पर्युषण पर्व पर दिगंबर जैन मंदिर कंकरखेड़ा में सजा कवि सम्मेलन
अखिल भारतीय जैन साहित्य परिषद के आयोजन में कवियों ने धर्म, हिंदी, पर्यावरण और प्रेम पर प्रस्तुत कीं प्रभावशाली रचनाएं
कंकरखेड़ा, मेरठ। पर्युषण महापर्व के पावन अवसर पर श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, कंकरखेड़ा में अखिल भारतीय जैन साहित्य परिषद की ओर से भव्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। इस साहित्यिक एवं धार्मिक आयोजन में कवियों ने जैन धर्म, णमोकार महामंत्र, हिंदी भाषा, पर्यावरण संरक्षण, प्रेम और देशभक्ति जैसे विषयों पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। देर रात तक चले कवि सम्मेलन में उपस्थित श्रोताओं ने तालियों के साथ कवियों का उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान महावीर एवं जिनवाणी के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। हेमचंद जैन, श्रीपाल जैन, शरत जैन, देवेंद्र जैन, मंगल जैन, विपिन जैन एवं राजीव जैन ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन किया। इसके बाद श्रीमती प्रीति जैन ने मधुर स्वर में जिनवाणी वंदना प्रस्तुत की। जिनवाणी वंदना के साथ मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बन गया और विधिवत कवि सम्मेलन का शुभारंभ हुआ।
हिंदी भाषा की महत्ता पर प्रस्तुत की कविता
कवि सम्मेलन में श्रीमती चित्रा त्यागी ने हिंदी भाषा के महत्व, सामाजिक योगदान और सांस्कृतिक पहचान को केंद्र में रखकर प्रभावशाली कविता प्रस्तुत की। उन्होंने अपनी रचना के माध्यम से हिंदी को समाज एवं संस्कृति की पोषक बताते हुए कहा—
“समाज संस्कृति की हूं मैं पोषक,
सदा सभ्यता सिखाती हूं।
हर एक युग धर्म चरित्रों में,
मैं मानवता पढ़ाती हूं।
क्योंकि मैं हिंदी हूं,
मैं हिंदी हूं, मैं हिंदी हूं।”
उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को हिंदी भाषा की समृद्ध परंपरा और सामाजिक भूमिका पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। कविता पूरी होते ही सभागार तालियों से गूंज उठा।
पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश
कवि राम लखन पटेल ने पर्यावरण संरक्षण पर अपनी कविता प्रस्तुत करते हुए पेड़-पौधे लगाने और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति से जुड़ा है, इसलिए पर्यावरण की सुरक्षा प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
उन्होंने अपनी रचना में कहा—
“ताकि जिंदा रहे कल भी पर्यावरण,
पेड़-पौधे जमीन पर लगाया करो।
जब तलक है प्रकृति, तब तलक ही हैं हम,
बात सच है यह मत भूल जाया करो।”
उनकी कविता ने वर्तमान समय में बढ़ते प्रदूषण, घटती हरियाली और बिगड़ते पर्यावरण संतुलन की ओर श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया। उपस्थित लोगों ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी इस रचना की सराहना की।
प्रेम और देशभक्ति के भावों ने किया प्रभावित
संजय जैन ‘सत्यम’ ने प्रेम विषय पर अपनी रचना प्रस्तुत की। उन्होंने प्रेम को केवल व्यक्तिगत भावना तक सीमित नहीं रखते हुए उसे त्याग, साधना, राष्ट्रप्रेम और महापुरुषों के समर्पण से जोड़ा। उनकी पंक्तियों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया—
“प्रेम आंसुओं में बहे,
भावनाओं में है कहे।
प्रेम तो उपासना है,
मन का यह सम्मान है।
प्रेम है सुभाष जी का,
प्रेम है आजाद जी का।
प्रेम है पटेल जी का,
देश की जो शान है।”
उनकी प्रस्तुति में प्रेम के आध्यात्मिक और राष्ट्रीय स्वरूप की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिली।
णमोकार महामंत्र की महिमा का गुणगान
इंजीनियर कवि अतिवीर जैन ‘पराग’ ने जैन धर्म के मूल णमोकार महामंत्र की महिमा पर अपनी विशेष रचना प्रस्तुत की। उन्होंने महामंत्र की संरचना और उसके आध्यात्मिक महत्व को काव्यात्मक स्वरूप देते हुए कहा—
“अट्ठावन मात्राएं, पैंतीस अक्षर,
पांच पदों का सार है।
णमोकार मंत्र नित जपने से,
खुलता मोक्ष का द्वार है।
यह महामंत्र णमोकार है,
यह महामंत्र णमोकार है।”
रचना के माध्यम से उन्होंने बताया कि णमोकार महामंत्र किसी व्यक्ति विशेष की आराधना नहीं, बल्कि अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधुओं के गुणों को नमन करने वाला विश्वकल्याणकारी मंत्र है।
देर रात तक चला साहित्यिक आयोजन
कार्यक्रम का संयुक्त संचालन अतिवीर जैन ‘पराग’ और संजय जैन ‘सत्यम’ ने किया। आयोजन को सफल बनाने में मंगल जैन, विपिन जैन और चेतना जैन का विशेष सहयोग रहा। कवि सम्मेलन में प्रवीण जैन, जितेंद्र जैन, श्रीपाल जैन, सुनीता जैन, मधु जैन, प्रीति जैन, मंजू जैन, महेंद्र रस्तोगी, विमल कांत कौशिक, शीलवर्धन, विनोद जैन, यशपाल सिंह जांगिड़, हेमचंद जैन, नवीन जैन, राजीव जैन और देवेंद्र जैन सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
आयोजकों ने कहा कि पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि, संयम और सदाचार का संदेश देता है। ऐसे साहित्यिक आयोजन धर्म, संस्कृति एवं सामाजिक चेतना को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
