चातुर्मास या चतुर्मुखी विकास विषय पर राष्ट्र गौरव पारस जैन “पार्श्वमणि” का चिंतन। करोड़ों के धार्मिक आयोजनों की राशि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और साधर्मिक उत्थान में लगाने का सार्थक सुझाव।
चातुर्मास या चतुर्मुखी विकास : आत्ममंथन का विषय
राष्ट्र गौरव पारस जैन “पार्श्वमणि”, पत्रकार, कोटा (राजस्थान)
चातुर्मास या चतुर्मुखी विकास वर्तमान समय में जैन समाज के लिए एक महत्वपूर्ण चिंतन का विषय बन चुका है। अभी सम्पूर्ण भारत वर्ष में लगभग 2 हजार से अधिक जैन साधु-संतों एवं त्यागी व्रतियों के भव्य चातुर्मास विभिन्न गाँवों, नगरों, शहरों एवं तीर्थ स्थलों पर आयोजित होने जा रहे हैं।
निस्संदेह, चातुर्मास जैन परंपरा की आत्मा है। चार माह तक साधु-संत एक स्थान पर रुककर धर्म-ध्यान, स्वाध्याय और उपदेश के माध्यम से समाज को नई दिशा प्रदान करते हैं। वे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान रूपी प्रकाश का मार्ग दिखाते हैं तथा मानव को नर से नारायण, पतित से पावन और तितर से तीर्थंकर बनने का मार्ग बताते हैं।
चातुर्मास या चतुर्मुखी विकास : बढ़ते खर्च पर विचार
आज चातुर्मास के दौरान सजावटी पंडाल, भव्य मंच, हाई-प्रोफाइल कैटरिंग तथा अन्य व्यवस्थाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं।विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या इन खर्चों से समाज को दीर्घकालीन लाभ मिल पाता है?न तो इससे नए जैन धर्मावलंबियों की संख्या बढ़ती है और न ही आर्थिक रूप से कमजोर साधर्मिक परिवारों का वास्तविक कल्याण हो पाता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा ठेकेदारों, डेकोरेटरों और कैटरिंग व्यवसाय से जुड़े लोगों तक पहुंचता है, जिनमें अधिकांश अजैन बंधु होते हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में निवेश की आवश्यकता
यदि यही राशि समाज के विकास के लिए उपयोग की जाए तो इसके परिणाम अत्यंत सकारात्मक हो सकते हैं।
संभावित पहल
- गरीब मेधावी विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति
- अत्याधुनिक अस्पतालों का निर्माण
- स्वरोजगार योजनाओं की शुरुआत
- आर्थिक रूप से कमजोर जैन परिवारों की सहायता
- संस्कार निर्माण केंद्रों की स्थापना
यदि करोड़ों रुपये की राशि से एक साधर्मी विकास ट्रस्ट बनाकर जैन बैंक अथवा सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से समाज हित में निवेश किया जाए, तो हजारों परिवारों का जीवन बदल सकता है।
सादगी बनाम आडंबर
जैन धर्म के मूल सिद्धांतों में अपरिग्रह और सादगी का विशेष महत्व है।तीर्थंकरों ने हमें त्याग, संयम और सेवा का मार्ग दिखाया है। ऐसे में धर्म के नाम पर अत्यधिक दिखावा और वैभव प्रदर्शन कहीं न कहीं मूल भावना से दूर ले जाता दिखाई देता है।धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण, करुणा और समाज का सर्वांगीण उत्थान है।
सच्ची प्रभावना और गुरु-दक्षिणा
यदि चातुर्मास के माध्यम से—
- एक बेरोजगार साधर्मिक भाई को रोजगार मिले,
- एक गरीब विद्यार्थी डॉक्टर या इंजीनियर बने,
- एक जरूरतमंद परिवार आत्मनिर्भर बन जाए,
तो यही सच्ची प्रभावना और वास्तविक गुरु-दक्षिणा होगी।अंततः हिसाब बैंक बैलेंस का नहीं बल्कि पुण्य का होगा।
निष्कर्ष
यह लेख चातुर्मास के विरोध में नहीं है, बल्कि “सादगी बनाम आडंबर” के विषय पर एक सकारात्मक चिंतन है। समय की मांग है कि धर्म और समाज सेवा के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।“सोचो, समझो और सही निर्णय लो।”
प्रस्तुति
राष्ट्र गौरव पारस जैन “पार्श्वमणि”
पत्रकार, कोटा (राजस्थान)
📞 9414764980
