Bhinmal के ऐतिहासिक वराह श्याम मंदिर में देवझूलनी एकादशी पर निभाई गई सदियों पुरानी परंपरा
Bhinmal (मुकेश सोलंकी)। नगर के ऐतिहासिक एवं आस्था के केंद्र वराह श्याम मंदिर में देवझूलनी ग्यारस (जलझूलनी एकादशी) का पर्व श्रद्धा, उल्लास और धार्मिक परंपरा के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर सदियों से चली आ रही परंपरा को कायम रखते हुए नामदेव छीपा समाज द्वारा विशेष रूप से तैयार की गई मनमोहक पोशाक भगवान वराह श्याम को अर्पित कर धारण कराई गई।
नामदेव छीपा समाज की सदियों पुरानी अनूठी परंपरा
मंदिर ट्रस्ट के व्यवस्थापक जगदीश शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि देवझूलनी एकादशी के अवसर पर नामदेव छीपा समाज द्वारा भगवान की विशेष पोशाक बनाकर पहनाने की यह परंपरा अत्यंत प्राचीन और अनूठी है। समाज के कारीगर एवं श्रद्धालु प्रभु के प्रति असीम भक्तिभाव के साथ यह पोशाक तैयार करते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही यह परंपरा समाज की आस्था और समर्पण का प्रतीक है।
शुभ मुहूर्त में भगवान का अलौकिक श्रृंगार
इस वर्ष भी एकादशी के शुभ मुहूर्त में भगवान वराह श्याम का अलौकिक श्रृंगार किया गया और उन्हें नई पोशाक पहनाई गई। नई पोशाक में सजे प्रभु के दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लग गया। पूरे दिन मंदिर परिसर में भक्ति और उत्साह का माहौल बना रहा।

देवझूलनी एकादशी का महत्व
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवझूलनी, जलझूलनी या परिवर्तिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान को झूले में विराजित कर उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व श्रद्धालुओं के लिए आस्था, भक्ति और उल्लास का प्रतीक माना जाता है।
गणमान्य नागरिक एवं श्रद्धालु रहे उपस्थित
इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन के दौरान नामदेव छीपा समाज के भंवरलाल पराडीया, प्रभुराम सोलंकी, जबराराम पराडीया, बगदाराम सोलंकी, मोहनलाल, पारसमल, देवीलाल, रतनलाल, अशोक, भंवरलाल राठौड़, राजेश, विनोद, दिनेश, राजेंद्र, कमलेश, प्रकाश, नारायण सहित समाज के अनेक गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
क्षेत्र की खुशहाली की कामना
सभी श्रद्धालुओं ने भगवान वराह श्याम के दर्शन कर क्षेत्र में खुशहाली और समृद्धि की कामना की। मंदिर
