Bhopal को मिलेगा 35.611 किमी लंबा वेस्टर्न बायपास, लेकिन कटेंगे 3200 बड़े पेड़
विकास परियोजना के साथ पर्यावरणीय चिंता भी गहराई
भोपाल, 16 मई 2026।
राजधानी Bhopal में प्रस्तावित 35.611 किलोमीटर लंबे वेस्टर्न बायपास प्रोजेक्ट को लेकर जहां एक ओर विकास की उम्मीदें बढ़ी हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणीय चिंता भी तेजी से सामने आ रही है। इस परियोजना के लिए लगभग 3200 बड़े पेड़ों के कटने की संभावना जताई जा रही है, जिससे स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ गई है।
45 हेक्टेयर वन क्षेत्र पर पड़ेगा असर
जानकारी के अनुसार वेस्टर्न बायपास परियोजना के लिए करीब 45 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होने की संभावना है। इस दौरान लगभग 10 हजार छोटे पेड़ और झाड़ियां हटाई जाएंगी, जिससे क्षेत्र की प्राकृतिक हरियाली में बड़ी कमी आने की आशंका जताई जा रही है। यह पूरा इलाका जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहां कई प्रकार की वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं। इसके अलावा इस प्रोजेक्ट के कारण अरेरा हिल्स क्षेत्र की लगभग 2000 वर्षों पुरानी हरियाली पर भी प्रभाव पड़ने की चर्चा पहले से ही जारी है। इसी वजह से स्थानीय स्तर पर विरोध और विवाद की स्थिति बनी हुई है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की परियोजनाओं में वन क्षेत्र और हरित आवरण का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए, ताकि विकास कार्यों के साथ-साथ प्राकृतिक संतुलन भी बना रहे और भविष्य में पर्यावरणीय संकट की स्थिति उत्पन्न न हो सके।
यह बायपास भानपुर केकड़िया से शुरू होकर फंदा कलां तक जाएगा। यह प्रोजेक्ट भोपाल देवास मार्ग (स्टेट हाईवे-28) को जोड़ते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग 45 और 46 से इंदौर की ओर जाने वाले भारी वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रदान करेगा।
इससे शहर के भीतर ट्रैफिक का दबाव कम होने की उम्मीद है, जिससे यातायात व्यवस्था अधिक सुगम हो सकेगी।
वन क्षेत्र में वायडक्ट का भी प्रावधान
परियोजना के तहत वन क्षेत्र में लगभग 5 किलोमीटर लंबाई में मार्ग प्रस्तावित है। इस हिस्से में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए सात स्थानों पर 610 मीटर लंबा वायडक्ट बनाया जाएगा, ताकि वन्य जीव बिना बाधा के आवाजाही कर सकें।
यह प्रावधान पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञ इसे पर्याप्त नहीं मान रहे हैं।
ग्रामवार भूमि अधिग्रहण और प्रभाव
परियोजना के तहत कई गांवों में निजी और सरकारी भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। इनमें भानपुर केकड़िया, झागरिया खुर्द, फंदा कलां, फंदा खुर्द, सरवर, समसपुरा, पिपलिया धाकड़, नरेला, मूंडला, आंवला, हताईखेड़ी और जाटखेड़ी शामिल हैं।
कई स्थानों पर आवासीय भवनों के साथ-साथ पेड़ों को भी हटाया जाएगा। उदाहरण के लिए नरेला क्षेत्र में 150 पेड़, मूंडला में 70 पेड़, आंवला में 50 पेड़ और हताईखेड़ी में 50 पेड़ प्रभावित होंगे।
जल स्रोत और वेटलैंड पर भी असर
फंदा कलां क्षेत्र में स्थित नालों और जल प्रवाह व्यवस्था को भी प्रभावित होने की संभावना जताई गई है। ये नाले बड़ा तालाब वेटलैंड सिस्टम में जल आपूर्ति का हिस्सा हैं। यहां पुल और कल्वर्ट बनाने की योजना है, लेकिन इससे प्राकृतिक जल प्रवाह प्रभावित होने की आशंका है।
स्थानीय विरोध और शिकायतें
परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध भी तेज हो गया है। अब तक करीब 40 शिकायतें सरकार तक पहुंच चुकी हैं। स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि परियोजना का डिजाइन वन और कैचमेंट क्षेत्रों से होकर नहीं गुजरना चाहिए।
पर्यावरण कार्यकर्ता राशीदनूर खान ने कहा कि “पश्चिम बायपास का बड़ा हिस्सा वन और कैचमेंट क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है, जिसे पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए। इसके खिलाफ हमने शिकायत की है और जरूरत पड़ने पर मामला कोर्ट में भी ले जाएंगे।”
डिजाइन में बदलाव पर विचार
विरोध और बढ़ते दबाव के बीच अब परियोजना के डिजाइन में बदलाव पर विचार किया जा रहा है। सरकार और संबंधित विभाग इस बात की समीक्षा कर रहे हैं कि किस तरह पर्यावरणीय नुकसान को कम किया जा सके और विकास कार्य भी बाधित न हो।
विकास बनाम पर्यावरण की बहस
यह मामला एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस को सामने ला रहा है। जहां एक ओर बायपास परियोजना से शहर में यातायात सुगम होने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में पेड़ों और वन क्षेत्र के नुकसान को लेकर चिंता बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में पर्यावरणीय प्रभाव का गहन अध्ययन और वैकल्पिक मार्गों पर गंभीरता से विचार जरूरी है।
निष्कर्ष
भोपाल का वेस्टर्न बायपास प्रोजेक्ट शहर के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे यातायात व्यवस्था में सुधार होगा और भारी वाहनों को शहर के भीतर प्रवेश किए बिना सुगम मार्ग मिल सकेगा। हालांकि, इस परियोजना से जुड़ी पर्यावरणीय चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं। लगभग 3200 बड़े पेड़ों की कटाई और करीब 45 हेक्टेयर वन क्षेत्र पर पड़ने वाला प्रभाव इसे एक विवादास्पद परियोजना बना रहा है। इसके अलावा कई क्षेत्रों में छोटे पेड़, झाड़ियां और जलस्रोत भी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है, जिससे पर्यावरण संतुलन पर असर पड़ सकता है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार विरोध दर्ज कराया जा रहा है। अब देखना यह होगा कि सरकार विकास की आवश्यकता और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाती है तथा क्या परियोजना के डिजाइन में ऐसे बदलाव किए जाते हैं जिससे प्राकृतिक संसाधनों को कम से कम नुकसान पहुंचे और सतत विकास सुनिश्चित हो सके।
