स्वच्छ और स्वस्थ होली के लिए प्रदेशव्यापी अभियान: गोकाष्ठ से होगा होलिका दहन, प्राकृतिक रंगों को बढ़ावा
भोपाल। इस वर्ष प्रदेश में होली पर्व को पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जागरूकता से जोड़ते हुए “स्वच्छ और स्वस्थ होली” अभियान चलाया जाएगा। सरकार का उद्देश्य है कि पारंपरिक होलिका दहन में लकड़ी के स्थान पर उपले या गोकाष्ठ (गोबर से निर्मित लकड़ी का विकल्प) का उपयोग किया जाए, ताकि पेड़ों की कटाई को रोका जा सके और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
यह अभियान केवल प्रतीकात्मक पहल नहीं है, बल्कि इसे जनसहयोग और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से व्यापक जनआंदोलन का रूप देने की तैयारी की गई है।
कलेक्टरों को जारी किए गए विस्तृत निर्देश
सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रदेश के सभी जिलों के कलेक्टरों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और सामाजिक समरसता को ध्यान में रखते हुए होली का आयोजन किया जाए।
कलेक्टरों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि लोग प्राकृतिक एवं हर्बल रंगों से होली खेलें। रासायनिक रंगों से होने वाले त्वचा रोग, एलर्जी और पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा।
इसके अलावा, लोगों को यह संकल्प दिलाया जाएगा कि वे पशु-पक्षियों पर रंग न डालें, पानी की बर्बादी न करें और हुड़दंग से दूर रहकर सौहार्दपूर्ण वातावरण में त्योहार मनाएं।
गोकाष्ठ: पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प
गोकाष्ठ, गोबर से निर्मित एक पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद है, जो लकड़ी का प्रभावी विकल्प माना जाता है। होलिका दहन में परंपरागत रूप से बड़ी मात्रा में लकड़ी का उपयोग किया जाता है, जिससे हर वर्ष हजारों पेड़ों की कटाई होती है।
गोकाष्ठ के उपयोग से न केवल वनों पर दबाव कम होगा, बल्कि गोवंश आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रोत्साहन मिलेगा। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आत्मनिर्भरता और स्थानीय रोजगार सृजन को भी बढ़ावा दे सकती है।
CM की ओर से मिलेगा सम्मान
अभियान के अंतर्गत गोकाष्ठ का उपयोग करने वाली पंजीकृत संस्थाओं और आयोजकों को जिला स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों में सम्मानित किया जाएगा।
CM डॉ. मोहन यादव की ओर से पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने वाली संस्थाओं को प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाएंगे। इससे सामाजिक संगठनों, धार्मिक समितियों और नागरिक समूहों में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होगी और वे अधिक संख्या में इस पहल से जुड़ेंगे।
‘अभ्युदय मध्य प्रदेश’ के अंतर्गत क्रियान्वयन
यह अभियान ‘अभ्युदय मध्य प्रदेश’ कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित किया जाएगा। प्रत्येक जिले में इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी कलेक्टर को सौंपी गई है, जबकि संभागायुक्त स्तर पर इसकी निगरानी की जाएगी।
प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अभियान को केवल औपचारिकता न बनाएं, बल्कि जमीनी स्तर पर इसकी प्रभावी मॉनिटरिंग करें। गांवों, कस्बों और शहरों में अलग-अलग रणनीति के तहत जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
सार्वजनिक होलिका दहन का निःशुल्क पंजीयन
अभियान के तहत जिले में आयोजित होने वाले सभी सार्वजनिक होलिका दहन कार्यक्रमों का निःशुल्क पंजीयन किया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रक्रिया पंचायतों के माध्यम से और शहरी क्षेत्रों में नगरीय निकायों के जरिए पूरी की जाएगी।
पंजीयन के दौरान आयोजक संस्था के पदाधिकारियों के नाम, संपर्क नंबर और आयोजन स्थल की जानकारी दर्ज की जाएगी। इससे प्रशासन को निगरानी और समन्वय में सुविधा होगी।
यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि पंजीकृत आयोजनों में पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का ही उपयोग हो।
मैदानी निरीक्षण और प्रतिवेदन व्यवस्था
होलिका दहन के दिन प्रशासनिक अमला विभिन्न स्थलों का भ्रमण करेगा। अधिकारी यह देखेंगे कि लकड़ी के बजाय गोकाष्ठ या उपलों का उपयोग हो रहा है या नहीं।
यदि कोई आयोजन पूरी तरह गोकाष्ठ आधारित होगा, तो संबंधित अधिकारी दो से तीन दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट कलेक्टर को प्रस्तुत करेंगे। इसके आधार पर जिले में पर्यावरण-अनुकूल आयोजनों की सूची तैयार की जाएगी।
प्राथमिकता और प्रोत्साहन की योजना
राज्य शासन द्वारा यह भी संकेत दिया गया है कि भविष्य में जिन संस्थाओं ने पर्यावरण-अनुकूल होलिका दहन का आयोजन किया है, उन्हें अन्य सरकारी योजनाओं या कार्यक्रमों में प्राथमिकता दी जा सकती है।
इससे समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाली संस्थाओं को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा और वे अन्य आयोजनों में भी पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देंगी।
जल संरक्षण पर विशेष जोर
होली के दौरान बड़ी मात्रा में पानी की बर्बादी होती है। इसे ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने जल संरक्षण पर विशेष बल दिया है।
लोगों को “ड्राई होली” या सीमित जल उपयोग की सलाह दी जाएगी। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएंगे, ताकि नई पीढ़ी जिम्मेदारी के साथ त्योहार मनाने की आदत विकसित करे।
सामाजिक समरसता और भाईचारे का संदेश
होली प्रेम, एकता और भाईचारे का पर्व है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि त्योहार के दौरान किसी प्रकार का हुड़दंग, जबरदस्ती रंग लगाना या सामाजिक अशांति फैलाने वाली गतिविधियां स्वीकार्य नहीं होंगी।
लोगों से अपील की गई है कि वे मर्यादा और संयम के साथ उत्सव मनाएं। विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मान का ध्यान रखने पर जोर दिया गया है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में दीर्घकालिक सोच
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अभियान सफल होता है, तो यह भविष्य में अन्य त्योहारों के आयोजन के लिए भी एक मॉडल बन सकता है। दीपावली, गणेश उत्सव और दुर्गा पूजा जैसे आयोजनों में भी पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनाने की दिशा में प्रेरणा मिलेगी।
स्वच्छ और स्वस्थ होली अभियान से प्रदेश में पर्यावरणीय चेतना को नई दिशा मिल सकती है।
निष्कर्ष
प्रदेश सरकार की यह पहल पारंपरिक त्योहारों को आधुनिक पर्यावरणीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का प्रयास है। गोकाष्ठ के उपयोग, प्राकृतिक रंगों के प्रोत्साहन, जल संरक्षण और सामाजिक सौहार्द के संदेश के साथ मनाई जाने वाली होली न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी होगी, बल्कि समाज में जिम्मेदारी और जागरूकता की भावना भी विकसित करेगी।
यदि प्रशासन, सामाजिक संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर इस अभियान को सफल बनाते हैं, तो यह प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है।
