भारतीय शिक्षा दिवस रामसीन कार्यक्रम में डॉ. वचनाराम काबावत ने शिक्षा में भारतीयता, मातृभाषा, नई शिक्षा नीति और आत्मनिर्भर भारत पर जोर दिया। आदर्श विद्या मंदिर रामसीन में आयोजित कार्यक्रम में प्राचार्य भरत कुमार वैष्णव सहित विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय मूल्यों का संकल्प लिया।
भारतीय शिक्षा दिवस रामसीन: शिक्षा में भारतीयता और मातृभाषा से आत्मनिर्भर भारत का सशक्त निर्माण, डॉ. वचनाराम काबावत का बड़ा संदेश
रिपोर्ट: मुकेश सोलंकी | भीनमाल
भारतीय शिक्षा दिवस रामसीन का आयोजन
भारतीय शिक्षा दिवस रामसीन के अवसर पर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के तत्वावधान में निकटवर्ती रामसीन गांव स्थित आदर्श विद्या मंदिर उच्च माध्यमिक विद्यालय में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यालय के प्राचार्य भरत कुमार वैष्णव ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय भाषा मंच, राजस्थान क्षेत्र के संयोजक डॉ. वचनाराम काबावत उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय शिक्षा प्रणाली, मातृभाषा, भारतीय संस्कृति तथा नई शिक्षा नीति के मूल उद्देश्यों को समाज तक पहुंचाना था। विद्यालय परिसर में विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों की उत्साहपूर्ण सहभागिता देखने को मिली।
डॉ. वचनाराम काबावत ने दिया बड़ा संदेश
मुख्य वक्ता डॉ. वचनाराम काबावत ने कहा कि भारतीय शिक्षा दिवस रामसीन केवल एक आयोजन नहीं बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को उसकी मूल आत्मा से जोड़ने का अभियान है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे प्रभावी साधन है। यदि शिक्षा भारतीय संस्कृति, इतिहास, परंपरा और मूल्यों से जुड़ी होगी तो आने वाली पीढ़ी आत्मनिर्भर, संस्कारवान और राष्ट्रभक्त बनेगी।
“देश का नाम केवल भारत होना चाहिए”
कार्यक्रम में डॉ. काबावत ने “एक देश-एक नाम” की अवधारणा रखते हुए कहा कि देश का नाम केवल भारत होना चाहिए।उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही एक महान सभ्यता, समृद्ध संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है।उन्होंने कहा कि भारत शब्द हमारी पहचान, गौरव और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है।
मातृभाषा और भारतीय शिक्षा की आवश्यकता
अपने संबोधन में डॉ. काबावत ने कहा कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी शिक्षा प्रणाली तय करती है।उन्होंने कहा कि
- मां का कोई विकल्प नहीं।
- मातृभूमि का कोई विकल्प नहीं।
- मातृभाषा का भी कोई विकल्प नहीं।
उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की वाहक होती है। विद्यार्थियों को मातृभाषा में शिक्षा मिलने से उनकी समझ, रचनात्मकता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
भारतीय शिक्षा दिवस रामसीन में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के उद्देश्य
कार्यक्रम में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के प्रमुख उद्देश्यों की भी विस्तार से जानकारी दी गई।
मातृभाषा आधारित शिक्षा
विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना ताकि विषयों की अवधारणा सरल और स्पष्ट हो सके।
समग्र व्यक्तित्व विकास
केवल परीक्षा आधारित शिक्षा नहीं बल्कि चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्यों तथा राष्ट्रभाव का विकास करना।
भारतीय ज्ञान परंपरा
वैदिक गणित, योग, पर्यावरण संरक्षण तथा भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना।
रोजगारोन्मुख शिक्षा
कौशल विकास आधारित शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में योगदान देना।
नई शिक्षा नीति (NEP) पर विशेष जोर
भारतीय शिक्षा दिवस रामसीन कार्यक्रम के दौरान डॉ. काबावत ने नई शिक्षा नीति (NEP) में निहित भारतीय मूल्यों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का आह्वान किया।उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति भारतीय परंपराओं, मातृभाषा, नवाचार और कौशल विकास को एक साथ जोड़ती है। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए तो भारत विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में नई पहचान बना सकता है।
प्राचार्य भरत कुमार वैष्णव का संबोधन
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विद्यालय के प्राचार्य भरत कुमार वैष्णव ने कहा कि भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं है।उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य ऐसे नागरिक तैयार करना है जो संवेदनशील, आत्मनिर्भर, राष्ट्रनिष्ठ तथा समाज सेवा के लिए समर्पित हों।उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों को अपने जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।
विद्यार्थियों ने लिया राष्ट्रीय मूल्यों का संकल्प
कार्यक्रम के समापन अवसर पर विद्यालय के छात्र-छात्राओं को भारतीय संस्कृति, मातृभाषा के सम्मान तथा राष्ट्रीय मूल्यों को जीवन में अपनाने का संकल्प दिलाया गया।इस अवसर पर विद्यालय का समस्त स्टाफ, शिक्षक-शिक्षिकाएं, विद्यार्थी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
निष्कर्ष
भारतीय शिक्षा दिवस रामसीन का यह आयोजन भारतीय शिक्षा व्यवस्था, मातृभाषा और राष्ट्रीय मूल्यों को समाज तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास रहा। मुख्य वक्ता डॉ. वचनाराम काबावत ने शिक्षा को भारतीय संस्कृति से जोड़ने, मातृभाषा को बढ़ावा देने और नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर देते हुए आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का आह्वान किया। वहीं प्राचार्य भरत कुमार वैष्णव ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम बताया। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों द्वारा राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण का संकल्प लिया गया।

