Bhopal State Museum: गणेश के रंगों में सजा इतिहास, 19वीं शताब्दी की पेंटिंग में दिखता है सिंधिया दरबार
गणेश उत्सव पर राज्य संग्रहालय में नजर आते हैं विघ्नहर्ता के दुर्लभ स्वरूप, प्राचीन प्रतिमाओं और चित्रों में दिखती है भारतीय कला की समृद्ध परंपरा
दैनिक स्वराज वाणी, भोपाल। गणेश उत्सव के दौरान भगवान श्रीगणेश के धार्मिक स्वरूप के साथ उनके ऐतिहासिक और कलात्मक रूपों को समझना हो तो भोपाल का राज्य संग्रहालय एक महत्वपूर्ण स्थान है। यहां संग्रहित प्राचीन प्रतिमाओं और चित्रों में भगवान गणेश अलग-अलग मुद्राओं और स्वरूपों में दिखाई देते हैं। संग्रहालय की दीर्घाओं में गौरी गणेश, सौम्य गणेश, बाल्यकाल में क्रीड़ा करते गणेश, शक्ति के साथ उच्छिष्ट गणेश और सिद्धि के साथ विराजमान गणेश जैसे कई स्वरूपों का प्रदर्शन किया गया है।
संग्रहालय में रखी 19वीं शताब्दी की एक विशेष पेंटिंग में सिंधिया राजदरबार का दृश्य दिखाई देता है। इसमें भगवान गणेश के पूजन के साथ तत्कालीन राजसी वेशभूषा, दरबारी परंपरा और सामाजिक जीवन की झलक मिलती है। यह चित्र धार्मिक आस्था के साथ उस दौर की चित्रकला और सांस्कृतिक परंपराओं को भी दर्शाता है।
पाषाण प्रतिमाओं से पेंटिंग तक दिखते हैं गणेश
राज्य संग्रहालय की विशेषता यह है कि यहां भगवान गणेश केवल पत्थर की प्रतिमाओं में ही नहीं, बल्कि प्राचीन एवं ऐतिहासिक चित्रों में भी नजर आते हैं। अलग-अलग कालखंडों में निर्मित इन कलाकृतियों के माध्यम से यह समझा जा सकता है कि भारतीय कला में गणेश के स्वरूप को समय और क्षेत्र के अनुसार किस प्रकार अभिव्यक्त किया गया।
कुछ प्रतिमाओं में भगवान गणेश शांत और सौम्य मुद्रा में दिखाई देते हैं, जबकि अन्य कलाकृतियों में उनका बाल स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। कहीं वह माता गौरी के साथ हैं तो कहीं सिद्धि और शक्ति के साथ विराजमान दिखाई देते हैं। इन स्वरूपों में धार्मिक प्रतीकों के साथ शिल्पकारों की कल्पनाशीलता और तकनीकी कौशल की झलक भी मिलती है।
19वीं शताब्दी की पेंटिंग में सिंधिया दरबार
संग्रहालय में प्रदर्शित 19वीं शताब्दी की पेंटिंग विशेष आकर्षण का केंद्र है। इसमें सिंधिया राजदरबार से जुड़ा दृश्य चित्रित किया गया है। चित्र में भगवान गणेश की उपस्थिति यह बताती है कि राजघरानों और दरबारों में भी शुभ कार्यों से पहले गणेश पूजन की परंपरा का विशेष महत्व था।
पेंटिंग में दरबारियों की वेशभूषा, बैठने की व्यवस्था, आभूषण, राजसी सजावट और तत्कालीन जीवनशैली की झलक मिलती है। चित्र का प्रत्येक भाग उस समय के सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण को समझने में मदद करता है। कला और इतिहास के विद्यार्थियों के लिए ऐसी पेंटिंग केवल एक धार्मिक चित्र नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह भी महत्वपूर्ण है।
गौरी गणेश का मातृ स्नेह से भरा स्वरूप
गौरी गणेश के स्वरूप में भगवान गणेश को माता पार्वती के साथ दिखाया गया है। यह स्वरूप मां और पुत्र के संबंध, पारिवारिक स्नेह और संरक्षण की भावना को व्यक्त करता है। भारतीय शिल्प परंपरा में गौरी और गणेश का संयुक्त चित्रण शुभता एवं समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
संग्रहालय में मौजूद इस तरह की कलाकृतियां दर्शाती हैं कि प्राचीन कलाकारों ने धार्मिक कथाओं को केवल प्रतिमाओं में नहीं ढाला, बल्कि उनमें मानवीय भावनाओं को भी स्थान दिया। माता-पुत्र के बीच स्नेह, आशीर्वाद और सुरक्षा की भावना इन प्रतिमाओं में स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है।
बाल्यकाल के क्रीड़ारत गणेश भी हैं आकर्षण
भगवान गणेश के बाल्यकाल और क्रीड़ारत स्वरूप वाली कलाकृतियां दर्शकों, विशेषकर बच्चों को आकर्षित करती हैं। इन प्रतिमाओं और चित्रों में गणेश को गंभीर देव स्वरूप के बजाय सरल, सहज और आनंदपूर्ण मुद्रा में प्रस्तुत किया गया है।
बाल गणेश की कलाकृतियों में उनके व्यक्तित्व का चंचल और मनमोहक पक्ष दिखाई देता है। इन स्वरूपों के माध्यम से कलाकारों ने धार्मिक चरित्र को सामान्य जनजीवन और पारिवारिक भावनाओं से जोड़ने का प्रयास किया है।
शक्ति और सिद्धि के साथ गणेश के स्वरूप
संग्रहालय में भगवान गणेश के शक्ति और सिद्धि से जुड़े रूप भी देखे जा सकते हैं। धार्मिक परंपराओं में गणेश को बुद्धि, विवेक, सफलता और समृद्धि का देवता माना गया है। विभिन्न प्रतिमाओं और चित्रों में उनके साथ दिखाई देने वाली आकृतियां इन्हीं आध्यात्मिक और दार्शनिक अवधारणाओं को अभिव्यक्त करती हैं।
उच्छिष्ट गणेश का स्वरूप भी भारतीय तांत्रिक एवं उपासना परंपराओं से जुड़ा माना जाता है। इस प्रकार की प्रतिमा सामान्य रूप से दिखाई देने वाले गणेश स्वरूपों से अलग होती है। इसे देखते समय इसकी ऐतिहासिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।
देवप्रकोष्ठ में रत्नजड़ित स्वरूप
संग्रहालय के देवप्रकोष्ठ में भगवान गणेश के अलंकृत और रत्नजड़ित स्वरूप भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। इन कलाकृतियों में मुकुट, आभूषण और अलंकरण की बारीक कारीगरी दिखाई देती है। इससे तत्कालीन कलाकारों की धातु, पत्थर और सजावटी सामग्री पर पकड़ का अनुमान लगाया जा सकता है।
प्रतिमाओं के आभूषण केवल सजावट का माध्यम नहीं हैं। कई बार मुकुट, आयुध, वाहन और मुद्रा के माध्यम से देव स्वरूप की पहचान और उसका धार्मिक महत्व भी व्यक्त किया जाता है।
कला के साथ मिलता है इतिहास का परिचय
भोपाल का राज्य संग्रहालय मध्य प्रदेश की कला, पुरातत्व और सांस्कृतिक विरासत को समझने का महत्वपूर्ण केंद्र है। श्यामला हिल्स स्थित संग्रहालय की अलग-अलग दीर्घाओं में प्राचीन प्रतिमाएं, पांडुलिपियां, सिक्के, चित्र और अन्य पुरातात्विक वस्तुएं संरक्षित हैं।
संग्रहालय में प्रदर्शित वस्तुएं केवल धार्मिक आस्था से संबंधित नहीं हैं, बल्कि वे अलग-अलग कालखंडों की कला, पहनावे, जीवनशैली और सामाजिक परंपराओं की जानकारी भी देती हैं। गणेश उत्सव के दौरान भगवान गणेश से संबंधित संग्रह को देखने पर श्रद्धालुओं को पूजा और परंपरा के साथ भारतीय इतिहास के कई पहलुओं को जानने का अवसर मिलता है।
विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए खास
गणेश प्रतिमाओं और पेंटिंग्स का यह संग्रह कला एवं इतिहास के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और मूर्तिकला में रुचि रखने वाले लोगों के लिए उपयोगी है। इनके माध्यम से अलग-अलग कालखंडों में प्रचलित शिल्प शैली, प्रतिमा निर्माण की तकनीक और धार्मिक प्रतीकों का अध्ययन किया जा सकता है।
मध्य प्रदेश पर्यटन की जानकारी के अनुसार राज्य के संग्रहालय प्रदेश की कला, संस्कृति और पुरातात्विक विरासत को लोगों से जोड़ने का माध्यम हैं। भोपाल राज्य संग्रहालय सोमवार और शासकीय अवकाश को छोड़कर सामान्यतः दर्शकों के लिए खुला रहता है। भ्रमण से पहले समय और प्रवेश संबंधी जानकारी की पुष्टि करना उचित होगा।
गणेश उत्सव में विरासत से जुड़ने का अवसर
गणेश उत्सव के दौरान लोग घरों और पंडालों में भगवान गणेश की पूजा करते हैं। इसी समय राज्य संग्रहालय की यात्रा श्रद्धालुओं को गणेश के ऐतिहासिक और कलात्मक स्वरूप से परिचित करा सकती है। यहां मौजूद प्रतिमाएं और पेंटिंग्स बताती हैं कि भगवान गणेश की उपासना भारतीय संस्कृति में लंबे समय से कला, परिवार, राजदरबार और सामाजिक जीवन से जुड़ी रही है।
