Bhagirathpura ने फिर कुरेदे इंदौर के पुराने जख्म, पानी के ज़रिए लौटी अदृश्य त्रासदी
Indore के Bhagirathpura इलाके में दूषित पानी से हुई मौतों ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। देश के सबसे साफ शहर के रूप में पहचान बना चुके इंदौर के लिए यह सिर्फ एक स्थानीय हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की उस लापरवाही की याद है, जिसने तीन दशक पहले भी शहर को गहरे जख्म दिए थे। फर्क सिर्फ इतना है कि तब सच्चाई सामने आने में वक्त लगा था, और आज जब आंकड़े रोज़ सामने आ रहे हैं, तब भी जवाब कई सवालों से बचता नजर आ रहा है।
Bhagirathpura की गलियों में पसरा डर, अस्पतालों में भरे वार्ड और श्मशानों तक पहुंचती खबरें, इंदौर के बुजुर्गों को उस भयावह दौर में ले जा रही हैं, जब सुभाष चौक इलाके की पानी की टंकी में एक इंसानी लाश सड़ती रही थी और हजारों लोग उसी पानी को पीते रहे थे।
जब इंदौर ने पीया था “लाश का पानी”
करीब 30 साल पहले पश्चिम इंदौर के सुभाष चौक क्षेत्र में जो हुआ, वह आज भी शहर के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। हफ्तों तक हजारों घरों में जिस टंकी से पानी सप्लाई होता रहा, सफाई के दौरान उसी टंकी के भीतर एक इंसानी कंकाल मिला था।
उस समय लोग लगातार बीमार पड़ रहे थे। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही थी, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि बीमारी की जड़ पानी की टंकी के अंदर छिपी है। जब नलों से बदबू आने लगी और लोगों का शक गहराया, तब टंकी खोली गई और सच्चाई सामने आई—एक ऐसी सच्चाई जिसने पूरे शहर की रूह कंपा दी।
यह घटना सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं थी, बल्कि मानवता और प्रशासन—दोनों के लिए शर्मनाक थी। उस दौर में इंदौर नगर निगम पर कांग्रेस का शासन था और मधुकर वर्मा महापौर थे। बीजेपी के वरिष्ठ नेता सत्यनारायण सत्तन बताते हैं कि इस एक घटना ने शहर की राजनीति की दिशा बदल दी थी और इसके बाद वर्षों तक कांग्रेस इंदौर में सत्ता में वापसी नहीं कर सकी।
Bhagirathpura : इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
आज वही इंदौर एक बार फिर पानी के ज़रिए फैली बीमारी और मौतों से जूझ रहा है। भागीरथपुरा इलाके में सीवर मिला पीने का पानी डायरिया और गंभीर संक्रमण का कारण बन गया है।
ग्राउंड जीरो से सामने आ रहे आंकड़े डराने वाले हैं। प्रशासन के अनुसार अब तक:
- 398 मरीजों को अस्पतालों में भर्ती किया गया
- इनमें से 256 मरीज इलाज के बाद डिस्चार्ज हो चुके हैं
- फिलहाल 142 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं
- 11 मरीज ICU में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं
अब तक प्रशासन ने 6 मौतों की आधिकारिक पुष्टि की है। हालांकि इस आंकड़े को लेकर भी विवाद है। इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने मृतकों की संख्या 10 बताई है, जबकि स्थानीय लोगों का दावा है कि छह महीने के बच्चे सहित 16 लोगों की मौत हो चुकी है।
9 हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग
संक्रमण की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने भागीरथपुरा में बड़े पैमाने पर सर्वे और स्क्रीनिंग अभियान चलाया है। अधिकारियों के मुताबिक:
- 2,354 घरों
- 9,416 लोगों
की जांच की जा चुकी है। इस दौरान 20 नए मरीजों की पहचान की गई है। स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जाकर लोगों की जांच कर रही हैं, पानी के सैंपल ले रही हैं और दवाइयां बांट रही हैं।
इलाके में डर और आक्रोश दोनों साफ नजर आ रहे हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर बताया जाता है, तो पीने का पानी इतना खतरनाक कैसे हो गया?
अस्पतालों पर बढ़ता दबाव
दूषित पानी से फैले डायरिया और संक्रमण के कारण सरकारी और निजी अस्पतालों पर भी भारी दबाव है। कई अस्पतालों में अतिरिक्त बेड लगाए गए हैं। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट्स यह बताती हैं कि संक्रमण अभी पूरी तरह थमा नहीं है।
बाहर से बुलाई गई एक्सपर्ट टीम
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कोलकाता स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन बैक्टीरियल इन्फेक्शन्स (NIRBI) की एक विशेषज्ञ टीम इंदौर पहुंच चुकी है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव प्रसाद हासानी के अनुसार, NIRBI की टीम:
- पानी और मरीजों के सैंपल की जांच कर रही है
- संक्रमण के असली कारणों की पहचान कर रही है
- स्वास्थ्य विभाग को टेक्निकल सपोर्ट दे रही है
- बीमारी को फैलने से रोकने की रणनीति तैयार कर रही है
साफ शहर की छवि पर सवाल
Indore लगातार कई वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित होता रहा है। लेकिन भागीरथपुरा की घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या स्वच्छता सिर्फ सड़क और कचरे तक सीमित है?
पीने के पानी की शुद्धता किसी भी शहर की सबसे बुनियादी जरूरत है। अगर वहीं चूक हो जाए, तो सारी उपलब्धियां खोखली लगने लगती हैं।
सिस्टम की चूक, जनता की कीमत
Bhagirathpura की त्रासदी एक बार फिर यह साबित करती है कि सिस्टम की छोटी-सी लापरवाही भी कितनी बड़ी कीमत वसूल सकती है। तीन दशक पहले सुभाष चौक की पानी की टंकी और आज भागीरथपुरा की सीवर लाइन—दोनों घटनाओं के बीच समय का फासला जरूर है, लेकिन जिम्मेदारी की कमी आज भी वही है।
निष्कर्ष
Bhagirathpura ने इंदौर के उन जख्मों को फिर से हरा कर दिया है, जिन्हें समय ने ढक जरूर दिया था, लेकिन भुलाया नहीं जा सका। यह सिर्फ एक मोहल्ले की कहानी नहीं, बल्कि पूरे शहर और सिस्टम के लिए चेतावनी है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने लोग बीमार हुए या कितनी मौतें हुईं, बल्कि यह है कि क्या इस बार जिम्मेदारी तय होगी—या यह त्रासदी भी वक्त के साथ एक और भूला दिया गया अध्याय बन जाएगी।

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