उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा को शामिल करने पर संवाद, पाठ्यक्रम में समावेश पर जोर
Bhopal। उच्च शिक्षा मंत्रालय, भोपाल द्वारा आईएएस प्रबल सिपाहा की अगुवाई में हिंदू एजुकेशन बोर्ड के तत्वावधान में भारतीय उच्च शिक्षा में हिंदू शिक्षा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा को शामिल करने और मध्यप्रदेश में इसे लागू करने को लेकर संवाद आयोजित किया गया। इसमें उत्तर प्रदेश के आर्थिक सलाहकार मंडल के सदस्य रविकांत मिश्रा, हिंदू एजुकेशन बोर्ड के नचिकेता तिवारी, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सदस्य तथा देश-प्रदेश के विभिन्न महाविद्यालयों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। चर्चा में भारतीय दर्शन, संस्कृति, नैतिक मूल्यों, भाषाओं और ज्ञान परंपराओं को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम से जोड़ने पर विचार-विमर्श किया गया।
भारतीय ज्ञान परंपरा के अकादमिक अध्ययन पर जोर
इस अवसर पर डॉ. भरत शर्मा ने कहा कि हिंदू शिक्षा को केवल धार्मिक शिक्षा के रूप में देखने के बजाय भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा, दर्शन, नैतिक चिंतन, संस्कृति, कला, विज्ञान-दृष्टि और जीवन-मूल्यों के व्यवस्थित एवं अकादमिक अध्ययन के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक ज्ञान के साथ युवाओं को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में ऐसी शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
उन्होंने भारतीय संगीत, नृत्य, नाट्य, मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला और विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं के पीछे निहित दार्शनिक विचारों को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में उचित स्थान देने की बात कही। इससे विद्यार्थियों में भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत के प्रति समझ विकसित हो सकेगी।
वेद, उपनिषद और भारतीय दर्शन के अध्ययन पर चर्चा
रविकांत मिश्रा ने कहा कि भारत की बौद्धिक परंपरा व्यापक रही है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, पुराण, धर्मशास्त्र तथा सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत जैसे दर्शन भारतीय चिंतन की महत्वपूर्ण धरोहर हैं।
उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा में इन विषयों के गंभीर, आलोचनात्मक और तुलनात्मक अध्ययन से विद्यार्थियों को भारत की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक यात्रा को समझने का अवसर मिलेगा। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपराओं को अकादमिक विमर्श से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
नैतिक मूल्यों और चरित्र निर्माण पर बल
नचिकेता तिवारी ने भारतीय परंपरा में निहित नैतिक मूल्यों और चरित्र निर्माण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने सत्य, अहिंसा, संयम, कर्तव्य, सेवा, करुणा, आत्मानुशासन और लोकसंग्रह जैसे मूल्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में इनका आधुनिक संदर्भ में अध्ययन युवाओं के व्यक्तित्व विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व को समझने में सहायक हो सकता है।
उन्होंने कहा कि डिजिटल परिवर्तन, सामाजिक बदलाव और वैश्वीकरण के दौर में विद्यार्थियों के लिए नैतिक चिंतन और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े विषयों का अध्ययन उपयोगी हो सकता है।
भारतीय भाषाओं और साहित्य के संरक्षण की आवश्यकता
आयुक्त, उच्च शिक्षा, मध्यप्रदेश आईएएस प्रबल सिपाहा ने भारतीय भाषाओं एवं साहित्य के संरक्षण और विस्तार पर जोर दिया। उन्होंने संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं के शास्त्रीय साहित्य, व्याकरण, काव्यशास्त्र और दर्शन को उच्च शिक्षा में शामिल करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि इससे नई पीढ़ी भारत की मूल ज्ञान-संपदा और साहित्यिक विरासत से परिचित हो सकेगी। साथ ही, भारतीय भाषाओं के संरक्षण और विकास को भी गति मिल सकती है। उन्होंने योग और आयुर्वेद जैसी भारतीय परंपराओं के ऐतिहासिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन की संभावनाओं पर भी चर्चा की।
समावेशी और आलोचनात्मक शिक्षा की आवश्यकता
बैठक में कहा गया कि भारतीय ज्ञान परंपरा का आधुनिक एवं अकादमिक अध्ययन परंपरा और आधुनिकता के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने का माध्यम बन सकता है। विद्यार्थी भारतीय चिंतन को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र, प्रबंधन, मनोविज्ञान और सामाजिक विज्ञानों के साथ जोड़कर समझने में सक्षम हो सकते हैं।
चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि उच्च शिक्षा में हिंदू शिक्षा का स्वरूप समावेशी, अकादमिक और आलोचनात्मक होना चाहिए। इसका उद्देश्य किसी एक धार्मिक मत को विद्यार्थियों पर थोपना नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक विरासत के अध्ययन, अनुसंधान और विमर्श को बढ़ावा देना होना चाहिए।
भारतीय ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर जोर
संवाद के दौरान भारतीय ज्ञान, दर्शन, संस्कृति, नैतिक चिंतन और बौद्धिक विरासत को उच्च शिक्षा के मुख्य विमर्श से जोड़ने की आवश्यकता पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि ऐसी शिक्षा का उद्देश्य आधुनिक ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सक्षम, सांस्कृतिक विरासत से परिचित तथा सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों को समझने वाले युवाओं के विकास में योगदान देना होना चाहिए।
