प्रतिबंधित मांझे से लहूलुहान होते नागरिक : नागरिक भी करें अपने कर्तव्य का पालन
पुलिस और प्रशासन के भरोसे नहीं रोकी जा सकती मांझे से होने वाली दुर्घटनाएं
पतंगबाजी भारत की एक प्राचीन और लोकप्रिय परंपरा है। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी, स्वतंत्रता दिवस और अनेक स्थानीय त्योहारों पर लोग उत्साहपूर्वक पतंग उड़ाते हैं। यह परंपरा मनोरंजन, सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रतिबंधित चाइनीज मांझे के बढ़ते उपयोग ने इस आनंददायक परंपरा को एक गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा समस्या में बदल दिया है। आज देश के अनेक शहरों में लोग इस घातक मांझे की चपेट में आकर घायल हो रहे हैं और कई मामलों में अपनी जान तक गंवा रहे हैं।
बढ़ती दुर्घटनाएं चिंता का विषय
हाल ही में मेरठ में प्रतिबंधित मांझे की चपेट में आने से 11वीं कक्षा के एक छात्र का गला बुरी तरह कट गया और उसे 32 टांके लगाने पड़े। इसी प्रकार बरेली में नौवीं कक्षा का एक छात्र, जो प्रदेश के एक मंत्री का भतीजा भी है, गंभीर रूप से घायल हो गया। उसके उपचार के लिए घंटों तक सर्जरी करनी पड़ी।
ये घटनाएं केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। दिल्ली, मुंबई, भोपाल, जयपुर, अहमदाबाद, लखनऊ, कोलकाता और अन्य बड़े शहरों में भी आए दिन ऐसी दुर्घटनाएं सामने आती रहती हैं। सबसे अधिक खतरा दोपहिया वाहन चालकों, पैदल यात्रियों और छोटे बच्चों को होता है। सड़क पर चलते समय अचानक गले या चेहरे पर मांझा फंस जाने से गंभीर चोट लग जाती है। कई मामलों में लोगों की गर्दन कटने से मृत्यु तक हो चुकी है।
आखिर क्या है चाइनीज मांझा?
चाइनीज मांझा सामान्य सूती धागे से तैयार नहीं किया जाता। इसे नायलॉन, प्लास्टिक और सिंथेटिक फाइबर से बनाया जाता है। इसकी मजबूती और धार सामान्य मांझे की तुलना में कई गुना अधिक होती है। यही कारण है कि पतंगबाजी में इसे अधिक प्रभावी माना जाता है, लेकिन इसकी यही विशेषता इसे अत्यंत खतरनाक भी बनाती है।
जब यह मांझा किसी व्यक्ति के शरीर से टकराता है तो इसकी धार गहरे घाव कर देती है। विशेष रूप से गले, चेहरे और हाथों पर गंभीर चोटें आती हैं। कई बार यह मांझा बिजली के तारों में उलझकर विद्युत आपूर्ति बाधित कर देता है और दुर्घटनाओं का कारण बनता है।
केवल इंसानों के लिए ही नहीं, पक्षियों के लिए भी घातक
प्रतिबंधित मांझा केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं बल्कि पक्षियों के लिए भी जानलेवा है। हर वर्ष हजारों पक्षी इस मांझे में उलझकर घायल हो जाते हैं या उनकी मृत्यु हो जाती है। पक्षी संरक्षण संगठनों के अनुसार पतंगबाजी के मौसम में पक्षियों के घायल होने के मामलों में भारी वृद्धि होती है।
इसके अतिरिक्त नायलॉन आधारित यह मांझा पर्यावरण में लंबे समय तक बना रहता है और जैविक रूप से आसानी से नष्ट नहीं होता। इस कारण यह पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को भी बढ़ाता है।
न्यायालयों और सरकारों की सख्ती
प्रतिबंधित मांझे के खतरों को देखते हुए विभिन्न न्यायालयों और सरकारी संस्थाओं ने समय-समय पर कड़े कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने जुलाई 2017 में चाइनीज मांझे के उत्पादन, बिक्री, भंडारण और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भी इसकी बिक्री और उत्पादन पर रोक लगाई हुई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई नाबालिग प्रतिबंधित मांझे का उपयोग करते हुए पाया जाता है तो उसके माता-पिता को भी जिम्मेदार माना जा सकता है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने चाइनीज मांझे से होने वाली मौतों को गंभीर अपराध की श्रेणी में दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। कानून के अनुसार इसके निर्माण, बिक्री अथवा उपयोग पर जुर्माना और कारावास दोनों का प्रावधान है।
कानून होने के बावजूद क्यों नहीं रुक रहा उपयोग?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इतने प्रतिबंधों और कानूनी प्रावधानों के बावजूद चाइनीज मांझे का उपयोग क्यों जारी है?
इसका मुख्य कारण सामाजिक सहयोग की कमी है। प्रतिबंधित मांझे का निर्माण, बिक्री और उपयोग आम नागरिकों द्वारा ही किया जाता है। यदि लोग इसे खरीदना बंद कर दें तो इसकी मांग स्वतः समाप्त हो जाएगी। लेकिन प्रतिस्पर्धा और दिखावे की मानसिकता के कारण कुछ लोग आज भी इसका उपयोग कर रहे हैं।
पुलिस और प्रशासन समय-समय पर छापेमारी कर बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित मांझा जब्त करते हैं, लेकिन किसी भी प्रशासन के लिए हर गली, मोहल्ले और बाजार की लगातार निगरानी करना संभव नहीं है। परिणामस्वरूप कुछ समय बाद फिर वही स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
नागरिकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
इस समस्या के समाधान में नागरिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति को अपने क्षेत्र में प्रतिबंधित मांझे की बिक्री, निर्माण या भंडारण की जानकारी मिले तो उसे तत्काल स्थानीय पुलिस या प्रशासन को सूचित करना चाहिए।
सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए प्रत्येक नागरिक को यह समझना होगा कि सार्वजनिक सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। समाज के सहयोग के बिना किसी भी कानून को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सकता।
अभिभावकों की जिम्मेदारी
माता-पिता की भूमिका इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण है। बच्चे अक्सर दोस्तों के प्रभाव या आकर्षण के कारण प्रतिबंधित मांझा खरीद लेते हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को इसके खतरों के बारे में विस्तार से बताएं।
उन्हें समझाया जाना चाहिए कि पतंगबाजी का आनंद किसी व्यक्ति की जान से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। बच्चों को सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल सूती धागे का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की भूमिका
विद्यालय और महाविद्यालय भी जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। छात्रों के लिए विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, जिनमें प्रतिबंधित मांझे के खतरों, कानूनी परिणामों और सामाजिक प्रभावों के बारे में जानकारी दी जाए।
यदि युवा पीढ़ी इस विषय में जागरूक हो जाती है तो भविष्य में इस समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
सामाजिक संगठनों और मीडिया की जिम्मेदारी
सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय नागरिक समितियों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। जनजागरण अभियान, पोस्टर प्रतियोगिताएं, रैलियां, नुक्कड़ नाटक और सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा सकता है।
मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। समाचार पत्र, टीवी चैनल और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म इस विषय को लगातार प्रमुखता देकर समाज में जागरूकता बनाए रख सकते हैं।
सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा देने की आवश्यकता
प्रतिबंधित मांझे के स्थान पर पारंपरिक सूती धागे और पर्यावरण अनुकूल मांझे के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इससे न केवल लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी बल्कि हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी सुरक्षित रहेंगी।
त्योहारों और उत्सवों का वास्तविक उद्देश्य आनंद और सौहार्द बढ़ाना है, न कि किसी की जान को जोखिम में डालना।
सामूहिक संकल्प ही समाधान
प्रतिबंधित चाइनीज मांझा केवल एक धागा नहीं, बल्कि एक ऐसा खतरा है जो किसी भी समय किसी भी व्यक्ति की जान ले सकता है। सड़क पर चल रहा व्यक्ति, विद्यालय जा रहा छात्र, काम पर जा रहा कर्मचारी या आसमान में उड़ता पक्षी—कोई भी इसका शिकार बन सकता है।
इसलिए आवश्यकता केवल कानून बनाने या प्रशासनिक कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की है। यदि प्रत्येक नागरिक यह संकल्प ले कि वह स्वयं प्रतिबंधित मांझे का उपयोग नहीं करेगा, दूसरों को भी इसके उपयोग से रोकेगा तथा इसकी बिक्री की सूचना संबंधित अधिकारियों को देगा, तो इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
निष्कर्ष
जब तक देश के नागरिक अपने कर्तव्य को समझते हुए स्वयं आगे नहीं आएंगे, तब तक केवल पुलिस और प्रशासन के भरोसे प्रतिबंधित मांझे से होने वाली दुर्घटनाओं को पूरी तरह नहीं रोका जा सकेगा। सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए जनभागीदारी सबसे प्रभावी उपाय है। आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि प्रतिबंधित मांझे का न तो उपयोग करेंगे, न खरीदेंगे और न ही इसके अवैध कारोबार को बढ़ावा देंगे। तभी हम एक सुरक्षित, संवेदनशील और जिम्मेदार समाज का निर्माण कर सकेंगे।
न इंजी. कवि अतिवीर जैन * पराग *
पूर्व उपनिदेशक, रक्षा मंत्रालय
कवि, लेखक , व्यंग्यकार ,
साहित्यकार,स्वतंत्र पत्रकार ,
स्तंभकार,सामाजिक कार्यकर्ता
मोबाइल 94569 66722 what’s up
232/1डी,शिवलोक ,
कंकर खेड़ा, मेरठ केंट-250001
