भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते नहीं हैं। दोनों देशों के संबंध इतिहास, संस्कृति, सीमा सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा, जल संसाधन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी से गहराई से जुड़े हुए हैं। बांग्लादेश में पिछले कुछ वर्षों में हुए राजनीतिक बदलावों ने भारत के सामने नई परिस्थितियां पैदा की हैं। इन बदलावों का सबसे सीधा प्रभाव भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा, व्यापार और विकास पर पड़ सकता है।
1971 से शुरू हुई साझेदारी
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की मजबूत नींव 1971 के मुक्ति संग्राम के दौर में पड़ी थी। बांग्लादेश के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने के बाद दोनों देशों ने सहयोग के कई क्षेत्रों में आगे बढ़ने की कोशिश की। हालांकि समय-समय पर अवैध प्रवास, सीमा प्रबंधन, जल बंटवारा, व्यापार असंतुलन और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के कारण संबंधों में तनाव भी देखने को मिला।
2009 में शेख हसीना के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में महत्वपूर्ण बदलाव आया। बांग्लादेश ने अपनी जमीन से भारत विरोधी उग्रवादी गतिविधियों पर कार्रवाई की, जिससे भारत के पूर्वोत्तर में सुरक्षा स्थिति को मजबूती मिली। इसके बाद दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और राजनीतिक संवाद लगातार बढ़ता गया।
भूमि सीमा समझौते से बढ़ा भरोसा
भारत-बांग्लादेश संबंधों में 2015 का भूमि सीमा समझौता एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रहा। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे एन्क्लेव संबंधी विवाद का समाधान हुआ। भारत और बांग्लादेश ने क्रमशः 111 और 51 एन्क्लेव का आदान-प्रदान किया।
यह समझौता केवल सीमा प्रबंधन की समस्या का समाधान नहीं था, बल्कि दोनों देशों के बीच बढ़ते राजनीतिक विश्वास का भी प्रतीक बना। दशकों से जटिल बने सीमा संबंधी मुद्दे को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने से द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा मिली।
कनेक्टिविटी बनी रिश्तों की नई ताकत
भारत और बांग्लादेश के बीच कनेक्टिविटी परियोजनाओं ने रिश्तों को आर्थिक और रणनीतिक रूप से और महत्वपूर्ण बनाया है। नवंबर 2023 में अखौरा-अगरतला क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक का उद्घाटन इसी दिशा में एक बड़ा कदम था।
लगभग 12.24 किलोमीटर लंबा यह रेल संपर्क भारत के पूर्वोत्तर को बांग्लादेश के माध्यम से व्यापक बाजारों से जोड़ने की क्षमता रखता है। बेहतर रेल, सड़क और जलमार्ग संपर्क से माल परिवहन का समय और लागत कम हो सकती है। इससे पूर्वोत्तर राज्यों के व्यापारिक अवसरों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पूर्वोत्तर क्षेत्र मुख्य रूप से सिलीगुड़ी कॉरिडोर के जरिए देश के अन्य हिस्सों से जुड़ा हुआ है। बांग्लादेश के रास्ते वैकल्पिक संपर्क उपलब्ध होने से इस निर्भरता को कम करने में मदद मिल सकती है।
सुरक्षा सहयोग का महत्व
भारत के लिए बांग्लादेश की भूमिका केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। अतीत में पूर्वोत्तर भारत के कुछ उग्रवादी संगठनों द्वारा बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किए जाने की चिंताएं सामने आती रही हैं।
शेख हसीना सरकार के कार्यकाल में बांग्लादेश द्वारा भारत विरोधी उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई और दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग ने इस चुनौती को काफी हद तक कमजोर किया। इसलिए भारत के लिए बांग्लादेश में स्थिर और सहयोगी राजनीतिक वातावरण पूर्वोत्तर की आंतरिक सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ विषय है।
व्यापार और आर्थिक रिश्ते भी अहम
भारत और बांग्लादेश के बीच आर्थिक सहयोग ने भी पिछले वर्षों में गति पकड़ी है। भारत ने बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं के लिए रियायती ऋण उपलब्ध कराए हैं। बिजली, रेल, सड़क, बंदरगाह और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ऐसे में राजनीतिक बदलावों के बावजूद आर्थिक परियोजनाओं को जारी रखना दोनों देशों के दीर्घकालिक हित में होगा। यदि कनेक्टिविटी और व्यापार से जुड़े प्रोजेक्ट राजनीतिक मतभेदों के कारण प्रभावित होते हैं तो इसका नुकसान केवल सरकारों को नहीं, बल्कि दोनों देशों के कारोबार और आम जनता को भी हो सकता है।
2024 के बाद बदले राजनीतिक समीकरण
अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद भारत-बांग्लादेश संबंध एक नए दौर में प्रवेश कर गए। शेख हसीना के भारत आने के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक संक्रमण शुरू हुआ। इसके बाद अंतरिम सरकार और फिर चुनाव के माध्यम से नई राजनीतिक व्यवस्था अस्तित्व में आई।
इस बदले राजनीतिक वातावरण में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह पुराने राजनीतिक समीकरणों से आगे बढ़कर बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संस्थागत संबंध मजबूत करे। दोनों देशों के बीच संबंध किसी एक राजनीतिक दल या व्यक्ति पर निर्भर न रहें, यह दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आवश्यक है।
हसीना का मुद्दा बना संवेदनशील
शेख हसीना का भारत में रहना भी भारत-बांग्लादेश संबंधों में संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। बांग्लादेश की ओर से उनके प्रत्यर्पण की मांग की गई है। भारत ने इस विषय पर कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत विचार करने की बात कही है।
यह मामला दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में भारत को एक ओर अपने कानूनी दायित्वों और द्विपक्षीय संबंधों को ध्यान में रखना होगा, वहीं दूसरी ओर अपने दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को भी सुरक्षित रखना होगा।
चीन के बढ़ते प्रभाव की चुनौती
बांग्लादेश में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच चीन की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश में बुनियादी ढांचे, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में चीन की सक्रियता पहले से मौजूद है।
भारत के लिए इसका जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं हो सकता। भारत को बेहतर आर्थिक विकल्प, तेज कनेक्टिविटी, निवेश और विकास साझेदारी के माध्यम से अपनी भूमिका मजबूत करनी होगी। यदि भारत बांग्लादेश के विकास में भरोसेमंद और दीर्घकालिक भागीदार बना रहता है, तो दोनों देशों के रणनीतिक हितों के बीच संतुलन कायम रखने की संभावना बढ़ेगी।
पूर्वोत्तर पर सीधा असर
बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता का असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर सीधे पड़ता है। सीमा सुरक्षा, अवैध गतिविधियों की रोकथाम, व्यापारिक संपर्क और परिवहन नेटवर्क सभी बांग्लादेश के साथ संबंधों से प्रभावित होते हैं।
यदि दोनों देशों के बीच बेहतर सहयोग बना रहता है तो पूर्वोत्तर भारत के लिए बांग्लादेश के बंदरगाहों और परिवहन मार्गों का इस्तेमाल व्यापार को गति दे सकता है। इससे क्षेत्र में रोजगार, निवेश और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
आगे का रास्ता संतुलित कूटनीति
वर्तमान परिस्थितियों में भारत के लिए टकराव की बजाय संतुलित कूटनीति अधिक प्रभावी रास्ता हो सकती है। सुरक्षा सहयोग को जारी रखते हुए व्यापार, ऊर्जा और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को राजनीतिक उतार-चढ़ाव से बचाना जरूरी होगा।
इसके साथ ही भारत को बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संस्थागत स्तर पर संवाद बढ़ाना चाहिए। सरकार बदलने के साथ रिश्तों की दिशा पूरी तरह बदलने के बजाय दोनों देशों के साझा हितों को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
अंततः बांग्लादेश की स्थिरता भारत के लिए केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। यह पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी से सीधे जुड़ा हुआ प्रश्न है। ढाका में बदलते राजनीतिक मौसम के बीच नई दिल्ली की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह व्यक्ति-केंद्रित रिश्तों से आगे बढ़कर भारत-बांग्लादेश संबंधों को दीर्घकालिक, संस्थागत और राष्ट्रीय हितों पर आधारित साझेदारी में बदल सके। यही रास्ता भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए सबसे सुरक्षित और आर्थिक रूप से लाभकारी साबित हो सकता है।
