दुःख का असली कारण क्या है? दृष्टि बदलिए, सुख स्वयं दिखाई देने लगेगा
भाव लेखक: अंशुल जैन शास्त्री, द्रोणगिरी
मनोज जैन नायक
मुरैना/द्रोणगिरी। आज मनुष्य के पास सुख के साधन और जीवन की सुविधाएं पहले की अपेक्षा अधिक हैं, फिर भी भीतर शांति और संतोष की कमी दिखाई देती है। प्रश्न यह नहीं कि हमारे जीवन में सुख है या नहीं, बल्कि यह है कि हम उसे कितना पहचानते हैं। दुःख हमेशा बाहर से नहीं आता। कई बार हमारी दृष्टि, अपेक्षाएं और विचार ही भीतर असंतोष पैदा करते हैं। अपने जीवन को देखने का तरीका बदलकर हम उपलब्ध सुख को पहचान सकते हैं।
दूसरों से तुलना बढ़ाती है दुःख
जब हम अपने जीवन को देखते हैं, तो बहुत कुछ अच्छा दिखाई देता है। लेकिन जैसे ही दूसरे के घर, संपत्ति, गाड़ी और सुविधाओं से तुलना करते हैं, अपना सुख छोटा लगने लगता है। जिस उपलब्धि से कल तक संतोष था, वही आज किसी दूसरे की उपलब्धि के सामने कम प्रतीत होने लगती है।
वास्तव में इस तुलना से हमारी सुविधाएं कम नहीं होतीं, लेकिन उनके प्रति संतोष घट जाता है। दूसरों की सफलता देखकर अपनी यात्रा को असफल मान लेना स्वयं के प्रयासों की उपेक्षा है। प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियां, अवसर और समय अलग हैं। इसलिए अपनी प्रगति का मूल्यांकन केवल दूसरे की उपलब्धियों के आधार पर नहीं करना चाहिए।
‘मेरा’ का भाव और खोने का भय
दुःख का दूसरा कारण ममता और आसक्ति है। हम वस्तुओं तथा संबंधों में प्रेम रखने के साथ अपना अस्तित्व भी जोड़ देते हैं। मेरा घर, मेरा धन, मेरा पुत्र, मेरी प्रतिष्ठा और मेरा पद जैसे भाव धीरे-धीरे खोने का भय पैदा करते हैं। जब तक सब इच्छानुसार चलता है, संसार सुखद लगता है।
लेकिन किसी वस्तु के छिनने, संबंधों में अपेक्षाएं पूरी न होने या अपने किसी व्यक्ति के असफल होने पर पीड़ा बढ़ जाती है। हमने वस्तु अथवा संबंध के साथ ‘मैं’ और ‘मेरा’ जोड़ लिया होता है। इसलिए प्रेम रखिए, लेकिन आसक्ति को अपने सुख का स्वामी मत बनने दीजिए। अपनापन और परिवर्तन की स्वीकार्यता साथ रह सकते हैं।
जल्दी सब पाने की अधीरता
आज मनुष्य केवल सफल होना नहीं चाहता, बल्कि तुरंत सफल होना चाहता है। कम समय में अधिक धन, जल्दी प्रतिष्ठा और दूसरों से आगे निकलने की इच्छा जीवन की सहज गति प्रभावित करती है। लक्ष्य प्रेरणा देते हैं, लेकिन अधीर अपेक्षाएं उन्हीं लक्ष्यों को परेशानी का कारण बना सकती हैं।
सपने देखना अच्छी बात है, पर उनके साथ साधना और धैर्य आवश्यक हैं। अपनी सामर्थ्य तथा परिस्थितियों को पहचानते हुए प्रयास करना चाहिए। संकल्प रखिए और समय का सम्मान कीजिए। आकाश छूने की आकांक्षा के साथ पैरों के नीचे की धरती का ध्यान रखना भी जरूरी है।
स्वयं की ओर लौटे दृष्टि
सुखी रहने के लिए दूसरों को देखना थोड़ा कम और स्वयं को समझना शुरू कीजिए। दूसरे का बड़ा घर आपके घर का महत्व कम नहीं करता। दूसरे की संपत्ति आपकी उपलब्धियों को मिटाती नहीं है। दूसरे की सफलता आपकी यात्रा को असफल नहीं बनाती।
पूज्य आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के संदेशों में आत्मदृष्टि और आत्मचिंतन की प्रेरणा मिलती है। दृष्टि स्वयं की ओर लौटने पर अपने विचारों को समझने का मार्ग खुलता है। इसी प्रकार पूज्य मुनिश्री सुधासागरजी महाराज के प्रवचनों में दुःख समझने के लिए भीतर देखने का भाव मिलता है। अपेक्षाएं और आसक्ति कई बार हमारी पीड़ा बढ़ाती हैं।
उपलब्ध सुख को पहचानिए
हर बार संसार बदलना आवश्यक नहीं होता। कई बार दृष्टि बदलने से जीवन के अच्छे पक्ष दिखाई देने लगते हैं। दूसरों के सुख की गिनती छोड़कर अपने सुख पहचानिए। दूसरों की ऊंचाई देखकर स्वयं को छोटा समझने के बजाय अपनी क्षमताओं का सम्मान कीजिए।
जो हमारे पास है, उसका मूल्य समझना संतोष की शुरुआत है। संभव है, जिस सुख को हम बाहर खोज रहे हैं, उसकी अनुभूति आत्मचिंतन से भीतर ही होने लगे।
