भाजपा में जैन समाज का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला? जैन राजनैतिक चेतना मंच के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष जैन काला और प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने नई राष्ट्रीय टीम में जैन समाज की भागीदारी पर गंभीर सवाल उठाए।
भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में जैन समाज का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं? जैन समाज में बढ़ी निराशा, उठे गंभीर सवाल
प्रचारक: राजेश जैन दद्दू
इंदौर। भाजपा में जैन समाज का प्रतिनिधित्व एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। देशहित में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले जैन समाज की राजनीतिक भागीदारी को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी द्वारा घोषित नई राष्ट्रीय टीम में जैन समाज को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलना देशभर के जैन समाज के लिए निराशाजनक एवं विचारणीय विषय है।जैन राजनैतिक चेतना मंच के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष जैन काला और मंच के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने जैन समाज की राजनीतिक भागीदारी को लेकर यह महत्वपूर्ण विषय उठाया है। राजेश जैन दद्दू ने कहा कि जैन समाज संख्या की दृष्टि से भले ही छोटा हो, लेकिन देश के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं सेवा क्षेत्र में उसका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक है।
भाजपा में जैन समाज का प्रतिनिधित्व क्यों बना बड़ा सवाल?
भारतीय जनता पार्टी की नई राष्ट्रीय संगठनात्मक टीम सामने आने के बाद जैन समाज में यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में समाज को उसकी योग्यता, योगदान और राजनीतिक सहभागिता के अनुरूप स्थान क्यों नहीं मिल पाया?यह प्रश्न केवल पद प्राप्त करने का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्थक भागीदारी का है। जैन समाज लंबे समय से सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़ा रहा है। ऐसे में भाजपा में जैन समाज का प्रतिनिधित्व कम होने का विषय समाज के बीच स्वाभाविक रूप से चर्चा का कारण बन रहा है।
देश के आर्थिक विकास में जैन समाज का महत्वपूर्ण योगदान
जैन समाज संख्या की दृष्टि से भले ही देश की आबादी का छोटा हिस्सा हो, लेकिन व्यापार, उद्योग और आर्थिक गतिविधियों में समाज की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है।देश के कर राजस्व में योगदान देने वाले व्यापार एवं उद्योग जगत में जैन समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। छोटे कारोबार से लेकर बड़े उद्योगों तक जैन समाज के उद्यमियों ने रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में योगदान दिया है।देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ जैन समाज ने समाजसेवा की परंपरा को भी निरंतर आगे बढ़ाया है। यही कारण है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर उठने वाला प्रश्न केवल संख्या पर आधारित नहीं, बल्कि योगदान और सहभागिता से भी जुड़ा हुआ है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवदया में जैन समाज की बड़ी भूमिका
जैन समाज द्वारा देशभर में बड़ी संख्या में शैक्षणिक संस्थाएं, चिकित्सालय, गौशालाएं, जीवदया केंद्र तथा विभिन्न सामाजिक एवं जनकल्याणकारी संस्थाएं संचालित की जा रही हैं।अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और जीवदया जैसे सिद्धांतों पर चलने वाला जैन समाज सदैव राष्ट्रहित एवं समाजसेवा में आगे रहा है। देश के विकास में आर्थिक योगदान के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, गौसेवा, जीवदया, पर्यावरण संरक्षण और मानव सेवा के क्षेत्र में भी जैन समाज की भूमिका उल्लेखनीय रही है।समाज का मानना है कि राष्ट्र निर्माण के इतने क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले समुदाय की आवाज राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में भी प्रभावी ढंग से सुनी जानी चाहिए।
भाजपा में जैन समाज का प्रतिनिधित्व उचित क्यों नहीं?
ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इतने महत्वपूर्ण सामाजिक एवं राष्ट्रीय योगदान के बावजूद भाजपा की राष्ट्रीय संगठनात्मक टीम में जैन समाज को उचित प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला?यह प्रश्न केवल नई राष्ट्रीय टीम तक सीमित नहीं है। जैन समाज लंबे समय से यह अनुभव करता रहा है कि राष्ट्रीय राजनीतिक संगठनों, विभिन्न आयोगों एवं महत्वपूर्ण संस्थाओं तथा संसद और विधानसभाओं में उसकी जनसंख्या, योग्यता, सामाजिक योगदान और राजनीतिक सहभागिता के अनुरूप प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम रहा है।यही कारण है कि भाजपा में जैन समाज का प्रतिनिधित्व अब समाज के राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के बीच गंभीर विमर्श का विषय बनता जा रहा है।
भाजपा से लंबे समय से जुड़ा रहा है जैन समाज
विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी के संदर्भ में यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जैन समाज का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से भाजपा की विचारधारा से जुड़ा रहा है तथा चुनावों में भी पार्टी को अपना महत्वपूर्ण राजनीतिक समर्थन देता रहा है।समाज के अनेक लोग स्थानीय स्तर से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी एवं सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। इसके बावजूद जब राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक जिम्मेदारियों का वितरण होता है, तो समाज को पर्याप्त अवसर नहीं मिलने की भावना सामने आती है।इसलिए समाज की अपेक्षा है कि भविष्य में संगठनात्मक नियुक्तियों और राजनीतिक अवसरों के दौरान योग्य एवं सक्रिय जैन प्रतिनिधियों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए।
कृपा नहीं, समान अवसर चाहता है जैन समाज
समाज की अपेक्षा किसी प्रकार की राजनीतिक कृपा या विशेषाधिकार की नहीं है। अपेक्षा केवल इतनी है कि योग्य, सक्रिय और समाजहित में कार्य करने वाले जैन समाज के प्रतिनिधियों को राष्ट्रीय संगठन, नीति-निर्माण और लोकतांत्रिक संस्थाओं में उनकी योग्यता एवं योगदान के अनुरूप उचित अवसर प्रदान किया जाए।लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल संख्या का विषय नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति विभिन्न समाजों और वर्गों की सार्थक भागीदारी में निहित है।यदि किसी समाज का आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्र निर्माण में योगदान महत्वपूर्ण है, तो उसकी आवाज भी राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी रूप से सुनी जानी चाहिए।
किसी दल या व्यक्ति के खिलाफ आरोप नहीं
यह विषय किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक दल के विरुद्ध आरोप के रूप में नहीं उठाया गया है। यह जैन समाज की लोकतांत्रिक अपेक्षाओं और भावनाओं को राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का एक सकारात्मक प्रयास है।समाज चाहता है कि राजनीतिक दल उसकी बात सुनें और योग्य नेतृत्व को आगे आने का अवसर दें। इससे न केवल जैन समाज की राजनीतिक भागीदारी मजबूत होगी, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अलग-अलग समाजों की सहभागिता भी बढ़ेगी।
जैन युवाओं को राजनीति में आगे आने की जरूरत
अब समय आ गया है कि जैन समाज भी अपनी राजनीतिक चेतना को मजबूत करे। समाज के योग्य एवं सक्रिय युवाओं, महिलाओं, समाजसेवियों, व्यापारियों और विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे लोगों को राजनीति और सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।जैन समाज को सभी राजनीतिक दलों के समक्ष अपनी सम्मानजनक एवं न्यायसंगत राजनीतिक भागीदारी का विषय मजबूती से रखना होगा।केवल चुनाव के समय मतदाता के रूप में भूमिका निभाना पर्याप्त नहीं है। नीति निर्माण, संगठनात्मक निर्णय और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भी समाज की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
भाजपा में जैन समाज का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की अपेक्षा
जैन समाज का कहना है कि उसकी मांग स्पष्ट है—हमें केवल मतदाता के रूप में नहीं,
निर्णय प्रक्रिया में भागीदार के रूप में भी देखा जाए।
हमें कृपा नहीं, समान अवसर चाहिए।
हमें उपेक्षा नहीं, सम्मानजनक प्रतिनिधित्व चाहिए।
राष्ट्रीय राजनीति में जैन समाज की आवाज जितनी मजबूत होगी, लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज की भागीदारी उतनी ही प्रभावी होगी। समाज को उम्मीद है कि भाजपा सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दल भविष्य में जैन समाज के योग्य और सक्रिय प्रतिनिधियों को संगठन, संसद, विधानसभाओं, आयोगों तथा अन्य महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्थाओं में उचित अवसर देने पर गंभीरता से विचार करेंगे।
