आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी एवं अनुत्तरमति माताजी का मंगल विहार चन्देरी की ओर
Chanderi : जहाँ इतिहास बोलता है, तप मुस्कुराता है और जैन संस्कृति श्वास लेती है
चन्देरी।
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज की पावन शिष्या एवं आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज की आज्ञा से आर्यिका रत्न श्री 105 अपूर्वमति माताजी एवं श्री 105 अनुत्तरमति माताजी का मंगल विहार अतिशय क्षेत्र आहारजी से प्रारम्भ होकर अब ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक नगरी चन्देरी की ओर अग्रसर है। माताजी का यह पावन आगमन केवल एक विहार नहीं, बल्कि चन्देरी की हजारों वर्षों पुरानी जैन संस्कृति, तप परम्परा और आध्यात्मिक वैभव के पुनर्जागरण का शुभ संकेत है।
चन्देरी का स्मरण आते ही बूढ़ी चन्देरी की पावन धरा स्वतः स्मृति में आ जाती है। यह वही नगरी है, जिसे महाभारतकाल में राजा शिशुपाल की राजधानी माना जाता है। आज भले ही यह क्षेत्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में हो, किन्तु इसके भग्न जिनालय, जर्जर देवालय और मौन खण्डहर आज भी शासन से प्रश्न करते प्रतीत होते हैं—क्या हमारी गोद में सोया जैन इतिहास कभी पुनः प्रकाश में आएगा?

पुरातत्व विभाग द्वारा चिन्हित 44 ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई आज भी प्रतीक्षा में है। यदि इन स्थलों का वैज्ञानिक उत्खनन हो, तो निश्चय ही जैन संस्कृति के ऐसे अनमोल अध्याय सामने आएँगे जो भारतीय इतिहास को नई दिशा देंगे। चिमला मामौन ओर बिक्रमपुर के खेतों में बिखरी जिन प्रतिमाएँ और गोरिल्ला पर्वत की शिलाएँ आज भी अपने अस्तित्व की मूक गवाही दे रही हैं।
चन्देरी वह पुण्यभूमि है जहाँ ईसा पूर्व के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी के मध्य पर्वतों, गुफाओं और कंदराओं में शिल्पियों ने अपनी साधना रूपी छैनी से जिन प्रतिमाओं का निर्माण किया, वे आज भी विश्व को विस्मित करती हैं।
यह वह भूमि है जहाँ मूलसंघ–बलात्कारगण–सरस्वतीगच्छ की गौरवशाली परम्परा के आचार्यों ने अपने तप, त्याग और साधना से धर्मध्वजा को ऊँचा रखा। वहीं शुद्ध तेरापंथ आम्नाय (परवार पट्ट) के भट्टारकों ने अपनी प्रखर प्रज्ञा, आगमज्ञान और धर्मप्रभावना से सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड को आध्यात्मिक आलोक प्रदान किया। चन्देरी के भट्टारक सदैव शुद्ध तेरापंथ आम्नाय की मर्यादाओं के पालनकर्ता रहे और इसी परम्परा ने इस क्षेत्र को विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान की।
इसी पावन भूमि पर तारणतारण स्वामी की साधना और शिक्षा का भी प्रभाव रहा, जिन्होंने आगे चलकर तारण पंथ की स्थापना की। ऐतिहासिक परम्पराओं के अनुसार चन्देरी में लगभग 250 वर्षों तक निरन्तर “समयसार” ग्रंथ की वाचन परम्परा चलती रही, जो इस क्षेत्र की गहन आध्यात्मिक साधना का अनुपम प्रमाण है।

धर्मसम्राट पंडाशाह, जिन्होंने बुन्देलखण्ड के अनेक क्षेत्रों में भगवान श्री 1008 शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ भगवान की प्रतिष्ठाएँ कराईं, उनकी जन्मभूमि भी थूबोन क्षेत्र को माना जाता है। इसके प्रमाण आज भी दर्शनोदय तीर्थ थूबोन में सुरक्षित हैं।
थूबोन का खजुराहो शैली में निर्मित भगवान शांतिनाथ जिनालय मध्यकालीन स्थापत्य कला की उत्कृष्ट कृति है। वहीं भियादांत जी की गुफा में विराजमान विशाल पद्मासन प्रतिमा, उसका अद्वितीय केश विन्यास और अप्रतिम शिल्प विश्वविख्यात है। यह गुफा आज भी असंख्य श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बनी हुई है।
चन्देरी आज बुन्देलखण्ड की सबसे ऊँची 42 फीट भगवान आदिनाथ की दिव्य प्रतिमा का भी गौरव धारण किए हुए है। यहाँ की गुफाओं में उत्कीर्ण कान-क्षेदन युक्त जिन प्रतिमाएँ भारतीय शिल्पकला की अद्वितीय धरोहर हैं, जिनका विश्व में कोई दूसरा समकक्ष दुर्लभ है।
चन्देरी के शुद्ध तेरापंथ आम्नाय (परवार पट्ट) के भट्टारकों ने केवल चन्देरी ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड, राजस्थान, उत्तरप्रदेश और दिल्ली तक हजारों जिनप्रतिष्ठाएँ सम्पन्न कर जैन धर्म की अमिट छाप छोड़ी। उनकी धर्मप्रभावना ने चन्देरी को भारतीय जैन इतिहास में विशिष्ट स्थान प्रदान किया।

विश्वप्रसिद्ध चौबीसी का इतिहास भी चन्देरी का गौरव है। धर्मनिष्ठ लाला सवा सिंह जी द्वारा सम्पन्न ऐतिहासिक पंचकल्याणक और उनकी अनुपम धर्मनिष्ठा आज भी प्रेरणा का स्रोत है। यदि इस इतिहास का व्यापक प्रचार-प्रसार हो, तो चन्देरी पुनः विश्व के प्रमुख जैन तीर्थों में अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकती है।
राष्ट्रसंत आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज की प्रारम्भिक शिक्षा भी इसी चन्देरी की पुण्यभूमि पर हुई। यहीं से प्राप्त संस्कारों और साधना ने उन्हें आगे चलकर सम्पूर्ण देश में जैन दर्शन के महान प्रचारक के रूप में प्रतिष्ठित किया।
आज जब आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज की पावन शिष्या आर्यिका रत्न श्री 105 अपूर्वमति माताजी एवं आर्यिका श्री 105 अनुत्तरमति माताजी का चातुर्मास चन्देरी की पुण्यभूमि पर होने जा रहा है, तब सम्पूर्ण नगर आध्यात्मिक चेतना, स्वाध्याय, संयम, तप और धर्ममय वातावरण से अनुप्राणित होगा।

चन्देरी संग्रहालय की जैन पुरातत्व दीर्घा भी इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की सजीव साक्षी है। वहाँ सुरक्षित प्रतिमाएँ, अभिलेख और स्थापत्य अवशेष मानो उद्घोष कर रहे हैं कि चन्देरी केवल एक नगर नहीं, बल्कि जैन संस्कृति का जीवंत इतिहास है।
माताजी का यह मंगल आगमन चन्देरी के लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, पुरातत्व और अध्यात्म के नवोदय का मंगल संदेश है। यदि शासन, पुरातत्व विभाग और समाज मिलकर इस अमूल्य धरोहर के संरक्षण का संकल्प लें, तो वह दिन दूर नहीं जब चन्देरी पुनः विश्व के प्रमुख जैन आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित होगी।
