भींडर Rajasthan में तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी के नाम पर सन्मति धाम का निर्माण
भींडर, Rajasthan – जीवन में सच्ची आस्था हमेशा सही मार्ग दिखाती है। यह सत्य हाल ही में भींडर नगर में स्पष्ट रूप से सामने आया, जब तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी महाराज की तपश्चर्या और उपदेशों से प्रेरित होकर एक अजैन नागरिक ने सन्मति धाम का निर्माण कराया। यह घटना इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सच्ची श्रद्धा किसी जाति, धर्म या जन्म से बंधी नहीं होती, बल्कि यह मनुष्य के अंतःकरण से उपजती है।
तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी महाराज दिगंबर जैन संतो में अपनी कठिन तपश्चर्या और साधना के लिए विख्यात हैं। उनके जीवनकाल में उन्होंने 10,000 से अधिक उपवास किए और अपने अनुयायियों के लिए जीवन के कठिन मार्ग को सरल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। उनके जीवन वृत और तपस्या के गुण सुनकर और पढ़कर भींडर निवासी अनिल स्वर्णकार, जिनका जन्म जैन परिवार में नहीं हुआ, उनके प्रति गहरी श्रद्धा और अनुराग विकसित हुआ।
अनिल स्वर्णकार ने अपने जीवन में तपस्वी सम्राट के आदर्शों को अपनाया और पिछले 15 वर्षों से जैन धर्म का पालन कर रहे हैं। उन्होंने अपने जीवन में आजीवन रात्रि भोजन और मृत्यु भोज का त्याग किया है और तीर्थराज समय शिखर जी की वंदना पूरी श्रद्धा से की है। तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी के जीवन वृत से इतना प्रभावित होकर उन्होंने उदयपुर जिले के भींडर नगर में गुरु मंदिर और विद्यालय भवन का निर्माण कराने का निर्णय लिया।
सन्मति धाम: श्रद्धा और शिक्षा का संगम
भींडर Rajasthan में निर्मित सन्मति धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, सेवा और शिक्षा का प्रतीक भी है। धाम में स्थित विद्यालय भवन में लौकिक शिक्षा के साथ-साथ प्रतिदिन प्रार्थना के समय तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर चालीसा का पाठ किया जाता है। यह प्रक्रिया बच्चों के जीवन में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश करती है और उन्हें जीवन में सही मार्ग अपनाने की प्रेरणा देती है।
विद्यालय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को प्राथमिकता से शिक्षा उपलब्ध कराता है। बच्चों को पाठ्य पुस्तकें, कॉपियाँ, रजिस्टर, टिफिन बॉक्स, बैग, स्वेटर, स्टेशनरी, स्कूल यूनिफॉर्म और जूते सभी निशुल्क प्रदान किए जाते हैं। इसका उद्देश्य है कि गरीब परिवारों के बच्चे भी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर सकें और अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकें। इस पुनीत कार्य में दिगंबर जैन संतो का आशीर्वाद और समाज के दानदाताओं का भी सहयोग प्राप्त हुआ है।
अनिल स्वर्णकार ने पत्रकार पारस जैन “पार्श्वमणि” से बातचीत में बताया कि तपस्वी सम्राट का गुणानुवाद केवल जैन समाज तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह जन-जन में फैलना चाहिए। उन्होंने कहा कि आचार्य सन्मति सागर जी महाराज जैसे महान दिगंबर संत, जिन्होंने 10 वर्षों तक केवल छाछ और मट्ठा लेकर जीवन व्यतीत किया, हमें तप, त्याग और साधना की सच्ची मिसाल देते हैं। उनके जीवन वृत और आचार्य के कठोर साधना मार्ग से प्रेरित होकर उन्होंने यह निर्णय लिया कि उनका गुरु मंदिर और विद्यालय भवन न केवल बच्चों के लिए शिक्षा का केंद्र बने, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बने।

शिलान्यास और निर्माण की प्रगति
सन्मति धाम के निर्माण में चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य सुनील सागर महाराज का मंगल आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। आचार्य सुनील सागर महाराज के शिष्यों के सानिध्य में जनवरी 2022 के तीसरे सप्ताह में गुरु मंदिर और विद्यालय भवन का शिलान्यास किया गया। वर्तमान में गुरु मंदिर और आठ कमरों सहित विद्यालय भवन पूर्ण रूप से तैयार हो चुका है।
स्थानीय नागरिकों और विद्यार्थियों के लिए यह स्थल केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, सेवा और नैतिकता का प्रतीक बन गया है। आने वाले समय में गुरु मंदिर का प्रतिष्ठा समारोह और नवीन विद्यालय भवन का लोकार्पण आयोजित किया जाएगा। यह आयोजन शिक्षा और आस्था के प्रति समर्पित समाज के लिए प्रेरणास्पद सिद्ध होगा।
समाज में प्रेरणा और संदेश
सन्मति धाम का यह निर्माण न केवल जैन धर्म के अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, बल्कि पूरे समाज में सच्ची श्रद्धा और सेवा का संदेश फैलाता है। यह दिखाता है कि यदि मनुष्य अपने जीवन में सत्य, तपस्या और सेवा को अपनाता है, तो वह समाज में स्थायी परिवर्तन ला सकता है।
अनिल स्वर्णकार का कहना है कि यह धाम और विद्यालय न केवल बच्चों को शिक्षा प्रदान करेगा, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों की भी शिक्षा देगा, जिससे वे जीवन में सही मार्ग चुन सकें। यह प्रयास समाज के अन्य व्यक्तियों को भी धर्म और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने की प्रेरणा देगा।
इस प्रकार, भींडर में निर्मित सन्मति धाम और विद्यालय भवन तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी की तपश्चर्या और उपदेशों का प्रत्यक्ष उदाहरण बन गया है। यह स्थल आने वाले वर्षों में न केवल बच्चों के लिए शिक्षा और नैतिक मूल्यों का केंद्र होगा, बल्कि समाज में सच्ची आस्था, सेवा और श्रद्धा का प्रतीक भी बनेगा।
सच्ची श्रद्धा और तपस्या के इस प्रेरणादायक उदाहरण ने यह साबित कर दिया कि जीवन में आस्था हमेशा सही रास्ता दिखाती है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की शक्ति रखती है।
