—Advertisement—

सोशल मीडिया पर जातिगत अपमान भी एससी-एसटी एक्ट के दायरे में आ सकता है: कलकत्ता हाईकोर्ट

Author Picture
Published On: 30 September 2026

—Advertisement—

सोशल मीडिया पर जातिगत अपमान भी एससी-एसटी एक्ट के दायरे में आ सकता है: कलकत्ता हाईकोर्ट

कोलकाता। कलकत्ता हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर जातिसूचक गाली और अपमानजनक टिप्पणियों से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में इस्तेमाल ‘पब्लिक व्यू’ की अवधारणा केवल भौतिक स्थानों तक सीमित नहीं है। यह डिजिटल माध्यम तक भी विस्तारित हो सकती है। इसलिए सोशल मीडिया पर जातिगत अपमान से संबंधित मामले में कानून की आवश्यक शर्तें पूरी होने पर एससी-एसटी एक्ट लागू हो सकता है।

फेसबुक पर अपमानजनक टिप्पणियों की शिकायत

मामला कोलकाता के बेहाला निवासी की शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि फेसबुक पर दो लोगों ने उसकी जाति, धर्म और परिवार को निशाना बनाते हुए अपमानजनक टिप्पणियां की थीं। पुलिस ने जांच के दौरान स्क्रीनशॉट और डिजिटल लिंक जुटाए तथा गवाहों के बयान भी दर्ज किए।

हालांकि, बाद में पुलिस ने संबंधित सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की पहचान नहीं हो पाने की बात कहते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी। जांचकर्ताओं के अनुसार, साइबर इकाई के माध्यम से फेसबुक से जानकारी मांगी गई थी, लेकिन आवश्यक उपयोगकर्ता विवरण नहीं मिला। शिकायतकर्ता ने मामला बंद करने के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने आगे जांच करने को कहा

न्यायमूर्ति उदय कुमार की एकल पीठ ने मामले में आगे जांच का निर्देश दिया। अदालत ने सोशल मीडिया कंपनी से जानकारी नहीं मिलने को जांच समाप्त करने का पर्याप्त आधार नहीं माना। कोर्ट ने विशेषज्ञ साइबर जांच और तकनीकी तरीकों का उपयोग करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक कथित आपराधिक घटना का मूल्यांकन उसके अपने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। शिकायतकर्ता के दूसरे मामलों का होना इस शिकायत की जांच समाप्त करने का आधार नहीं बनना चाहिए। आदेश का परिणाम आरोपों की दोबारा जांच है; इसे संबंधित लोगों की दोषसिद्धि नहीं समझा जाना चाहिए।

क्या है ‘पब्लिक व्यू’ का अर्थ?

इस मामले का मुख्य प्रश्न यह था कि डिजिटल मंच पर की गई टिप्पणी कानून की ‘पब्लिक व्यू’ शर्त के अंतर्गत आ सकती है या नहीं। अदालत ने माना कि सार्वजनिक रूप से देखी जा सकने वाली सामग्री के संदर्भ में डिजिटल माध्यम भी प्रासंगिक है। केवल टिप्पणी इंटरनेट पर किए जाने के कारण उसे कानून के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।

‘पब्लिक व्यू’ को केवल ‘सार्वजनिक स्थान’ का पर्याय मानना भी सही नहीं होगा। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कथित टिप्पणी किन परिस्थितियों में की गई और क्या उसे जनता के सदस्य देख या सुन सकते थे। सोशल मीडिया के मामलों में सामग्री की उपलब्धता और दर्शकों तक उसकी पहुंच जैसे तथ्य महत्वपूर्ण होंगे।

संबंधित धाराओं में क्या प्रावधान हैं?

एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) सार्वजनिक दृष्टि में अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य को अपमानित करने की नीयत से जानबूझकर अपमान या धमकी देने से संबंधित है। धारा 3(1)(s) सार्वजनिक दृष्टि में ऐसे सदस्य को जाति के नाम से गाली देने का प्रावधान करती है।

इन प्रावधानों के अंतर्गत आरोपी का अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य न होना भी आवश्यक शर्त है। इसलिए केवल किसी टिप्पणी में जाति का उल्लेख होने से अपराध स्वतः स्थापित नहीं होता। संबंधित धारा की सभी आवश्यक शर्तों और मामले के साक्ष्यों की जांच करनी होगी।

नया कानून नहीं, मौजूदा प्रावधान की व्याख्या

हाईकोर्ट की टिप्पणी को सोशल मीडिया के लिए नया कानून लागू होने की घोषणा नहीं समझना चाहिए। यह मौजूदा अधिनियम की डिजिटल परिस्थितियों में व्याख्या से संबंधित है। सामान्य आलोचना, व्यक्तिगत विवाद और जातिगत अपमान के बीच अंतर मामले के तथ्यों से निर्धारित होगा।

यह फैसला ऑनलाइन व्यवहार की जवाबदेही और डिजिटल शिकायतों की प्रभावी जांच के महत्व को रेखांकित करता है। किसी पोस्ट पर कार्रवाई और दोषसिद्धि अलग चरण हैं। अंतिम निर्णय सामग्री, संदर्भ, सार्वजनिक पहुंच, संबंधित व्यक्तियों की स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।

Related News
Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp