भोपाल: 2-3 दिसंबर 1984 की रात मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के लोगों के लिए आम रात की तरह शुरू हुई थी, लेकिन अगले दिन की सुबह कई लोगों के लिए कभी नसीब नहीं हुई। यूनियन कार्बाइड फैक्टरी से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस का रिसाव हुआ, जिससे लगभग 40 टन गैस फैली और शहर में हाहाकार मच गया।
घटना का भयावह मंजर :
फैक्टरी के आसपास गरीब मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हुए। आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ और घबराहट से हजारों लोग वहीं गिर पड़े। सरकारी आंकड़ों में शुरुआती घंटों में 3,000 से अधिक मौतें बताई गईं, लेकिन वास्तविक संख्या बाद में लगभग 22,000 तक पहुंची। वहीं, 1.5 लाख से अधिक लोग स्थायी रूप से प्रभावित हुए।
अस्पतालों में चिकित्सकों के लिए स्थिति पूरी तरह नई थी। केवल पहले दो दिनों में लगभग 50,000 लोगों का इलाज किया गया, लेकिन संसाधन कम पड़ गए।
दशकों बाद भी दर्द जारी :
घटना के कुछ घंटे बाद शहर को सुरक्षित घोषित कर दिया गया था, लेकिन मिट्टी और पानी में प्रदूषण लंबे समय तक बना रहा। कई इलाकों में हैंडपंप का पानी वर्षों तक जहरीला रहा। रिपोर्टों के अनुसार नई पीढ़ी में जन्मजात बीमारियां, कैंसर और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं अभी भी देखी जा रही हैं।

41 साल बीत जाने के बाद भी प्रभावित लोगों का बड़ा हिस्सा सही इलाज, मुआवजा और इंसाफ का इंतजार कर रहा है। यह हादसा सिर्फ एक रात का हादसा नहीं था, बल्कि भोपाल की गलियों में आज भी जख्म छोड़ गया।
पुनर्वास और इलाज की स्थिति :
भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा के अनुसार, पीड़ितों की इलाज और आर्थिक मदद की स्थिति वर्तमान शासन में काफी गिर गई है। 2008 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने विशेष आयोग बनाने की अनुमति दी थी, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे आगे बढ़ने से रोका।
रचना ढींगरा का कहना है कि इसका असर आज भी दिखाई देता है – कई प्रभावित परिवार अब तक सही इलाज और आर्थिक सहारे से वंचित हैं, और अगली पीढ़ी भी इन कठिनाइयों का सामना कर रही है।
