भी उल्लेख कर रहे हैं।
महाकाल मंदिर में पहले सामान्य दर्शन के साथ विशेष/वीआईपी दर्शन व्यवस्था, इसके बाद भस्म आरती में विशेष दर्शन तथा शयन आरती जैसी व्यवस्थाओं में भी अलग-अलग श्रेणियों की सुविधाएं विकसित हुईं।
इसके बाद मंगलनाथ मंदिर में मंगल दोष शांति के लिए होने वाले भात पूजन में शुल्क व्यवस्था तथा विशेष दर्शन जैसी व्यवस्थाएं शुरू हुईं। हाल ही में काल भैरव मंदिर में भी दर्शन व्यवस्था में बदलाव कर विशेष दर्शन की सशुल्क सुविधा शुरू किए जाने की चर्चा हुई।
इन व्यवस्थाओं को लेकर समर्थकों का तर्क रहा है कि इससे श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा और मंदिर व्यवस्थाओं को आर्थिक संसाधन मिलते हैं। वहीं आलोचकों का सवाल है कि क्या धीरे-धीरे धार्मिक परंपराओं को आयोजन और प्रबंधन की व्यावसायिक व्यवस्था में बदला जा रहा है?
क्षिप्रा आरती को लेकर टेंडर ने विवाद को और हवा दी
इसी क्रम में अब क्षिप्रा आरती को लेकर सबसे बड़ा विवाद सामने आया है। आरोप है कि आरती को अधिक भव्य और व्यवस्थित कार्यक्रम के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से प्रशासनिक स्तर पर टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई।
तीर्थ पुरोहितों का विरोध इसी बिंदु पर सबसे अधिक है। उनका कहना है कि आरती धार्मिक परंपरा है, कोई व्यावसायिक इवेंट नहीं, जिसे किसी एजेंसी के माध्यम से संचालित किया जाए।
विवाद उस समय और गहरा गया जब आरती में उपयोग होने वाले स्पीकर सहित कुछ सामग्री और तख्त जब्त किए जाने की कार्रवाई की गई। इसके बाद तीर्थ पुरोहितों में नाराजगी बढ़ी।
अब वेद शिक्षा लेने वाले बटुकों से आरती—नई व्यवस्था पर भी सवाल
विवाद के बीच अब महाकाल मंदिर में वेद शिक्षा प्राप्त करने वाले बटुकों से क्षिप्रा आरती कराए जाने की बात सामने आई है।
इसको लेकर तीर्थ पुरोहितों का सवाल है कि जब घाट पर वर्षों से पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड करने वाला अपना पारंपरिक समुदाय मौजूद है, तो उसे हटाकर किसी अन्य व्यवस्था के माध्यम से आरती कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
उनका कहना है कि यदि आरती को भव्य बनाना ही उद्देश्य है तो तकनीकी, प्रकाश, ध्वनि और श्रद्धालुओं की सुविधा की व्यवस्था प्रशासन कर सकता है, लेकिन धार्मिक कर्मकांड और आरती की मूल परंपरा को उन लोगों से अलग नहीं किया जाना चाहिए जो पीढ़ियों से घाट पर धार्मिक कार्य करते आए हैं।

आरती अब बन रही है उज्जैन की नई पहचान
दूसरी ओर यह भी सच है कि पिछले कुछ समय में क्षिप्रा आरती का स्वरूप काफी तेजी से विस्तृत हुआ है।
आरती देखने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु रामघाट पहुंच रहे हैं। श्रद्धालु लंबे समय तक घाट पर बैठकर आरती देखते हैं, मोबाइल फोन से वीडियो बनाते हैं और सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। इससे क्षिप्रा आरती को व्यापक पहचान मिल रही है।
आरती में अब विशिष्ट व्यक्तियों और सेलिब्रिटी की उपस्थिति भी आकर्षण का केंद्र बनने लगी है।
यही वजह है कि एक पक्ष इसे उज्जैन की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को विश्वस्तर पर पहुंचाने का अवसर मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सवाल उठा रहा है कि इस विस्तार के साथ-साथ पारंपरिक तीर्थ पुरोहितों की भूमिका और अधिकार भी सुरक्षित रहना चाहिए।
आरती संचालन को लेकर पंडित राजेश त्रिवेदी का नाम चर्चा में
क्षिप्रा आरती के संचालन में पंडित राजेश त्रिवेदी की प्रमुख भूमिका होने की बात कही जा रही है। उनके राजनीतिक संबंधों को लेकर भी अब सार्वजनिक चर्चा शुरू हो गई है।
बताया जाता है कि राजेश त्रिवेदी की पत्नी माया राजेश त्रिवेदी कांग्रेस की राजनीति से जुड़ी रही हैं और पार्षद के रूप में भी कार्य कर चुकी हैं। उनके विधानसभा चुनाव लड़ने का भी राजनीतिक इतिहास रहा है।
यहीं से विवाद को एक नया राजनीतिक कोण मिलता है।
क्या विवाद के पीछे राजनीतिक कारण भी हो सकते हैं?
सबसे संवेदनशील सवाल यही है कि क्या क्षिप्रा आरती को लेकर तीर्थ पुरोहितों के पारंपरिक अधिकारों में हस्तक्षेप का संबंध किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से है?
इस संबंध में अभी कोई प्रमाणित तथ्य सामने नहीं आया है, इसलिए इसे तथ्य के रूप में कहना उचित नहीं होगा। लेकिन तीर्थ पुरोहितों और आरती संचालन से जुड़े लोगों के राजनीतिक संबंधों को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं प्रशासनिक निर्णयों के पीछे राजनीतिक मतभेद तो कारण नहीं हैं?
इस सवाल का जवाब तभी स्पष्ट होगा जब प्रशासन, महाकाल मंदिर प्रबंध समिति और आरती संचालन से जुड़े लोगों की ओर से इस पूरे मामले पर स्पष्ट और आधिकारिक पक्ष सामने आए।
सबसे बड़ा सवाल—परंपरा बचेगी या नया मॉडल बनेगा?
क्षिप्रा आरती का विवाद केवल एक आरती कराने का विवाद नहीं रह गया है। इसके केंद्र में तीन महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—
पहला, क्या सदियों से घाटों पर धार्मिक कर्मकांड कर रहे तीर्थ पुरोहितों की पारंपरिक भूमिका सुरक्षित रहेगी?
दूसरा, क्या धार्मिक परंपराओं को प्रशासनिक टेंडर और इवेंट मैनेजमेंट के माध्यम से संचालित किया जाना चाहिए?
तीसरा, यदि आरती को भव्य और विश्वस्तरीय बनाना सरकार की प्राथमिकता है तो क्या इसमें परंपरागत तीर्थ पुरोहितों को सहभागी बनाकर मॉडल तैयार नहीं किया जा सकता?
उज्जैन की धार्मिक पहचान केवल भव्य आयोजनों से नहीं, बल्कि उन परंपराओं और परिवारों से भी बनी है जो पीढ़ियों से श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था से जुड़े रहे हैं।
क्षिप्रा के घाटों पर रखी पुरोहितों की पोथियां इस परंपरा की जीवित स्मृति हैं। ऐसे में विकास और भव्यता के साथ यदि परंपरा और परंपरागत हितधारकों को भी साथ रखा जाए तो विवाद की जगह सहभागिता का नया मॉडल तैयार किया जा सकता है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस विवाद को अधिकारों की लड़ाई के रूप में देखता है या उज्जैन की सदियों पुरानी परंपरा और आधुनिक व्यवस्थाओं के बीच संतुलन बनाने का अवसर मानता है।
प्रियंका गुजराती
दैनिक स्वराज वाणी
