बस किराया बढ़ने से यात्रियों ने बनाई दूरी, भोपाल-सागर रूट की बसों में घट रही भीड़
त्योहारों से पहले बाजारों में बढ़ी रौनक, लेकिन यात्री बसों में अपेक्षित भीड़ नहीं; निजी वाहनों की ओर बढ़ा रुझान, बस संचालक भी खर्च को लेकर चिंतित
संवाददाता: वैभव जैन मस्ताना।
महंगाई के बीच यात्री बसों के किराए में हुई बढ़ोतरी का असर अब यात्रियों की जेब और सार्वजनिक परिवहन पर भी दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। सिलवानी से भोपाल और सागर सहित विभिन्न शहरों के लिए संचालित होने वाली कई यात्री बसों में पहले की तुलना में यात्रियों की संख्या कम दिखाई दे रही है। स्थानीय यात्रियों और बस संचालकों का कहना है कि किराया बढ़ने के बाद लोग गैर-जरूरी यात्राएं टाल रहे हैं और जरूरी होने पर निजी दोपहिया या अन्य वाहनों का इस्तेमाल अधिक कर रहे हैं।
त्योहारी सीजन नजदीक आने के कारण सिलवानी के बाजारों में गतिविधियां बढ़ने लगी हैं। दुकानों और बाजारों में खरीदारी के लिए लोग पहुंच रहे हैं, लेकिन इसका वैसा असर यात्री बसों में नजर नहीं आ रहा है जैसा सामान्यतः त्योहारों के आसपास देखने को मिलता है। बस संचालकों का दावा है कि कई फेरों में पर्याप्त यात्री नहीं मिलने के कारण परिचालन खर्च निकालना भी चुनौती बन रहा है।
भोपाल-सागर जाने वाली बसों में यात्रियों की संख्या कम
सिलवानी से प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग भोपाल और सागर की ओर आवागमन करते हैं। इनमें नौकरीपेशा लोग, विद्यार्थी, व्यापारी, मजदूर, मरीज और अन्य यात्री शामिल रहते हैं। आम दिनों के साथ त्योहारों के समय इन मार्गों पर यात्रियों की संख्या बढ़ने की उम्मीद रहती है।
हालांकि स्थानीय स्तर पर बस संचालकों और यात्रियों का कहना है कि इस बार स्थिति अलग दिखाई दे रही है। कई बसों में सीटें खाली रह रही हैं। खासकर ऐसे यात्री जो छोटे-मोटे काम के लिए दूसरे शहर जाते थे, वे यात्रा के खर्च को देखते हुए अपने कार्यक्रम टालने की कोशिश कर रहे हैं।
यात्रियों का कहना है कि आने-जाने का किराया जोड़ने के बाद एक व्यक्ति पर ही अच्छी-खासी राशि खर्च हो जाती है। यदि परिवार के कई सदस्यों को साथ यात्रा करनी हो तो यह खर्च और अधिक बढ़ जाता है।
किराया बढ़ने से घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव
पहले से रोजमर्रा की आवश्यकताओं पर बढ़ते खर्च के बीच परिवहन का खर्च भी आम परिवारों के लिए चिंता का विषय बन रहा है। गरीब, मजदूर और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों का कहना है कि उनकी आय सीमित है और उसमें भोजन, बच्चों की पढ़ाई, बिजली, स्वास्थ्य और दूसरी आवश्यकताओं का खर्च पूरा करना पड़ता है।
ऐसे में बस किराए में वृद्धि होने पर यात्रा के लिए अलग से अधिक राशि निकालना मुश्किल हो जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार पहले जहां छोटी दूरी की यात्रा करने से पहले ज्यादा विचार नहीं करना पड़ता था, वहीं अब लोग खर्च का हिसाब लगाने के बाद ही यात्रा का निर्णय कर रहे हैं।
कई लोगों का कहना है कि जरूरी काम, इलाज, शिक्षा या पारिवारिक आवश्यकता होने पर यात्रा करना मजबूरी है, लेकिन सामान्य काम या घूमने के लिए होने वाली यात्राओं में कटौती की जा रही है।
निजी वाहनों का इस्तेमाल बढ़ने का दावा
बस किराए में बढ़ोतरी के बाद निजी वाहनों के उपयोग का रुझान भी बढ़ने की बात सामने आ रही है। खासकर आसपास के क्षेत्रों या अपेक्षाकृत कम दूरी की यात्रा के लिए लोग मोटरसाइकिल और अन्य निजी साधनों का इस्तेमाल करना बेहतर समझ रहे हैं।
यात्रियों का तर्क है कि यदि एक ही परिवार के दो या तीन लोगों को साथ जाना हो तो बस का कुल किराया कई बार निजी वाहन के ईंधन खर्च के मुकाबले अधिक महसूस होता है। इसी कारण लोग सुविधानुसार निजी वाहन से सफर करना पसंद कर रहे हैं।
हालांकि लंबी दूरी की यात्रा और खराब मौसम के दौरान दोपहिया वाहनों का उपयोग सुरक्षा के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसके बावजूद खर्च बचाने की कोशिश में कई लोग निजी साधनों की ओर रुख कर रहे हैं।
यात्रियों की कमी से बस संचालक भी परेशान
यात्रियों की संख्या कम होने का असर केवल आम लोगों पर नहीं बल्कि बस व्यवसाय से जुड़े लोगों पर भी पड़ रहा है। बस संचालकों का कहना है कि एक बस को नियमित रूप से चलाने के लिए ईंधन, चालक-परिचालक का वेतन, रखरखाव, टैक्स और अन्य खर्च उठाने पड़ते हैं।
यदि किसी फेरे में पर्याप्त यात्री नहीं मिलते हैं तो बस संचालन की लागत निकालना मुश्किल हो जाता है। संचालकों के अनुसार डीजल और रखरखाव से जुड़े खर्च पहले से अधिक हैं। ऐसे में कम यात्रियों के साथ बस चलाना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो रहा है।
बस मालिकों का कहना है कि किराए में बढ़ोतरी के बावजूद यदि यात्री संख्या कम हो जाती है तो बढ़े हुए किराए का लाभ भी नहीं मिल पाता। उनकी चिंता है कि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो नियमित सेवाओं को संचालित करना कठिन हो सकता है।
त्योहारों में भी यात्रा से पहले बजट का हिसाब
त्योहारों के दौरान आमतौर पर अपने गांव या रिश्तेदारों के यहां आने-जाने वाले यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है। नौकरी और पढ़ाई के लिए बाहर रहने वाले लोग भी त्योहार मनाने घर लौटते हैं। इस कारण बसों में सामान्य दिनों के मुकाबले अधिक भीड़ देखने को मिलती रही है।
इस बार स्थानीय लोगों का कहना है कि महंगाई के कारण त्योहारों की खरीदारी और यात्रा—दोनों का खर्च एक साथ संभालना मुश्किल हो रहा है। गरीब और मजदूर परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीमित आय में त्योहार की आवश्यकताओं और परिवहन खर्च के बीच संतुलन बनाने की है।
लोगों का कहना है कि त्योहार पर कपड़े, मिठाई, पूजा सामग्री और अन्य घरेलू सामान खरीदना होता है। यदि परिवार को दूसरे शहर भी जाना हो तो यात्रा खर्च बजट पर अतिरिक्त बोझ डालता है।
बाजारों में रौनक, लेकिन परिवहन क्षेत्र में वैसा उत्साह नहीं
त्योहारी सीजन के चलते सिलवानी के बाजारों में खरीदारी का माहौल बनने लगा है। दुकानदार भी त्योहारों को लेकर तैयारियां कर रहे हैं। इसके विपरीत बस स्टैंड और यात्री बसों में अपेक्षित भीड़ नहीं दिखाई देने का दावा किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि महंगाई ने उनकी प्राथमिकताएं बदल दी हैं। अब लोग सबसे पहले आवश्यक सामान पर खर्च कर रहे हैं और उसके बाद ही यात्रा या अन्य जरूरतों के लिए बजट तय कर रहे हैं।
यात्रियों और बस संचालकों को राहत की उम्मीद
यात्रियों का कहना है कि सार्वजनिक परिवहन आम आदमी की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल है। विशेषकर ऐसे लोगों के लिए बस सेवा जरूरी है जिनके पास अपना वाहन नहीं है। इसलिए परिवहन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि गरीब और मध्यम वर्ग भी आसानी से यात्रा कर सके।
वहीं बस संचालकों की चिंता है कि संचालन लागत लगातार बढ़ने और यात्रियों की संख्या घटने से व्यवसाय प्रभावित हो सकता है। ऐसे में यात्रियों और बस संचालकों दोनों की नजर सरकार की परिवहन और महंगाई से जुड़ी नीतियों पर है। स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि सार्वजनिक परिवहन को किफायती बनाए रखने के साथ बस संचालन की बढ़ती लागत का भी व्यावहारिक समाधान निकाला जाए, ताकि यात्रियों को सुलभ परिवहन मिलता रहे और बस सेवाओं का नियमित संचालन भी प्रभावित न हो।
